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Wednesday, January 7, 2026

सम्राट पृथ्वीराज चौहान: तराइन के युद्ध से वीरगति तक

28 अप्रैल 1192। तराइन के धूल भरे मैदान में इतिहास अपनी सबसे क्रूर परीक्षा लेने वाला था। एक तरफ मुहम्मद गोरी की विशाल सेना – हजारों घुड़सवार, हाथियों की पंक्तियां, और गजनी के सुल्तान का पूरा दंभ। दूसरी तरफ दिल्ली के युवा सम्राट पृथ्वीराज चौहान – मात्र 32 वर्ष के, लेकिन रगों में राजपूताना खून और आंखों में अटूट संकल्प। सूरज की पहली किरण के साथ जो युद्ध शुरू हुआ, उन्होंने न सिर्फ भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी, बल्कि एक ऐसी वीरगाथा लिख दी जो 830 साल बाद भी हर भारतीय के दिल में जीवित है। यह कहानी है उन योद्धा की जिन्होंने देश के लिए युद्ध किया, सम्मान के लिए लड़े, और अंततः अपने सिद्धांतों के लिए शहीद हो गए।

सम्राट पृथ्वीराज चौहान – यह नाम सिर्फ एक राजा का नहीं, बल्कि भारतीय शौर्य, प्रेम, त्रासदी और गौरव का पर्याय है। कुछ इतिहासकार उन्हें “अंतिम हिंदू सम्राट” कहते हैं, तो कुछ “दिल्ली का आखिरी सूर्य”। लेकिन सच तो यह है कि सम्राट पृथ्वीराज एक युग के प्रतीक थे – वह युग जब भारत बिखरा हुआ था, लेकिन उसकी आत्मा अभी भी अजेय थी। आज जब हम उनकी जीवनी को पढ़ते हैं, तो सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि मानवीय साहस, रणनीतिक प्रतिभा, प्रेम की गहराई, और अंततः नियति की क्रूरता को समझते हैं।

समय की पृष्ठभूमि: 12वीं सदी का भारत – एक विभाजित भूमि

सम्राट पृथ्वीराज चौहान का जन्म 1163 ई. (कुछ इतिहासकारों के अनुसार 1166 ई.) में एक ऐसे समय में हुआ जब भारतीय उपमहाद्वीप राजनीतिक रूप से खंडित था, लेकिन सांस्कृतिक रूप से अभी भी समृद्ध।

तत्कालीन राजनीतिक परिदृश्य:

उत्तर भारत में चौहान वंश (अजमेर और दिल्ली), गहड़वाल वंश (कन्नौज), चंदेल वंश (बुंदेलखंड), और परमार वंश (मालवा) जैसी शक्तिशाली राजपूत शक्तियां थीं। दक्षिण में चोल, चालुक्य और होयसल साम्राज्य अपने स्वर्णिम काल में थे।

और इसी समय, उत्तर-पश्चिम से एक नया खतरा मंडरा रहा था। गजनी और गोर के तुर्क शासकों ने भारत की संपत्ति और रणनीतिक महत्व को पहचान लिया था। महमूद गजनवी (971-1030) ने पहले ही भारत पर 17 बार आक्रमण कर चुका था। अब मुहम्मद गोरी (1149-1206) की नजरें भारत की उपजाऊ भूमि और समृद्ध शहरों पर गड़ी थीं।

समयरेखा: घटनाक्रम

1163 – सम्राट पृथ्वीराज चौहान का जन्म (अजमेर)
1177 – पृथ्वीराज राज्याभिषेक (मात्र 13 वर्ष की आयु में)
1178-1190 – राजपूत राज्यों के विरुद्ध सैन्य अभियान
1191 – तराइन का प्रथम युद्ध (पृथ्वीराज की शानदार विजय)
1192 – संयोगिता स्वयंवर और पलायन
1192 (अप्रैल) – तराइन का द्वितीय युद्ध (निर्णायक मोड़)
1192 (मार्च-मई) – पृथ्वीराज की बंदी और शहादत

सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भ:

यह भारतीय संस्कृति का स्वर्णिम काल था। संस्कृत साहित्य, मंदिर स्थापत्य, शास्त्रीय संगीत, और दार्शनिक विचारधाराएं अपने चरम पर थीं। पृथ्वीराज स्वयं संस्कृत और अपभ्रंश के विद्वान थे। उनके दरबार में चंदबरदाई जैसे महाकवि थे जिन्होंने “पृथ्वीराज रासो” की रचना की।

समाज क्षत्रिय मूल्यों पर आधारित था – वीरता, शौर्य, स्वाभिमान, और प्रतिज्ञा की रक्षा। राजपूत संस्कृति में युद्ध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि धार्मिक और नैतिक कर्तव्य भी था। महिलाएं भी इस संस्कृति का अभिन्न हिस्सा थीं – रानी पद्मिनी, रानी दुर्गावती जैसी वीरांगनाओं की परंपरा पहले से मौजूद थी।

अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ:

जब पृथ्वीराज भारत में शासन कर रहे थे, विश्व में क्या हो रहा था? यूरोप में Third Crusade (1189-1192) चल रहा था, जहां Richard the Lionheart और Saladin आमने-सामने थे। चीन में Song Dynasty अपने उत्कर्ष पर थी। मध्य एशिया में Khwarazmian Empire का उदय हो रहा था। यह विश्व इतिहास का वह दौर था जब सभ्यताओं के बीच संघर्ष और सांस्कृतिक आदान-प्रदान एक साथ चल रहे थे। पृथ्वीराज की कहानी इसी जटिल, प्रतिस्पर्धी, और रोमांचक समय में घटित होती है

प्रारंभिक जीवन: एक महान योद्धा का उदय

जन्म और वंश परिचय

गुजरात के अन्हिलवाड़ा पाटन में 1163 ई. की ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी को एक ऐसे बालक का जन्म हुआ जिसका नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाना था। पृथ्वीराज तृतीय, जिन्हें राय पिथौरा के नाम से भी जाना जाता है, चौहान (चाहमान) वंश के अजयराज चौहान के वंशज थे। उनके पिता सोमेश्वर चौहान अजमेर के शासक थे और माता कर्पूरदेवी दिल्ली के तोमर वंश की राजकुमारी थीं।

यह वंश-संबंध महत्वपूर्ण था। माता के पक्ष से पृथ्वीराज को दिल्ली का उत्तराधिकार मिला, जो उस समय उत्तर भारत का रणनीतिक केंद्र था। चौहान वंश ने खुद को अग्निवंशी राजपूतों में गिना, जो पौराणिक कथाओं के अनुसार अबू पर्वत पर हुए यज्ञ की अग्नि से उत्पन्न हुए थे। यह वंश अपनी वीरता और शौर्य के लिए प्रसिद्ध था।

बचपन की शिक्षा और कौशल विकास

सम्राट पृथ्वीराज का बचपन राजसी परंपराओं में बीता। इतिहासकार बताते हैं कि बालक पृथ्वीराज में असाधारण प्रतिभा थी। उन्होंने बहुत कम उम्र में ही छह भाषाओं में महारत हासिल कर ली – संस्कृत, प्राकृत, मागधी, पैशाची, शौरसेनी और अपभ्रंश। यह केवल भाषाई कौशल नहीं था, बल्कि उनकी बौद्धिक क्षमता का प्रमाण था।

लेकिन पृथ्वीराज का असली कौशल युद्ध कला में था। “पृथ्वीराज रासो” के अनुसार, उन्होंने “शब्दभेदी बाण” की विद्या में महारत हासिल की थी – यानी केवल ध्वनि सुनकर लक्ष्य भेदने की कला। आधुनिक इतिहासकार इसे अतिश्योक्ति मान सकते हैं, लेकिन यह निश्चित है कि पृथ्वीराज तीरंदाजी, तलवारबाजी, घुड़सवारी और युद्ध रणनीति में अद्वितीय थे।

उनके गुरु थे विद्वान चंदबरदाई, जो न केवल महाकवि थे बल्कि उनके सबसे करीबी मित्र और सलाहकार भी बने। कहते हैं कि पृथ्वीराज और चंद बरदाई की मित्रता भारतीय इतिहास की सबसे प्रसिद्ध मित्रताओं में से एक थी – कृष्ण-अर्जुन की तरह अटूट और आजीवन।

13 वर्ष की आयु में राज्याभिषेक

1177 ई. में जब पृथ्वीराज मात्र 13 या 14 वर्ष के थे, उनके पिता सोमेश्वर का निधन हो गया। इतनी कम उम्र में राजगद्दी संभालना आसान नहीं था। दरबार में कई सरदार थे जो युवा राजा को कमजोर समझते थे। लेकिन सम्राट पृथ्वीराज ने बहुत जल्द अपनी काबिलियत साबित कर दी।

उनकी माता कर्पूरदेवी ने प्रारंभिक वर्षों में संरक्षिका (regent) के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन जैसे-जैसे पृथ्वीराज परिपक्व होते गए, उन्होंने पूर्ण नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया। उनका राज्याभिषेक अजमेर में हुआ, लेकिन जल्द ही उन्होंने दिल्ली को भी अपनी राजधानी बनाया।

प्रारंभिक सैन्य अभियान और विजय

युवा सम्राट पृथ्वीराज को अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उनके प्रारंभिक सैन्य अभियान मुख्यतः राजपूत राज्यों के विरुद्ध थे – यह वह त्रासदी थी जिसने अंततः भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी।

भंडानक (नागौर) युद्ध (1178-79):
पृथ्वीराज का पहला बड़ा सैन्य अभियान उनके चचेरे भाई नागार्जुन के विरुद्ध था, जो गुडापुर (अब गुडगांव) में विद्रोह कर बैठा था। युवा राजा ने शीघ्रता और निर्णायकता के साथ इस विद्रोह को कुचल दिया। यह उनकी पहली सैन्य सफलता थी।

महोबा युद्ध (1182):
चंदेल राजा परमर्दिदेव के विरुद्ध यह एक विवादास्पद युद्ध था। “पृथ्वीराज रासो” में इसे बहुत विस्तार से वर्णित किया गया है, हालांकि आधुनिक इतिहासकार इसके कई विवरणों पर सवाल उठाते हैं। इस युद्ध में पृथ्वीराज ने चंदेल शक्ति को कमजोर किया और अपने साम्राज्य का विस्तार किया।

जयचंद के साथ बढ़ता तनाव:
कन्नौज के राजा जयचंद (गहड़वाल वंश) उस समय उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली राजा थे। जयचंद और पृथ्वीराज के बीच प्रतिद्वंद्विता बढ़ती जा रही थी। दोनों ही उत्तर भारत के “सर्वोच्च राजा” बनना चाहते थे। यह प्रतिद्वंद्विता राजनीतिक से व्यक्तिगत हो गई जब प्रेम और गर्व आपस में टकराए – लेकिन वह कहानी हम आगे देखेंगे।

इन प्रारंभिक वर्षों में पृथ्वीराज ने न केवल अपनी सैन्य प्रतिभा साबित की, बल्कि एक कुशल प्रशासक के रूप में भी उभरे। उन्होंने अजमेर और दिल्ली के बीच मजबूत संपर्क स्थापित किया, सड़कें बनवाईं, किलों को मजबूत किया, और एक वफादार सेना तैयार की।

संयोगिता: प्रेम जिसने इतिहास बदल दिया

अब ध्यान दीजिए – क्योंकि यहां से कहानी केवल राजनीति और युद्ध की नहीं रहती। यहां प्रवेश करता है प्रेम, जो शायद भारतीय इतिहास के सबसे रोमांटिक और साथ ही त्रासदीपूर्ण प्रेम प्रसंगों में से एक है।

पहली मुलाकात: कब और कैसे?

संयोगिता, कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री, अपने समय की सबसे सुंदर और गुणवान राजकुमारी मानी जाती थीं। “पृथ्वीराज रासो” के अनुसार (हालांकि इतिहासकार इसे काव्यात्मक अतिश्योक्ति मानते हैं), संयोगिता ने एक चित्रकार द्वारा बनाए गए पृथ्वीराज के चित्र को देखकर उनसे प्रेम कर बैठीं। और पृथ्वीराज ने भी जब संयोगिता के सौंदर्य और गुणों का वर्णन सुना, तो उनके मन में भी प्रेम की अनुभूति हुई।

यह कहानी कितनी सच है? आधुनिक इतिहासकार विधुमुखी चंद्र ने अपने शोध में बताया है कि पृथ्वीराज और संयोगिता की शादी वास्तव में एक राजनीतिक गठबंधन हो सकती थी जो किसी कारण से विफल हो गई। लेकिन लोक कथाओं, काव्यों और सांस्कृतिक स्मृति में यह प्रेम कहानी इतनी गहराई से बैठी है कि सच और कल्पना की सीमा धुंधली हो जाती है।

स्वयंवर: अपमान और साहसिक पलायन

1192 ई. की शुरुआत में, राजा जयचंद ने अपनी पुत्री संयोगिता के लिए एक भव्य स्वयंवर का आयोजन किया। उत्तर भारत के सभी प्रमुख राजाओं को आमंत्रित किया गया – लेकिन पृथ्वीराज चौहान को नहीं। यह जानबूझकर किया गया अपमान था।

जयचंद की शत्रुता इतनी गहरी थी कि उन्होंने स्वयंवर मंडप के द्वार पर पृथ्वीराज की एक प्रतिमा द्वारपाल के रूप में रखवा दी। संदेश साफ था – “पृथ्वीराज यहां राजा के रूप में नहीं, बल्कि द्वारपाल के रूप में ही आ सकते हैं।”

लेकिन प्रेम और साहस के आगे अपमान क्या चीज है?

स्वयंवर के दिन, जब संयोगिता ने सभी राजाओं को नकार दिया और द्वार पर रखी पृथ्वीराज की प्रतिमा के गले में वरमाला डाल दी, तो पूरा दरबार स्तब्ध रह गया। यह खुला विद्रोह था पिता के विरुद्ध। यह प्रेम की घोषणा थी।

और ठीक उसी क्षण, असली पृथ्वीराज प्रकट हुए।

कैसे पहुंचे? “पृथ्वीराज रासो” का वर्णन रोमांचक है – कुछ विश्वसनीय सैनिकों के साथ, गुप्त रूप से, योजनाबद्ध तरीके से। उन्होंने संयोगिता को घोड़े पर बिठाया और दिल्ली की ओर निकल पड़े। पीछे जयचंद की पूरी सेना थी, लेकिन पृथ्वीराज की तलवार और चंद बरदाई की रणनीति ने उन्हें सुरक्षित दिल्ली पहुंचा दिया।

यह था वह साहसिक पलायन जो भारतीय लोक कथाओं में अमर हो गया।

राजनीतिक परिणाम: दुश्मन बन गया सहयोगी

रोमांस के इस कृत्य के राजनीतिक परिणाम गंभीर थे। जयचंद, जो पहले से ही सम्राट पृथ्वीराज के प्रतिद्वंद्वी थे, अब उनके कट्टर शत्रु बन गए। अपनी बेटी का “अपहरण” और अपना सार्वजनिक अपमान – जयचंद इसे कभी भुला नहीं सके।

कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यही शत्रुता अंततः पृथ्वीराज के पतन का कारण बनी। विडंबना यह है कि जब मुहम्मद गोरी ने भारत पर आक्रमण किया, तो दो सबसे शक्तिशाली राजपूत राजा – पृथ्वीराज और जयचंद – एक-दूसरे के खिलाफ खड़े थे, एक साथ नहीं।

प्रेम की कीमत

पृथ्वीराज और संयोगिता का विवाह धूमधाम से हुआ। लेकिन यह खुशी अल्पकालिक थी। कुछ ही महीनों बाद, तराइन के मैदान में पृथ्वीराज को अपनी सबसे बड़ी परीक्षा का सामना करना था।

इतिहासकार इस पर बहस करते हैं। लेकिन एक बात निश्चित है – सम्राट पृथ्वीराज ने अपने दिल की सुनी। यह सवाल आज भी प्रासंगिक है। और शायद इसीलिए पृथ्वीराज और संयोगिता की प्रेम कहानी 800 साल बाद भी जीवित है – किताबों में, फिल्मों में, गीतों में, और हर उस दिल में जो प्रेम के लिए सब कुछ दांव पर लगाने की हिम्मत रखता है।

तराइन का प्रथम युद्ध (1191): विजय का स्वर्णिम क्षण

अब कहानी युद्धभूमि की ओर मुड़ती है। और यहां पृथ्वीराज अपनी पूरी महिमा में दिखाई देते हैं – एक अद्वितीय योद्धा और रणनीतिकार के रूप में।

पृष्ठभूमि: मुहम्मद गोरी का खतरा

मुहम्मद गोरी (मूल नाम मुइज़ुद्दीन मुहम्मद), गोर (अब अफगानिस्तान) का सुल्तान, महमूद गजनवी के नक्शेकदम पर चलते हुए भारत की ओर बढ़ रहा था। 1175 से 1186 के बीच उसने मुल्तान, उच्छ, और लाहौर पर कब्जा कर लिया था। अब उसकी नजरें दिल्ली और अजमेर पर थीं – उत्तर भारत के दिल पर।

1191 ई. में, गोरी ने भटिंडा (तब तबरहिंदा) के किले पर कब्जा कर लिया। यह किला पृथ्वीराज के राज्य की सीमा पर था। यह खुली चुनौती थी।

सम्राट पृथ्वीराज के पास दो विकल्प थे – या तो समझौता करें, या लड़ें। उन्होंने लड़ना चुना।

युद्ध की तैयारी

सम्राट पृथ्वीराज ने तुरंत अपने सहयोगी राजपूत राजाओं को संदेश भेजा। दिल्ली, अजमेर, रणथंभौर, ग्वालियर, महोबा, और अन्य राजपूत राज्यों से सेनाएं एकत्र हुईं। यह महासंघ (confederacy) लगभग 2,00,000 सैनिकों का था – घुड़सवार, पैदल सैनिक, और हाथी।

उधर गोरी की सेना लगभग 1,20,000 थी – लेकिन उनके पास बेहतर घुड़सवार तकनीक, हल्के और तेज घोड़े, और मध्य एशियाई युद्ध रणनीति थी।

तराइन का मैदान: पहला टकराव

तराइन (अब हरियाणा में) का मैदान, जो दिल्ली से लगभग 150 किलोमीटर उत्तर में है, इतिहास के सबसे निर्णायक युद्धों में से एक का गवाह बनने वाला था। 1191 की गर्मियों में, दोनों सेनाएं आमने-सामने आईं। सूरज की पहली किरणों के साथ युद्ध शुरू हुआ।

मुहम्मद गोरी ने अपनी पारंपरिक रणनीति अपनाई – तेज घुड़सवार हमले, पीछे हटना, और फिर तीरों की बारिश। यह तकनीक मध्य एशिया में बेहद सफल थी। लेकिन सम्राट पृथ्वीराज की सेना ने डटकर मुकाबला किया।

राजपूत हाथियों ने गोरी की घुड़सवार सेना में तबाही मचा दी। भारी कवच पहने राजपूत योद्धा तलवारों और भालों से लड़ रहे थे। युद्ध का पलड़ा बार-बार बदल रहा था।

निर्णायक क्षण: पृथ्वीराज का व्यक्तिगत पराक्रम

और फिर वह क्षण आया जो इस युद्ध को तय करने वाला था। पृथ्वीराज ने खुद युद्ध में सीधे प्रवेश किया। अपने विश्वसनीय घोड़े पर सवार, तलवार लहराते हुए, वे सीधे गोरी की ओर बढ़े।

इतिहासकार फ़रिश्ता (जो मुस्लिम स्रोत है और इसलिए पृथ्वीराज के प्रति पक्षपाती नहीं) लिखते हैं: “पृथ्वीराज ने अपने भाले से मुहम्मद गोरी पर ऐसा प्रहार किया कि वे घोड़े से गिर पड़े। लेकिन उनके अंगरक्षकों ने उन्हें बचा लिया।”

गोरी गंभीर रूप से घायल हो गए – उनके दो दांत टूट गए और वे बेहोश हो गए। उनकी सेना में अफरा-तफरी मच गई। अंगरक्षकों ने जल्दी से गोरी को घोड़े पर लादा और युद्धभूमि से भाग निकले।

यह था पृथ्वीराज की शानदार विजय।

विजय का जश्न और महत्वपूर्ण गलती

राजपूत सेना ने भव्य विजय का जश्न मनाया। मुहम्मद गोरी भाग गया था। भटिंडा का किला वापस ले लिया गया। पूरे उत्तर भारत में पृथ्वीराज की वीरता की कहानियां फैल गईं।

लेकिन यहां एक निर्णायक गलती हुई – और इतिहासकार आज भी इस पर बहस करते हैं।

पृथ्वीराज ने गोरी का पीछा नहीं किया। उन्होंने उसे पूरी तरह से परास्त करने या बंदी बनाने का प्रयास नहीं किया। यह क्षत्रिय परंपरा थी – भागते हुए दुश्मन का पीछा करना “अक्षत्रिय” माना जाता था।

यह “great mistake” थी या “noble decision”? यह युद्ध नैतिकता का सवाल है। राजपूत संस्कृति में यह वीरता थी। लेकिन रणनीतिक दृष्टि से यह घातक साबित हुई।

क्योंकि मुहम्मद गोरी वापस आने वाला था। और अगली बार, वह तैयार होकर आएगा।

तराइन का द्वितीय युद्ध (1192): त्रासदी का दिन

एक वर्ष बाद। 1192 का अप्रैल महीना। फिर से तराइन का मैदान। लेकिन इस बार सब कुछ अलग था।

गोरी की वापसी: बदला और रणनीति

मुहम्मद गोरी पिछली हार से सबक लेकर लौटा था। उसने अपनी सेना को पुनर्गठित किया, नई रणनीति तैयार की, और इस बार एक बड़ी सेना लेकर आया – लगभग 1,20,000 घुड़सवार।

लेकिन असली हथियार संख्या नहीं, रणनीति थी।

सम्राट पृथ्वीराज की तैयारी: कमजोर गठबंधन

सम्राट पृथ्वीराज ने फिर से राजपूत राजाओं को संदेश भेजा। लेकिन इस बार प्रतिक्रिया उतनी उत्साहपूर्ण नहीं थी। कुछ राजा आंतरिक झगड़ों में उलझे थे। कुछ ने तटस्थ रहना पसंद किया। और सबसे महत्वपूर्ण – जयचंद ने कोई सहायता नहीं भेजी।

संयोगिता प्रसंग का बदला अब लिया जा रहा था।

पृथ्वीराज की सेना फिर भी प्रभावशाली थी – लगभग 1,00,000 सैनिक।

युद्ध का दिन: रणनीति vs साहस

28 अप्रैल 1192 (कुछ स्रोतों के अनुसार)। तराइन का मैदान फिर से गवाह बनने वाला था – लेकिन इस बार इतिहास बदलने वाली त्रासदी का।

मुहम्मद गोरी ने एक चालाक रणनीति अपनाई। उसने अपनी सेना को पांच भागों में बांटा। हर भाग में लगभग 10,000 घुड़सवार थे, और वे बारी-बारी से हमला करते थे।

योजना यह थी: राजपूत सेना को थका देना। उनके हाथी और भारी कवच पहने सैनिक जल्दी थक जाते थे। तुर्क घुड़सवार हल्के थे, तेज थे, और बार-बार हमला कर सकते थे।

युद्ध सुबह शुरू हुआ। पहले चार घंटे तक राजपूत सेना डटी रही। तुर्क घुड़सवार हमला करते, तीरों की बारिश करते, और पीछे हट जाते। फिर दूसरा दल हमला करता। राजपूत योद्धा बहादुरी से लड़ रहे थे, लेकिन धीरे-धीरे थकान हावी हो रही थी।

दोपहर का संकट: सेना का बिखरना

दोपहर तक स्थिति गंभीर हो गई। राजपूत सेना थक चुकी थी। और तब गोरी ने अपना मास्टरस्ट्रोक खेला – उसने अपने ताजे घुड़सवारों के साथ एक भयंकर हमला किया, सीधे राजपूत सेना के केंद्र पर।

राजपूत सेना टूट गई। अनुशासन खत्म हो गया। हर राजा अपनी-अपनी टुकड़ी के साथ अलग हो गया। यह एक संगठित सेना नहीं रही, बल्कि बिखरे हुए योद्धाओं का समूह बन गई।

पृथ्वीराज ने अपने विश्वसनीय सरदारों के साथ अंत तक लड़ाई लड़ी। लेकिन संख्या, थकान, और बिखरी हुई सेना के खिलाफ व्यक्तिगत वीरता कितनी देर टिक सकती थी?

पकड़ और बंदी

युद्ध के अंतिम चरण में सम्राट पृथ्वीराज को पकड़ लिया गया। कैसे? यह विवादास्पद है। कुछ स्रोत कहते हैं कि वे युद्ध में घायल होकर गिर गए। और युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। “पृथ्वीराज रासो” के अनुसार – कि वे सो रहे थे और धोखे से पकड़े गए

परिणाम: एक युग का अंत

तराइन के द्वितीय युद्ध के परिणाम विनाशकारी थे:

पृथ्वीराज की पराजय और बंदी
दिल्ली पर तुर्क आधिपत्य
राजपूत शक्ति का विखंडन
उत्तर भारत में मुस्लिम शासन की शुरुआत
भारतीय इतिहास की दिशा में बदलाव

बंदी जीवन और वीरगति: अंतिम अध्याय

सम्राट पृथ्वीराज चौहान की कहानी का सबसे विवादास्पद और दुखद हिस्सा अब शुरू होता है।

गजनी में बंदी

मुहम्मद गोरी पृथ्वीराज को अपने साथ गजनी (अब अफगानिस्तान) ले गया। यहां उनके साथ क्या हुआ, इस पर ऐतिहासिक स्रोत अलग-अलग बातें कहते हैं।

“पृथ्वीराज रासो” का वर्णन:

चंद बरदाई द्वारा रचित इस महाकाव्य के अनुसार, गोरी ने पृथ्वीराज को अंधा कर दिया (गर्म सलाखों से आंखें फोड़ दीं)। लेकिन उनका साथी चंद बरदाई भी गजनी पहुंच गया। दोनों ने एक योजना बनाई।

एक दिन गोरी के दरबार में एक प्रदर्शन आयोजित किया गया जहां पृथ्वीराज को अपनी “शब्दभेदी बाण” कला दिखानी थी। चंद बरदाई ने एक दोहा पढ़ा:

“चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण।
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूको चौहान।”

यह संकेत था – गोरी कहां बैठा है। अंधे सम्राट पृथ्वीराज ने केवल ध्वनि सुनकर तीर छोड़ा, जो सीधे गोरी को लगा। और फिर दोनों मित्रों ने एक-दूसरे को मारकर आत्महत्या कर ली।

क्या यह सच है?

अधिकांश आधुनिक इतिहासकार इस कहानी को काव्यात्मक कल्पना मानते हैं। कई कारण हैं:

  1. मुहम्मद गोरी की मृत्यु 1206 में हुई, वह भी भारत में नहीं, बल्कि सिंधु नदी के किनारे – और वह हत्या नहीं, बल्कि एक अलग परिस्थिति में थी।
  2. समकालीन फारसी स्रोत (हसन निजामी का “Taj-ul-Maasir”) सम्राट पृथ्वीराज की मृत्यु के बारे में कुछ और कहता है।
  3. “पृथ्वीराज रासो” 16वीं सदी में लिखा गया, घटनाओं के 400 साल बाद।

ऐतिहासिक स्रोतों का कहना:

समकालीन फारसी इतिहासकार हसन निजामी और मिनहाज-ए-सिराज के अनुसार, पृथ्वीराज को गजनी ले जाया गया और वहां फांसी दे दी गई। कुछ स्रोत कहते हैं कि गोरी ने शुरुआत में उन्हें जीवित रखा (शायद राजनीतिक कारणों से), लेकिन बाद में मौत की सजा दी।

तारीख निश्चित नहीं है, लेकिन संभवतः 1192 के अंत या 1193 की शुरुआत में।

सच क्या है?

इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा, दशरथ शर्मा आदि – सभी का मानना है कि “शब्दभेदी बाण” वाली कहानी लोक कल्पना है। लेकिन इस कहानी में इतनी शक्ति है कि यह भारतीय सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा बन गई है।

क्यों? क्योंकि यह कहानी हमें वह देती है जो इतिहास नहीं देता – न्याय की भावना। सम्राट को अंतिम विजय। योद्धा का बदला।

वास्तविकता यह थी:

सम्राट पृथ्वीराज, भारत के सबसे शक्तिशाली राजा, एक बंदी के रूप में मारे गए। यह त्रासदी थी। यह अन्याय था। और भारतीय मानस ने इस अन्याय को स्वीकार नहीं किया। इसलिए लोक कथाओं ने एक वैकल्पिक अंत रचा – जहां नायक हारता नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर जीवन समाप्त करता है।

और शायद इसी में पृथ्वीराज की असली विरासत है – न कि ऐतिहासिक तथ्यों में, बल्कि उस प्रेरणा में जो उनकी कहानी देती है।

क्यों हारे ?

1. पहली जीत के बाद लापरवाही:
तराइन के प्रथम युद्ध के बाद पृथ्वीराज ने गोरी को पूरी तरह खत्म नहीं किया। यह noble gesture था, लेकिन strategic blunder भी।

2. सांस्कृतिक विश्लेषण:

राजपूत युद्ध संस्कृति व्यक्तिगत वीरता और शौर्यता पर आधारित थी। यह खूबसूरत था लेकिन तुर्क सेना का धोखा और विश्वास घात ।

तुलनात्मक विश्लेषण: विश्व इतिहास में पृथ्वीराज

पृथ्वीराज vs William Wallace (Scotland):

दोनों में अद्भुत समानताएं हैं:
अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए लड़े
विदेशी आक्रमणकारियों के खिलाफ खड़े हुए
शुरुआत में सफल रहे
अंततः पराजित और वीरगति
लेकिन राष्ट्रीय नायक बन गए

फर्क यह है: Wallace की कहानी “Braveheart” बनी और globally famous हुई। सम्राट पृथ्वीराज चौहान की कहानी मुख्यतः भारतीय संदर्भ में ही जानी जाती है।

पृथ्वीराज vs King Richard I (England):

समकालीन थे – दोनों 1190s में लड़ रहे थे।
Richard – Third Crusade में
सम्राट पृथ्वीराज चौहान – तराइन में

दोनों महान योद्धा थे। दोनों अपने समय के legendary fighters थे। लेकिन Richard जीत गए (हालांकि Jerusalem नहीं ले सके), जबकि सम्राट पृथ्वीराज चौहान महानायक बन गए।

समकालीन विश्व घटनाएं (1192):

भारतविश्व
तराइन का द्वितीय युद्धThird Crusade समाप्त
पृथ्वीराज की पराजयSaladin की विजय
दिल्ली पर तुर्क शासन शुरूRichard I इंग्लैंड वापस

विश्व इतिहास के इस महत्वपूर्ण दौर में, पूर्व और पश्चिम दोनों में धर्म, राजनीति, और सत्ता के लिए संघर्ष चल रहा था।

विरासत: 830 साल बाद भी जीवित

ऐतिहासिक विरासत:

पृथ्वीराज की पराजय ने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी। तराइन के बाद:
• दिल्ली में मुस्लिम शासन की स्थापना (1193)
• दिल्ली सल्तनत का उदय (1206)

सांस्कृतिक विरासत:

साहित्य में:
• “पृथ्वीराज रासो” – भले ही ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह accurate न हो, यह हिंदी साहित्य की महान कृति है
• सैकड़ों लोकगीत और ballads
• आधुनिक उपन्यास और biographies

लोक संस्कृति में:
• राजस्थान और हरियाणा में आज भी लोकगीत गाए जाते हैं
• “धन धन गोरी तेरे रूप की बातां, पृथ्वीराज लुट गए देख के…”
• हर राजपूत बच्चा पृथ्वीराज की कहानियां सुनकर बड़ा होता है

मीडिया में:
• 1960s-70s: हिंदी फिल्में
• 2000s: TV serials
• 2022: “Samrat Prithviraj” – Akshay Kumar
• YouTube पर हजारों videos

स्मारक और स्थल:

तराइन (हरियाणा): युद्धभूमि, जहां आज भी memorial है
अजमेर: पृथ्वीराज की राजधानी, कई स्मारक
दिल्ली: किला राय पिथौरा (पृथ्वीराज ने बनवाया)
गजनी (अफगानिस्तान): कथित रूप से जहां उनकी मृत्यु हुई

हर साल हजारों पर्यटक इन स्थानों पर जाते हैं – यह सिर्फ tourism नहीं, एक तरह की pilgrimage है।

कम ज्ञात तथ्य और रोचक किस्से

1. पृथ्वीराज: एक बहुआयामी प्रतिभा

सम्राट पृथ्वीराज चौहान केवल योद्धा नहीं थे। वे एक accomplished scholar भी थे। संस्कृत में कई ग्रंथ लिखे (हालांकि अधिकांश lost हैं)। वे एक skilled musician भी थे।

2. अजयमेरु (अजमेर) का निर्माण

अजमेर शहर को पृथ्वीराज के पूर्वज अजयराज चौहान ने स्थापित किया था। पृथ्वीराज ने इसे एक magnificent capital बनाया। आज भी अजमेर में तारागढ़ किला और अन्य स्मारक उस युग की याद दिलाते हैं।

3. चंद बरदाई: इतिहास या कल्पना?

चंद बरदाई पृथ्वीराज के सबसे करीबी मित्र माने जाते हैं। लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है कि चंद बरदाई एक historical figure नहीं, बल्कि literary creation हैं। यह debate आज भी जारी है।

4. पृथ्वीराज के 13 विवाह?

“पृथ्वीराज रासो” के अनुसार, पृथ्वीराज ने 13 विवाह किए थे। ऐतिहासिक रूप से केवल संयोगिता confirmed हैं। बाकी विवाह संभवतः राजनीतिक गठबंधन थे या poetic exaggeration।

5. गोरी को 16 बार माफ किया?

सम्राट पृथ्वीराज ने गोरी को 16 बार पकड़ा और हर बार माफ कर दिया।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: सम्राट पृथ्वीराज चौहान कौन थे और वे क्यों प्रसिद्ध हैं?

पृथ्वीराज चौहान तृतीय (1163-1192) चौहान राजवंश के राजा थे जिन्होंने अजमेर और दिल्ली पर शासन किया। वे अपनी वीरता, संयोगिता के साथ प्रेम कहानी, और मुहम्मद गोरी के खिलाफ तराइन के युद्धों के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्हें “अंतिम हिंदू सम्राट” कहा जाता है क्योंकि उनकी पराजय के बाद दिल्ली में मुस्लिम शासन शुरू हुआ।

प्रश्न 2: तराइन के युद्ध कब और क्यों हुए?

दो तराइन युद्ध हुए:
प्रथम (1191): मुहम्मद गोरी ने भटिंडा पर कब्जा किया। पृथ्वीराज ने जवाबी हमला किया और गोरी को परास्त किया।
द्वितीय (1192): गोरी बदला लेने वापस आया।

कारण: गोरी भारत पर विजय चाहता था, और पृथ्वीराज उत्तर भारत के सबसे शक्तिशाली राजा थे।

प्रश्न 3: संयोगिता कौन थीं और उनकी प्रेम कहानी क्या है?

संयोगिता कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री थीं। “पृथ्वीराज रासो” के अनुसार, दोनों को एक-दूसरे से प्रेम हो गया। जयचंद ने पृथ्वीराज को अपमानित करने के लिए स्वयंवर में नहीं बुलाया। लेकिन संयोगिता ने पृथ्वीराज की प्रतिमा को वरमाला पहनाई, और पृथ्वीराज ने उन्हें वहां से ले जाकर विवाह किया। यह घटना ऐतिहासिक रूप से पूरी तरह प्रमाणित नहीं है, लेकिन सांस्कृतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।

प्रश्न 4: तराइन युद्धभूमि आज कहां है और कैसे जाएं?

स्थान: तरावड़ी (तराइन), हरियाणा – दिल्ली से लगभग 150 km उत्तर में, थानेसर के पास

कैसे पहुंचें:
रोड: दिल्ली से NH-44 via Panipat (लगभग 3-4 घंटे)
रेल: निकटतम स्टेशन Kurukshetra या Karnal
Air: निकटतम airport Chandigarh (100 km)

देखने लायक:
• युद्ध memorial
• Local museum
• आसपास के ऐतिहासिक स्थल

Best time: October-March (सर्दी)

प्रश्न 5: क्या पृथ्वीराज रासो पूरी तरह ऐतिहासिक है?

“पृथ्वीराज रासो” एक महाकाव्य है। इसमें कुछ ऐतिहासिक तथ्य हैं (युद्ध, मुख्य पात्र)

प्रश्न 6: पृथ्वीराज पर कौन सी फिल्में और किताबें हैं?

फिल्में:
• “Samrat Prithviraj” (2022) – Akshay Kumar
• पुरानी Hindi films (1960s-70s)

TV Serials:
• “Dharti Ka Veer Yodha Prithviraj Chauhan” (2006-2009)

किताबें:
• “Prithviraj Chauhan” – Anita Bose Pfaff
• “The Last Aryabhata” – Vineet Bajpai (fiction)
• Academic books by Dasharatha Sharma, R.B. Singh

प्रश्न 7: आधुनिक इतिहासकार पृथ्वीराज को कैसे देखते हैं?

Modern historians का perspective balanced है:
एक capable warrior और administrator थे
अपने समय के powerful ruler थे और हिन्दू सम्राट

समापन: एक अमर विरासत

हमने देखा कि कैसे एक युवा राजकुमार ने 13 साल की उम्र में गद्दी संभाली। कैसे उसने अपने साहस से राज्य का विस्तार किया। कैसे प्रेम ने उन्हे एक साहसिक कार्य के लिए प्रेरित किया। कैसे उन्होंने दुश्मन को धूल चटाई।

सम्राट पृथ्वीराज चौहान एक व्यक्ति नहीं थे – वे एक युग के प्रतीक थे

आज जब हम comfortable lives जीते हैं, तो भूल जाते हैं कि भारतीय इतिहास कितना complex और dramatic रहा है। हर महल की ईंट, हर किले की दीवार, हर पुराने शहर की गली – सब कुछ कहानियां कहती हैं।

पृथ्वीराज ने जो sacrifice किए, वो सिर्फ अपने लिए नहीं, अपनी प्रजा के लिए थे। हम वो पीढ़ी हैं जो उस विरासत को जीती है।

इतिहास केवल किताबों में नहीं, हमारी रगों में बहता है। जब आप तराइन जाएं, तो सिर्फ tourist की तरह नहीं, एक तीर्थयात्री की तरह जाएं। उस मिट्टी को छुएं जहां वीरों ने अपना खून बहाया। उस हवा को महसूस करें।

पृथ्वीराज चौहान 830 साल पहले वीरगति को प्राप्त हुए थे। लेकिन वे आज भी जीवित हैं – हर उस भारतीय में जो साहस के साथ जीता है, हर उस प्रेमी में जो सब कुछ दांव पर लगा देता है, हर उस योद्धा में जो हार नहीं मानता।

संदर्भ :

  1. Dasharatha Sharma – “Early Chauhan Dynasties”
  2. R. B. Singh – “History of the Chauhans”
  3. Archaeological Survey of India Reports
  4. Prithviraj Raso (critical edition)
  5. Persian sources: Taj-ul-Maasir, Tabaqat-i-Nasiri

नोट: यह लेख ऐतिहासिक स्रोतों, academic research, और सांस्कृतिक परंपराओं के संयोजन पर आधारित है। जहां विवाद है, वहां multiple perspectives प्रस्तुत किए गए हैं। पाठकों को प्रोत्साहित किया जाता है कि वे स्वयं research करें और critical thinking के साथ इतिहास को समझें।

खास आपके लिए –

Bhanwar Singh Thadahttp://kshatriyasanskriti.com
Guardian of Kshatriya heritage and warrior traditions. Promoting Rajput history, dharmic values, and the timeless principles of courage, honor, and duty. Dedicated to cultural preservation and inspiring pride in our glorious past.
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