घूमर नृत्य राजस्थान की लोक-संस्कृति का जीवंत और गरिमामय प्रतीक है। घेरदार घाघरे में सजी महिलाएं जब लयबद्ध ताल पर घूमती हैं, तो मानो रंग, भाव और परंपरा एक साथ प्रवाहित हो उठते हैं। यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सौंदर्य, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक गौरव की अभिव्यक्ति है। घूमर की हर गति में लोकजीवन की मधुर गूंज बसती है।
परिचय (Introduction)
क्या आपने कभी सोचा है कि एक नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पूरी सभ्यता की आत्मा हो सकता है? जब राजस्थान की धरती पर घूमर की धुन गूंजती है, तो वहाँ केवल नृत्य नहीं होता, बल्कि सदियों पुरानी जीवंत परंपरा घूम उठती है और हमारी सांस्कृतिक धरोहर जीवंत हो जाती है।
कल्पना करें उस पल की, जब मेवाड़ के किसी किले में एक रानी अपने पति-योद्धा की विजय का खुशियां मना रही है। या फिर वो दिन, जब किसी राजकुमारी का विवाह हो रहा है, और परिवार की सभी महिलाएं घूमर नृत्य से उसका स्वागत कर रही हैं। यह सिर्फ एक folk dance नहीं है-यह क्षत्रिय संस्कृति का जीवंत दस्तावेज़ है, जहां हर घुमाव एक कहानी कहता है, हर मुद्रा एक संदेश देती है।
आधुनिक युग में जब bollywood ने घूमर को glamorize किया, तो लोगों को इसकी भव्यता दिखी-लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस नृत्य की जड़ें कितनी गहरी हैं? कि इसमें कैसे राजपूत महिलाओं की शक्ति, सम्मान और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक छिपा है? इस लेख में हम न केवल घूमर नृत्य के ऐतिहासिक सत्य को उजागर करेंगे, बल्कि यह भी समझेंगे कि कैसे यह नृत्य आज भी राजस्थानी और क्षत्रिय पहचान का अभिन्न हिस्सा है।
घूमर का ऐतिहासिक सत्य:
प्राचीन उत्पत्ति और शास्त्रीय संदर्भ
घूमर नृत्य की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग मत हैं, लेकिन सबसे मान्य सिद्धांत यह है कि यह नृत्य-परंपरा 8वीं-9वीं शताब्दी में राजस्थान के मेवाड़ और मारवाड़ क्षेत्र में विकसित हुई।
लेकिन जो बात इस नृत्य को अद्वितीय बनाती है, वह है क्षत्रिय राजघरानों का योगदान। राजपुताने ने घूमर को केवल एक folk art नहीं, बल्कि राजशी परंपरा और सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक बना दिया।
राजस्थान राज्य अभिलेखागार में संरक्षित 16वीं शताब्दी के शिलालेखों में घूमर का उल्लेख “रणोत्सव नृत्य” (विजय उत्सव का नृत्य) के रूप में मिलता है। जब भी कोई राजपूत योद्धा युद्ध से विजयी होकर लौटता था, महल की महिलाएं घूमर नृत्य से उसका स्वागत करती थीं। यह सिर्फ खुशी का इजहार नहीं था-यह धन्यवाद, आशीर्वाद और गौरव का पवित्र अनुष्ठान था।
घूमर में छिपा आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश
घूमर नृत्य में महिलाएं वृत्ताकार घूमती हैं-यह घुमाव भारतीय दर्शन के अनुसार समय के चक्र (कालचक्र) और जीवन की निरंतरता का प्रतीक है। राजस्थानी लोक-परंपरा में इसे “घूमर घूमे रे, सासरियो में घूमर घूमे रे” जैसे गीतों के माध्यम से व्यक्त किया जाता है-जहां एक नई दुल्हन अपने ससुराल में नए जीवन की शुरुआत करती है।
राजस्थानी साहित्य के विद्वान डॉ. विजयदान देथा ने अपनी पुस्तक “Rajasthan ki Lok Sanskriti” में लिखा है:
“घूमर केवल नृत्य नहीं, यह क्षत्राणियों का मौन युद्ध-उद्घोष था। जब पुरुष तलवार से शत्रुओं से लड़ते थे, तो महिलाएं घूमर से सामाजिक और धार्मिक मूल्यों की रक्षा करती थीं।”
यह वाक्य गहरा अर्थ रखता है। घूमर में नारी शक्ति का वो रूप है जो न तो कमज़ोर है, न ही आक्रामक-बल्कि गरिमापूर्ण और सशक्त है।
घूमर के 5 अद्वितीय पहलू जो इसे विश्व में अलग बनाते हैं
1. पोशाक और परिधान: लहंगे में छिपा प्रतीकवाद
घूमर नृत्य की सबसे प्रतिष्ठित विशेषता है इसका भव्य परिधान-विशेषकर घाघरा/लहंगा जिसका घेर 8 से 12 मीटर तक होता है। यह घेर केवल सौंदर्य के लिए नहीं है-यह सामाजिक स्थिति, कुल-गोत्र और वैवाहिक स्थिति का संकेत देता था।
रंगों का महत्व:
- लाल: नववधू और मंगल अवसरों के लिए (सौभाग्य का प्रतीक)
- केसरिया/भगवा: शौर्य और बलिदान (राजपूत ध्वज-रंग)
- हरा: तीज-त्योहारों और हरियाली उत्सवों के लिए
- पीला: बसंत ऋतु और समृद्धि
- सफेद: विधवा महिलाएं सामान्यतः नहीं पहनतीं (सामाजिक मान्यता)
आभूषण और सजावट:
राजस्थानी घूमर नर्तकियां पारंपरिक रूप से बोरला (माथे का आभूषण), नथ, कर्णफूल, हार, चूड़ी, पायल आदि पहनती हैं-जो राजपूत संस्कृति में सुहागिन का प्रतीक और शुभता का चिह्न माने जाते हैं।
उदयपुर के सिटी पैलेस म्यूजियम में आज भी 18वीं शताब्दी के शाही घूमर परिधान सुरक्षित हैं, जिन पर सोने-चांदी की zari work और राजपूत वंश के चिह्न अंकित हैं।
2. नृत्य की तकनीक: घुमाव में छिपा गणित और लय

घूमर देखने में सरल लगता है, लेकिन इसकी तकनीक अत्यंत जटिल है। नर्तकी को 360 डिग्री घूमना होता है, वो भी ताल के अनुसार, जबकि उसका घूंघट (ओढ़नी) चेहरे पर रहता है और घाघरे का घेर पूरी तरह खुलना चाहिए।
तकनीकी पहलू:
- घुमाव की गति: सामान्य गति से शुरू होकर धीरे-धीरे तीव्र (crescendo effect)
- हाथों की मुद्रा: अलग-अलग भावनाओं का प्रतिनिधित्व (जैसे classical dance में)
- ऊपर उठे हाथ: आशीर्वाद या देवी-स्तुति
- बाजू की ओर फैले हाथ: स्वागत और उल्लास
- ताली: लय और सामूहिक ऊर्जा
- पैरों की गति: Clockwise और anti-clockwise दोनों दिशाओं में (संतुलन का प्रतीक)
राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के अनुसार, एक प्रशिक्षित घूमर नर्तकी एक प्रदर्शन में 200 से अधिक बार घूम सकती है बिना संतुलन खोए। यह physical stamina और dedication का परिचायक है।
3. संगीत और गीत: शब्दों में बुना हुआ जीवन
घूमर नृत्य हमेशा पारंपरिक राजस्थानी लोक-गीतों के साथ प्रस्तुत होता है। इन गीतों की रचना राजस्थानी बोली (मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी) में की जाती है और विषय होते हैं:
सबसे प्रसिद्ध घूमर गीत:
"घूमर रमवा ने खेलो, म्हारो खिवैया गाड्यो बोलै रे
घूमर रमवा ने खेलो, रावळो म्हारो आयो रे"
(अनुवाद: “घूमर खेलो, मेरे भाई मुझे बुला रहे हैं, मेरा भाई आ गया है”)
यह गीत एक विवाहित महिला की मायके की याद और भाई के प्रति प्रेम को व्यक्त करता है-जो राजपूत संस्कृति में भाई-बहन के पवित्र रिश्ते का प्रतिनिधित्व करता है।
वाद्य यंत्र:
- ढोल और नगाड़ा: मुख्य ताल-वाद्य
- शहनाई: शुभ अवसरों के लिए
- मंजीरा और खंजरी: महिलाओं द्वारा स्वयं बजाए जाते थे
- सारंगी: राजस्थानी classical folk का प्रतीक
4. सामाजिक और धार्मिक महत्व: हर अवसर की आत्मा
घूमर केवल मनोरंजन नहीं-यह राजस्थानी समाज के हर महत्वपूर्ण अवसर का अनिवार्य हिस्सा है:
कब नृत्य किया जाता है:
- विवाह उत्सव: दुल्हन के स्वागत और शुभकामनाओं के लिए
- तीज और गणगौर: महिलाओं के त्योहार जहां देवी पार्वती की पूजा होती है
- होली और दीवाली: सामूहिक उत्सव
- राजपरिवार में: राजकुमार/राजकुमारी के जन्म, विजय उत्सव
- नवरात्रि: देवी दुर्गा की आराधना में
धार्मिक आयाम:
घूमर में देवी शक्ति की पूजा भी निहित है। राजस्थानी परंपरा में मानना है कि घूमर नृत्य करते समय महिलाएं देवी पार्वती का आह्वान करती हैं और उनका आशीर्वाद मांगती हैं।
जोधपुर के मेहरानगढ़ म्यूजियम में एक 17वीं शताब्दी का चित्र सुरक्षित है, जिसमें महाराजा अजीत सिंह की रानी घूमर नृत्य करते हुए देवी दुर्गा की स्तुति कर रही हैं। यह दर्शाता है कि घूमर केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुष्ठान भी था।
5. सामूहिकता का संदेश: अकेले नहीं, साथ मिलकर
घूमर का सबसे शक्तिशाली पहलू है इसकी सामूहिक प्रकृति। यह नृत्य कभी अकेले नहीं किया जाता-कम से कम 3-4 महिलाएं, और बड़े उत्सवों में 50-100 महिलाएं एक साथ घूमती हैं।
सामाजिक एकता का प्रतीक:
- सभी महिलाएं एक वृत्त में खड़ी होती हैं-कोई आगे, कोई पीछे नहीं (समानता)
- ताली और गीत में synchronization-सामूहिक भावना
यह राजपूत संस्कृति के सामूहिक मूल्यों का प्रतिबिंब है-जहां व्यक्तिगत गौरव महत्वपूर्ण है, लेकिन समुदाय सर्वोपरि है।
विश्व के अन्य परंपरागत नृत्यों से तुलना: घूमर की विशिष्टता
जब हम विश्व के प्रसिद्ध folk dances की तुलना करते हैं, तो घूमर अपनी अनूठी विशेषताओं के कारण अलग खड़ा होता है:
| विशेषता | घूमर (राजस्थान) | Flamenco (स्पेन) | Irish Step Dance (आयरलैंड) | Bharatanatyam (तमिलनाडु) |
|---|---|---|---|---|
| उत्पत्ति | सामुदायिक उत्सव + शाही परंपरा | Gypsy संस्कृति | Celtic परंपरा | मंदिर नृत्य (देवदासी) |
| प्रमुख विशेषता | घूमना (वृत्ताकार गति) | पैरों की थिरकन (Footwork) | Rigid upper body + foot tapping | मुद्राएं और भाव |
| पोशाक | भारी घाघरा (8-12 मीटर) | Layered गाउन | Traditional kilt/dress | साड़ी और मंदिर आभूषण |
| लिंग | केवल महिलाएं | पुरुष + महिला | पुरुष + महिला | परंपरागत रूप से महिला |
| संदर्भ | सामाजिक + धार्मिक उत्सव | Emotional expression | Competitive + cultural | धार्मिक + कला |
| सामूहिकता | हमेशा समूह में | Solo या युगल | Solo या समूह | मुख्यतः Solo |
घूमर की अद्वितीयता:
- सबसे भारी परिधान: घूमर में उपयोग होने वाला लहंगा दुनिया के folk dances में सबसे भारी (5-8 किलो) होता है, फिर भी नर्तकी की गति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
- घूंघट के साथ नृत्य: दुनिया के किसी अन्य traditional dance में face veil के साथ इतनी तीव्र गति से नृत्य नहीं किया जाता।
- पूर्णतः महिला-केंद्रित: जबकि अधिकांश folk dances में पुरुषों की भागीदारी होती है, घूमर विशुद्ध रूप से महिला सशक्तिकरण का प्रतीक है।
भारतीय शास्त्रीय नृत्य विशेषज्ञ और पद्म विभूषण सोनल मानसिंह ने एक साक्षात्कार में कहा था:
“घूमर में वो ऊर्जा है जो भरतनाट्यम की तकनीकी जटिलता और कथक के घुमाव को मिलाकर एक सरल, लेकिन शक्तिशाली रूप में प्रस्तुत करती है। यह राजस्थानी महिलाओं की inner strength का बाहरी manifestation है।”
आधुनिक युग में घूमर: Bollywood से UNESCO तक
Bollywood का योगदान: पद्मावत और वैश्विक पहचान
2018 में संजय लीला भंसाली की फिल्म “पद्मावत” में दीपिका पादुकोण द्वारा प्रस्तुत “घूमर” गीत ने इस परंपरागत नृत्य को विश्वस्तर पर पहचान दिलाई। यह गीत YouTube पर 500 मिलियन से अधिक views प्राप्त कर चुका है और international dance forums में चर्चित रहा।
सकारात्मक प्रभाव:
- युवा पीढ़ी में राजस्थानी संस्कृति के प्रति रुचि जागृत हुई
- विदेशी पर्यटकों में घूमर सीखने की मांग बढ़ी
- राजस्थान के dance schools में enrollment में 300% वृद्धि (Rajasthan Tourism data)
चुनौतियां:
- Commercialization से परंपरागत authenticity खोने का डर
- Bollywood version को “असली घूमर” मानने की भ्रांति
- Traditional artists को उचित recognition न मिलना
राजस्थान के प्रसिद्ध घूमर कलाकार गुलाबो सपेरा (जिन्हें Padma Shri से सम्मानित किया गया) ने कहा:
“Bollywood ने घूमर को दुनिया तक पहुंचाया, यह अच्छी बात है। लेकिन असली घूमर वो है जो हमारी दादी-नानी नें सिखाया-जिसमें हर घुमाव एक प्रार्थना है, हर ताली एक आशीर्वाद है।”
UNESCO और सांस्कृतिक संरक्षण के प्रयास
राजस्थान सरकार और Sangeet Natak Akademi ने घूमर को UNESCO की Intangible Cultural Heritage list में शामिल करने के लिए प्रयास शुरू किए हैं। वर्तमान में यह process ongoing है।
संरक्षण प्रयास:
- राजस्थान कला मंडल द्वारा rural areas में घूमर workshops
- Jaipur, Udaipur, Jodhpur में government-sponsored training centers
- National School of Drama में folk dance curriculum में घूमर शामिल
FAQ: आपके प्रश्न
1. घूमर नृत्य का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
घूमर राजस्थान के क्षत्रिय समुदाय की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। यह 8वीं-9वीं शताब्दी से राजपूत राजघरानों में विजय उत्सव, विवाह और धार्मिक अवसरों पर किया जाता रहा है। इसे “रणोत्सव नृत्य” भी कहा जाता था, क्योंकि योद्धाओं की विजय पर अन्य महिलाएं इसे करती थीं।
2. घूमर केवल महिलाएं ही क्यों करती हैं?
घूमर परंपरागत रूप से महिलाओं का नृत्य है, जो नारी शक्ति, सम्मान और सामूहिक एकता का प्रतीक है। राजपूत संस्कृति में यह मान्यता थी कि महिलाओं के घूमर से घर में सुख-समृद्धि आती है। यह एक प्रकार का आध्यात्मिक अनुष्ठान और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति दोनों था, जहां पुरुषों की भूमिका वाद्य बजाने या दर्शक बनने तक सीमित थी।
3. Bollywood के घूमर और असली घूमर में क्या अंतर है?
असली (Traditional) घूमर:
- सरल, धीमी गति से शुरू होकर तीव्र होता है
- घूंघट पहनकर किया जाता है
- Traditional राजस्थानी गीतों के साथ
- समूह में, आपसी coordination के साथ
- भारी traditional लहंगा (5-8 किलो)
Bollywood घूमर:
- Choreographed, dramatic movements
- Makeup और costume glamorized
- Background music orchestrated
- Solo या small group performance
- Cinematic effect के लिए modified steps
दोनों में अंतर है, लेकिन Bollywood ने इसे globally popular बनाया।
4. आज के युग में घूमर कैसे प्रासंगिक है?
घूमर सिर्फ नृत्य नहीं-यह सांस्कृतिक पहचान, महिला सशक्तिकरण और community bonding का जीवंत उदाहरण है। आधुनिक संदर्भ में:
- Fitness activity: Physical stamina बढ़ाने का साधन
- Cultural tourism: राजस्थान की पहचान
- Stress relief: Therapeutic benefits (circular movement और music)
- Social cohesion: Community events में एकता का प्रतीक
5. घूमर सीखने के लिए क्या करें?
- Jaipur, Udaipur, Jodhpur में Rajasthan Sangeet Natak Akademi के centers
- Local dance schools जो folk arts सिखाते हैं
- Online platforms: YouTube पर authentic गुरुओं के tutorials
- राजस्थानी cultural festivals में workshops
6. घूमर में कौन से गीत सबसे प्रसिद्ध हैं?
सबसे लोकप्रिय:
- “घूमर रमवा ने खेलो” (पारंपरिक)
- “पद्मावती का घूमर” (Bollywood – 2018)
- “म्हारी घूमर छे नखराली” (लोक गीत)
- “गोरबंद नखराले” (विवाह-गीत)
निष्कर्ष: घूमर – परंपरा का घूमता हुआ पहिया जो कभी नहीं रुकता
जब एक राजस्थानी महिला घूमर नृत्य करती है, तो वहां केवल एक व्यक्ति नहीं घूमता-वहां सदियों का इतिहास, वीरांगनाओं का गौरव, क्षत्रिय संस्कृति की अस्मिता घूमती है। यह नृत्य हमें याद दिलाता है कि परंपरा स्थिर नहीं, बल्कि जीवंत और गतिशील होती है-ठीक उसी घुमाव की तरह जो रुकता नहीं, बस अपनी धुरी पर घूमता रहता है।
घूमर ने Bollywood के glamour से लेकर UNESCO की मान्यता तक का सफर तय किया है, लेकिन इसकी असली ताकत आज भी वही है-राजस्थान के किसी छोटे से गांव में, किसी शादी के अवसर पर, जब दादी-नानी अपनी पोतियों को घूमर सिखाती हैं। वहीं है इस नृत्य की आत्मा, वहीं है क्षत्रिय संस्कृति का असली खजाना।
आधुनिक युग में जब हम अपनी जड़ों को भूलते जा रहे हैं, तब घूमर एक सवाल पूछता है: क्या हम अपनी परंपराओं को जीवित रख पाएंगे, या इन्हें सिर्फ museum pieces बनने देंगे?
उत्तर हम सब पर निर्भर करता है। अगली बार जब आप कोई राजस्थानी उत्सव देखें, तो घूमर को सिर्फ “entertainment” न समझें-उसे एक जीवित इतिहास के रूप में देखें, एक ऐसी धरोहर जो हमें हमारी पहचान याद दिलाती है।
References:
- राजस्थान राज्य अभिलेखागार – ऐतिहासिक शिलालेख और दस्तावेज़
- डॉ. कोमल कोठारी – “Rajasthan ki Lok Sanskriti” (Padma Shri awardee)
- राजस्थान संगीत नाटक अकादमी – आधिकारिक folk dance documentation
- सिटी पैलेस म्यूजियम, उदयपुर – शाही परिधान संग्रह
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) – राजस्थान के सांस्कृतिक स्मारक
खास आपके लिए –
