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Friday, February 27, 2026

राजपूती चूड़ा: परंपरा, शान और सुहाग की पहचान

राजपूती चूड़ा केवल हाथों की शोभा नहीं, वह एक संस्कृति का स्पंदन है। जब किसी क्षत्राणी की कलाई में लाल, हाथी-दाँत या सोने की आभा से दमकता चूड़ा सजता है, तो वह केवल आभूषण नहीं रहता, वह वंश की गरिमा, परंपरा की निरंतरता और सुहाग की अटूट आस्था का प्रतीक बन जाता है। राजपूती चूड़ा उस गौरवशाली जीवन-दृष्टि का हिस्सा है, जहाँ श्रृंगार भी मर्यादा में बंधा होता है। विवाह के मंगल क्षणों में जब नववधू अपने हाथों में चूड़ा धारण करती है, तब वह केवल एक नई यात्रा की शुरुआत नहीं करती, बल्कि अपने कुल की अस्मिता और संस्कारों को भी अपने साथ लेकर चलती है।

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जब कलाइयों पर श्वेत चूड़ियों की खनक गूँजती है, तो वह केवल काँच या लाख की आवाज़ नहीं होती – वह सदियों पुरानी एक गौरवशाली परंपरा की प्रतिध्वनि होती है। राजपूती चूड़ा केवल एक आभूषण नहीं है, यह एक क्षत्राणी की पहचान है, उसके सुहाग का प्रतीक है, और उस अटूट संस्कार की निशानी है जो राजपूताना की माटी में सदियों से जीवित है।

इस लेख में हम राजपूती चूड़े के उस गौरवशाली इतिहास को उजागर करेंगे, जो मोहनजोदड़ो की खुदाई से लेकर जयपुर के मनिहारों के हाथों तक और राजपूताना के महलों से लेकर आधुनिक दुल्हनों की कलाइयों तक निरन्तर प्रवाहित होता आया है। यह एक सांस्कृतिक धरोहर है – जिसे जानना हर क्षत्रिय के लिए गौरव का विषय है।

1: राजपूती चूड़ा – ऐतिहासिक एवं अति प्राचीन

“चूड़ा” – जो 5000 वर्ष से भी पुरानी सभ्यता की देन है

इतिहास के पन्नों को पलटें, तो चूड़ियों के प्रथम प्रमाण लगभग 2600 ईसापूर्व के मोहनजोदड़ो (Mohenjo-daro) की खुदाई में मिलते हैं। पुरातत्ववेत्ताओं को यहाँ शंख, तांबे, काँसे और पत्थर से बनी चूड़ियाँ प्राप्त हुईं। वह विश्वप्रसिद्ध कांस्य-मूर्ति “नृत्य-करती बाला” (Dancing Girl of Mohenjo-daro) – जिसकी भुजाएँ बाजूबंदों और चूड़ियों से सज्जित हैं – यह प्रमाणित करती है कि चूड़ियाँ उस काल से भी भारतीय स्त्री का अभिन्न अंग रही हैं।

“भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और हड़प्पा पुरातत्व अभिलेखों के अनुसार, सिंधु घाटी सभ्यता में नारी-अलंकरण में चूड़ियाँ सर्वाधिक महत्वपूर्ण आभूषण थीं।”

इससे भी आगे – अथर्ववेद में लाख (lac) के पेड़ का उल्लेख है, और शिव पुराण में एक पवित्र कथा है: जब भगवान शिव और माँ पार्वती का विवाह हुआ, तब लखेरा (bangle-maker) समाज ने पार्वती माँ के लिए लाख की चूड़ियाँ बनाईं। महादेव ने स्वयं वे चूड़ियाँ पार्वती को भेंट कीं – और तभी से विवाहित स्त्रियों के लिए चूड़ियाँ धारण करना पवित्र और मंगलकारी माना गया।

महाभारत में भी लाख का उल्लेख है – दुर्योधन द्वारा निर्मित “लाक्षागृह” (लाख का भवन) इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि लाख का उपयोग प्राचीन भारत में व्यापक था।

राजपूताना में चूड़े की विशिष्ट परंपरा

क्षत्रिय संस्कृति में चूड़ा अन्य परंपराओं से सर्वथा भिन्न रहा है। जहाँ पंजाबी परंपरा में लाल-सफेद चूड़ा प्रचलित है, वहीं क्षत्राणियां परम्परागत रूप से श्वेत (हाथीदांत/ivory रंग) का चूड़ा ही धारण करती आई हैं।

सीकर जिले के पाटन गाँव में 10वीं शताब्दी से चली आ रही चूड़ा-निर्माण कला इस परंपरा की गहराई को दर्शाती है। यहाँ के 100 से अधिक परिवार पीढ़ियों से इस शिल्प से जुड़े हैं और राजपूती चूड़े की माँग गुजरात, हरियाणा और विदेशों तक फैली है। महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय द्वारा जयपुर की स्थापना (1727 ई.) के समय “मनिहारों का रास्ता” (Maniharon ka Rasta, त्रिपोलिया बाज़ार) बसाया गया, जहाँ आज भी 14वीं पीढ़ी के कारीगर हाथ से लाख की चूड़ियाँ बनाते हैं।

यह धरोहर केवल आभूषण-निर्माण नहीं – यह राजपूताना की सांस्कृतिक पहचान का जीवन्त प्रमाण है।

2: राजपूती चूड़े के 6 महत्वपूर्ण पहलू –

क्षत्रिय संस्कृति

1. राजपूती चूड़े के प्रकार: हाथीदांत से लाख तक

राजपूती चूड़ा मुख्यतः तीन प्रकारों में मिलता है:

① दाँत चूड़ा (Daant / Ivory Chuda):
परम्परागत रूप से यही सबसे श्रेष्ठ और राजसी चूड़ा माना जाता था। असली हाथीदांत (elephant ivory) से बना यह चूड़ा राजपूत वधुओं की शान का प्रतीक था। सरकार द्वारा हाथीदांत पर प्रतिबंध के बाद अब यह “धालवा” या “भुर” चूड़े में बदल गया है।

② धालवा / भुर चूड़ा (Dhalu / Bur Chuda):
यह सीपी (shell) से बनाया जाता है और हाथीदांत जैसा दिखता है। राजपूत परंपरा में विवाह के समय नई दुल्हन को यही चूड़ा पहनाया जाता है – श्वेत रंग में, जो पवित्रता और सौभाग्य का प्रतीक है। इस पर सोने की नक्काशी (नक्कासी) होती है जो इसे और भी भव्य बनाती है।

③ लाख का चूड़ा (Lakh Chuda):
राजस्थान में विवाहित महिलाएँ लाख (lac resin) से बनी चूड़ियाँ धारण करती हैं। ये सामान्यतः गाढ़े लाल रंग में सोने की कारीगरी के साथ बनती हैं। लाखिणी रस्म में इन्हीं चूड़ियों को पहनाया जाता है।

रोचक तथ्य: राजस्थानी महिलाएँ परम्परागत रूप से एक ही समय में कुल 52 हाथीदांत चूड़ियाँ पहनती थीं – ऊपरी बाँह पर 17 और निचले भाग पर 9 (प्रत्येक हाथ पर) – जो उनके सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता था।

2. चूड़ा रस्म की विधि: एक पवित्र संस्कार

राजपूत विवाह में चूड़ा-रस्म एक अत्यन्त पवित्र और भावनात्मक संस्कार है। यह विवाह से पहले या विवाह के दिन प्रातःकाल सम्पन्न होती है।

रस्म का विधान:

  • वधू के वर-पक्ष या कहीं कहीं मामा (maternal uncle) द्वारा चूड़ा लाया जाता है।
  • चूड़े को दूध और गुलाब-जल से धोकर पवित्र किया जाता है
  • मांगलिक गीत और वैदिक मंत्रों के उच्चारण के बीच चूड़ा पहनाया जाता है
  • राजपूत परंपरा के अनुसार, एक बार चूड़ा पहनाने के बाद वधू विवाह-समारोह तक घर के भीतर ही रहती है
  • चूड़े के साथ सोने की बंगड़ी (Bangdi) और पौंची (Paunchi) भी पहनाई जाती हैं जो राजपूती सौभाग्य के विशिष्ट आभूषण हैं

“चूड़ा का शब्द-अर्थ ही ‘सुहाग’ से जुड़ा है – यह विवाहित स्त्री की पहचान है, जो उसके नव-जीवन की मंगल-घोषणा करता है।”

3. मामा की पवित्र भूमिका

राजपूत परंपरा में विवाह के दौरान वधू के मामा (mama – maternal uncle) की भूमिका अत्यन्त विशिष्ट होती है। मामा ही परम्परागत रूप से चूड़ा लाते हैं और भतीजी/भांजी की कलाइयों पर पहनाते हैं।

यह केवल एक रस्म नहीं है – यह मातृपक्ष के सम्बन्ध की गहराई और गौरव को व्यक्त करता है। मामा के परिवार द्वारा लाया गया चूड़ा बेटी को दिया गया वह आशीर्वाद है जो कहता है – “तुम हमारे कुल की शान हो, और अब नए घर को भी उतनी ही शान से सजाना।”

राजपूत विवाह में “चाक-भात” रस्म में भी मामा विशेष उपहार और सम्मान के साथ आते हैं। यह परंपरा भारतीय समाज में मातृपक्ष के आदर की उस गहरी जड़ को दर्शाती है जो क्षत्रिय संस्कृति में सदैव से रही है।

4. लाखिणी रस्म: चूड़े का दूसरा जन्म

लाखिणी रस्म राजपूत विवाह की एक विशिष्ट और अत्यन्त महत्वपूर्ण परंपरा है।

विवाह के बाद सवा महीने (लगभग 40 दिन) या सवा साल पश्चात यह रस्म की जाती है। इसमें नवविवाहिता को उसका विवाह का चूड़ा बदलकर लाख की चूड़ियाँ पहनाई जाती हैं। इस दौरान:

  • मंगलाचार गीत गाए जाते हैं
  • मायके या ससुराल पक्ष द्वारा नई लाख की चूड़ियाँ पहनाई जाती हैं
  • सवा महीना इसलिए शुभ माना जाता है क्योंकि यह वैदिक गणना में “पूर्णता” का प्रतीक है

यह रस्म दुल्हन के नए जीवन में सुहाग की निरन्तरता की कामना का प्रतीक है। यह उस परंपरा की जीवन्त अभिव्यक्ति है जो कहती है – चूड़ा केवल एक दिन का श्रृंगार नहीं, यह जीवनभर की साधना है।

5. लाख की चूड़ियों का राजसी शिल्प: एक जीवन्त धरोहर

जयपुर के “मनिहारों के रास्ते” (Maniharon ka Rasta, त्रिपोलिया बाज़ार) में आज भी 14वीं पीढ़ी के कारीगर हाथ से लाख की चूड़ियाँ बनाते हैं। यह शिल्प जयपुर की स्थापना के समय से चला आ रहा है।

लाख चूड़ी निर्माण की प्रक्रिया:

  • पेड़ों से केरिया लक्का (Kerria lacca) कीट द्वारा उत्पादित लाख (shellac) एकत्र की जाती है
  • लाख को पिघलाकर उसमें रंग और पत्थर-चूर्ण मिलाया जाता है
  • हाथ से बेलकर, काटकर और लूप बनाकर चूड़ी तैयार की जाती है
  • रत्नों, काँच और सोने के डिज़ाइन से सज्जित किया जाता है

इस प्रक्रिया में औसतन 6-7 घंटे प्रति दर्जन चूड़ियों का समय लगता है। राजस्थान भारत के लाख उत्पादन का महत्वपूर्ण केन्द्र है – और यहाँ की लाख चूड़ियाँ देश-विदेश में राजपूताना की सांस्कृतिक पहचान बनकर निर्यात होती हैं।

Live History India के अनुसार, महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने जयपुर की स्थापना के समय देशभर से कारीगरों को आमंत्रित किया था, जिसमें मनिहार समुदाय भी शामिल था जो आज तक इस परंपरा को जीवित रखे हुए है।”

6. सुहाग और धार्मिक महत्व: चूड़े में निहित है पूरी सृष्टि

भारतीय शास्त्रों में विवाहित स्त्री का षोडश श्रृंगार (Solah Shringar) वर्णित है – उसमें चूड़ियाँ एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। राजपूत परंपरा में:

  • श्वेत चूड़ा = पवित्रता, सात्विकता और निष्ठा का प्रतीक
  • लाख का चूड़ा = सौभाग्य, समृद्धि और वैवाहिक बन्धन का प्रतीक
  • सोने की बंगड़ी = धर्मपरायणता और दान-पुण्य का स्मरण (राजपूत वधू को यह याद दिलाती है कि धर्म-कर्म से कभी विमुख न हों)

वैज्ञानिक दृष्टि से भी चूड़ियों का महत्व है – कलाई की नसों पर चूड़ियों का स्पर्श रक्त संचार को नियमित करता है और ऊर्जा के प्रवाह को संतुलित रखता है।

3: विश्व परंपराओं में राजपूती चूड़े की विशिष्टता – भारतीय धरोहर की अनूठी पहचान

पहलूराजपूती चूड़ापंजाबी चूड़ागुजराती चूड़लोमराठी हिरवा चूड़ा
रंगश्वेत (हाथीदांत)लाल-सफेदलाल-हराहरा
सामग्रीहाथीदांत/सीपी/लाखहाथीदांत/प्लास्टिकहाथीदांत/प्लास्टिककाँच/प्लास्टिक
पहनाने वालेमामा / वर-पक्षमामा (Mama-Mami)मामासुहागिन महिलाएँ
पहनने की अवधिसवा माह/सवा वर्ष (लाखिणी तक)40 दिन से 1 वर्षविवाह अवसर पर1 वर्ष तक
विशेष रस्मलाखिणी रस्मचूड़ा-कलीरेचूड़लो समारोहहळदी के बाद धारण
धार्मिक आधारवैदिक षोडश श्रृंगारवैदिक + लोक परंपरादेवी-पूजन परंपरादेवी तुलजाभवानी परंपरा

राजपूती चूड़े की विशिष्टता क्यों अद्वितीय है?

सभी भारतीय परंपराओं में चूड़ा सुहाग का प्रतीक है – परन्तु राजपूती चूड़े में एक विशेष गरिमा है। राजपूत स्त्री का श्वेत चूड़ा उसकी शुचिता, आत्मसम्मान और क्षत्रिय-कुल के गौरव का प्रतीक है। जहाँ अन्य परंपराओं में रंग-विशेष को महत्व दिया जाता है, वहाँ राजपूत परंपरा में श्वेत रंग का चुनाव – जो शुद्धता और तेज का प्रतीक है – अपने आप में एक ओजस्वी संदेश देता है।

पश्चिमी देशों में विवाहित स्त्री के लिए wedding ring का प्रचलन है, जापान में जूनी-हितोई (Juunihitoe) वस्त्र-परंपरा है – परन्तु भारत की यह बहु-आयामी चूड़ा-परंपरा इस दृष्टि से अतुलनीय है कि यहाँ हर क्षेत्र, हर जाति की अपनी विशिष्ट पहचान है। राजपूती चूड़ा उस विविधता में भी सबसे अलग, सबसे गरिमामय खड़ा है।

4: आधुनिक युग में राजपूती चूड़ा

परंपरा और आधुनिकता का संगम

आज जब बाज़ार में प्लास्टिक और ऐक्रेलिक के चूड़े हर रंग में उपलब्ध हैं, तब भी राजपूतों की बेटियाँ अपने विवाह में पारम्परिक राजपूती चूड़ा पहनने पर गर्व अनुभव करती हैं। यह केवल फैशन नहीं है – यह क्षत्रिय पहचान है।

युवा पीढ़ी के लिए संदेश:
🔸 जब आप राजपूती चूड़ा पहनते/पहनाते हैं, तो आप केवल एक आभूषण नहीं धारण करते – आप एक अखण्ड परंपरा के वाहक बनते हैं।
🔸 लाखिणी रस्म जैसी परंपराएँ परिवार के बन्धन को मज़बूत करती हैं – आज की व्यस्त जीवनशैली में इन्हें जीवित रखना एक सामाजिक दायित्व है।
🔸 हस्तशिल्प से बने चूड़े खरीदना उस कारीगर परम्परा को जीवित रखना है जिसे राजपूताना के राजघरानों ने सदियों तक संरक्षित किया।

महिला सशक्तीकरण और क्षत्राणी

राजपूत संस्कृति में नारी को “घर की महारानी” का दर्जा प्राप्त था। उसके प्रत्येक आभूषण में एक संदेश था – चूड़ा उसके सौभाग्य का, बंगड़ी उसके धर्म का, पौंची उसके कुल-गौरव का। आज की राजपूत महिला जब पारम्परिक चूड़ा धारण करती है, तो वह उन वीरांगनाओं की परंपरा को जीवित रखती है जिन्होंने अपने सुहाग, अपने कुल और अपने धर्म के लिए सर्वस्व अर्पण कर दिया।

“राजपूत संस्कृति में नारी का सम्मान सर्वोपरि था। वह क्षत्रिय-कुल की शक्ति थी, मर्यादा थी, और उसके चूड़े की खनक में उसके पूरे परिवार का गौरव गूँजता था।”

आधुनिक राजपूती चूड़ा – Global पहचान

आज जयपुर, जोधपुर और सीकर के राजपूती चूड़े देश की सीमाएँ पार कर विश्वभर में निर्यात हो रहे हैं। Etsy जैसे अन्तर्राष्ट्रीय प्लेटफ़ॉर्म पर “Rajputi Bridal Chuda” और “Dhalu Bur Chuda” के लिए विश्वभर के खरीदार मौजूद हैं – यह राजपूताना की सांस्कृतिक शक्ति का आधुनिक प्रमाण है।

FAQ – लोग यह भी पूछते हैं

Q1: राजपूती चूड़ा क्या होता है और यह पंजाबी चूड़े से कैसे अलग है?

A: राजपूती चूड़ा परम्परागत रूप से श्वेत (हाथीदांत/ivory रंग) का होता है, जबकि पंजाबी चूड़ा लाल-सफेद रंगों में होता है। राजपूत वधू को मुख्यतः धालवा, भुर या हाथीदांत का श्वेत चूड़ा पहनाया जाता है जिसमें सोने की नक्काशी होती है। यह राजपूत स्त्री की विशिष्ट पहचान और क्षत्रिय-कुल की गरिमा का प्रतीक है।

Q2: राजपूती चूड़ा कौन पहनाता है – विधि क्या होती है?

A: राजपूत विवाह में परम्परागत रूप से वर पक्ष, कहीं कहीं वधू के मामा (maternal uncle) चूड़ा लेकर आते हैं और भांजी को पहनाते हैं। चूड़े को पहले दूध-गुलाबजल से शुद्ध किया जाता है, फिर मंत्रोच्चार और मांगलिक गीतों के बीच वधू की कलाई पर पहनाया जाता है। इसके साथ सोने की बंगड़ी और पौंची भी पहनाई जाती है।

Q3: लाखिणी रस्म क्या होती है और कब की जाती है?

A: लाखिणी रस्म राजपूत विवाह की एक विशेष परंपरा है जो विवाह के सवा महीने (लगभग 40 दिन) या सवा साल बाद की जाती है। इसमें नवविवाहिता का विवाह-चूड़ा बदलकर उसे लाख की नई चूड़ियाँ पहनाई जाती हैं। यह रस्म मांगलिक गीतों और परिवार के उत्सव के साथ मनाई जाती है और नव-वधू के सुहाग की दीर्घायु की कामना करती है।

Q4: राजपूती चूड़े का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व क्या है?

A: चूड़ियों के प्रमाण 2600 ईसापूर्व मोहनजोदड़ो की खुदाई में मिलते हैं। शिव पुराण में उल्लेख है कि भगवान शिव ने विवाह के समय लाख की चूड़ियाँ माँ पार्वती को उपहार दी थीं – तभी से विवाहित महिलाओं के लिए चूड़ियाँ पवित्र और मंगलकारी मानी जाती हैं। वैदिक षोडश श्रृंगार में भी चूड़ियों का महत्वपूर्ण स्थान है।

Q5: राजपूती चूड़ा आज कहाँ से खरीदा जा सकता है और यह कितना टिकाऊ होता है?

A: प्रामाणिक राजपूती चूड़ा जयपुर के मनिहारों का रास्ता (त्रिपोलिया बाज़ार), जोधपुर, सीकर के पाटन गाँव और चूरू से मिलता है। ऑनलाइन Etsy, Amazon India पर भी उपलब्ध है। धालवा/भुर चूड़ा सीपी से बना होने के कारण हल्का और टिकाऊ होता है। लाख का चूड़ा नमी और दबाव से बचाकर रखना चाहिए। हाथ से बनी एक जोड़ी की कीमत ₹50 से ₹4000 तक हो सकती है।

निष्कर्ष – क्षत्रिय संस्कृति पर गर्व

राजपूती चूड़ा केवल एक विवाह की रस्म नहीं – यह एक सम्पूर्ण दर्शन है। मोहनजोदड़ो की सभ्यता से लेकर महाभारत के लाक्षागृह तक, वैदिक अनुष्ठानों से लेकर जयपुर के मनिहारों की 14 पीढ़ियों की कारीगरी तक – राजपूती चूड़े की यह परंपरा भारतीय सनातन संस्कृति की अटूट कड़ी है।

श्वेत चूड़े की खनक में वह माँ पार्वती का आशीर्वाद है जो शिव ने उन्हें भेंट किया था। उस खनक में राजपूत वधू का वह स्वाभिमान है जो कहता है – मैं क्षत्रिय-कुल की बेटी हूँ, मेरी पहचान मेरी परंपरा में है।

क्या आप अपनी इस गौरवशाली विरासत को जानते हैं? अपने परिवार की चूड़ा-रस्म की किसी विशेष परंपरा को comment में ज़रूर साझा करें – क्योंकि यह परंपरा तभी जीवित रहेगी जब हम इसे बोलेंगे, लिखेंगे और अगली पीढ़ी तक पहुँचाएँगे।

संदर्भ :

  1. Wikipedia – Chura (bangles) – बहु-क्षेत्रीय परंपराओं की जानकारी
  2. Live History India – Lac Bangles Jaipur – ऐतिहासिक शिल्प विवरण
  3. Indian Culture (Gov. of India) – Bangle Artifact – सरकारी पुरातत्व संग्रहालय
  4. Rajputana Culture Blog – Rajputi Bridal Chooda – विशेषज्ञ विवरण
  5. Gaatha Craft Archive – Lac Bangles Jaipur – शिल्प अभिलेखागार
  6. Rajasthan Studio – Jewellery Art of Rajasthan – सांस्कृतिक विश्लेषण

⚠️ Disclaimer: यह लेख ऐतिहासिक शोध, पुरातात्विक प्रमाणों और प्रामाणिक सांस्कृतिक स्रोतों पर आधारित है। किसी भी दावे की दोबारा जाँच के लिए सन्दर्भित स्रोत देखें।

खास आपके लिए –

Mrinalini Singh
Mrinalini Singhhttp://kshatriyasanskriti.com
Mrinalini Singh Author | Kshatriya Culture & Heritage Writing on women’s traditions, attire & jewelry, festivals, and the legacy of fearless Veeranganas
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