छत्रपति शिवाजी महाराज – अप्रतिम शौर्य , अद्भुत साहस , अद्वितीय बुद्धिमता , प्रशंसनीय चरित्रबल , श्रेष्ठ राजनीतिक चतुरता आदि गुण छत्रपति शिवाजी महाराज के चरित्र की अनन्य विशेषताएं हैं। उन्होंने अपने बल पर एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। और साबित कर दिया कि सिंह का न तो कोई अभिषेक करता है और न ही कोई संस्कार, वह तो अपने पराक्रम से वनराज की पदवी प्राप्त करता है।
छत्रपति शिवाजी महाराज को एक साहसी चतुर एवम् नीतिवान हिन्दू शासक के रुप में सदा याद किया जाता रहेगा। यद्यपि उनके साधन बहुत ही सीमित थे तथा उनकी समुचित ढंग से शिक्षा दीक्षा भी नहीं हुई थी, तो भी अपनी बहादुरी, साहस एवम् चतुरता से उन्होंने औरंगजेब जैसे क्रूर मुगल को कई बार धूल चाटने पर मजबूर कर दिया।
छत्रपति शिवाजी महाराज कुशल प्रशासक होने के साथ साथ एक समाज सुधारक भी थे। उन्होंने कई लोगों का धर्म परिवर्तन करा कर उन्हें पुनः हिंदू धर्म में घर वापसी करवाई। शिवाजी ने एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य की स्थापना करके इतिहास में एक सर्वथा नवीन अध्याय की स्थापना की। अपने इस सफल प्रयास के माध्यम से उन्होंने सिद्ध कर दिखाया कि धरती क्षत्रियों से खाली नहीं हुई है।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने मेवाड़ के ध्येय वाक्य ” जो दृढ़ राखे धर्म को तीही राखे करतार ” और शास्त्रोक्ति ” धर्मो रक्षती रक्षित: ” को चरितार्थ किया । और हिंदू सम्राट के नाम से इतिहास में अमर हो गए।
मेवाड़ राजपरिवार के सज्जन सिंह जी सन् १३०३ के लगभग चित्तौड़ को छोड़ दक्षिण की ओर चले गए थे उनकी पांचवी पीढ़ी में उग्रसेन का जन्म हुआ जिनके कर्ण सिंह तथा शुभकृष्ण नामक दो पुत्र हुए , इन्ही शुभकृष्ण के वंशजों की उपाधि भोंसले है। इन्ही शुभकृष्ण के पौत्र बाबाजी भोंसले हुए जिनके पौत्र का नाम शाहजी भोंसले था।
छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म शिवनेर के किले में वैशाख शुक्ल द्वितीया संवत् १५४९ (1549) तदानुसार गुरुवार 6 अप्रैल , 1627 को माता जीजा बाई के गर्भ से हुआ। इनके पिताजी का नाम शाहजी भोंसले था। शिवाजी का बाल्यकाल कोई सुखद नहीं कहा जा सकता। उन्हें अपने पिताजी का सरंक्षण भी प्रायः नहीं के बराबर मिला।
ऐसी परिस्थितियों में भी उनके द्वारा एक स्वतंत्र साम्राज्य की स्थापना निश्चय ही एक आश्चर्य कहा जा सकता हैं। इस आश्चर्य के पीछे जिन दो महान विभूतियों का हाथ रहा, वह माता जीजा बाई तथा दादाजी कोण्डदेव । इन्ही दो मार्गदर्शकों की छत्रछाया में शिवाजी का बाल्यकाल बीता एवं भावी जीवन की नींव पड़ी।
माता जीजा बाई लुकजी जाधवराव की सुपुत्री थीं उनकी धमनियों में देवगिरी के यादव शासकों का रक्त था। जिस समय शिवाजी गर्भ में थे शाहजी ने सूपा के मोहिते परिवार की कन्या तुकाबाई से दुसरा विवाह कर लिया था। ऐसी विकट परिस्थिति में भी जीजा बाई अपने पिता के साथ न जाकर शिवनेर के किले में जो भौसलो की जागीर था चली गई।
वहा शिवनेर के किले में ही शिवाजी का जन्म हुआ। जीजाबाई के ज्येष्ठ पुत्र सम्भाजी पिताजी की सहायता करने लगे। शाहजी मलिकअम्बर के साथ कई वर्षो से मुगलों के विरुद्ध लड़ रहे थे। दौलताबाद के किले पर मुगलों का अधिकार हो जानें पर मुगल सम्राट ने शाहजी तथा उनके परिवार को पकड़वाने की भरसक प्रयास किया।
माता जीजाबाई शिवाजी के साथ शिवनेर के किले में रह रही थी। लेकिन शिवाजी को पकड़ने का प्रयास विफल रहा। इस कठिन परिस्थिति में भी उन वीर माता ने अपने पुत्र की सैनिक शिक्षा में कमी नहीं आने दी ।
शिवाजी के जन्म के समय शाहजी निजामशाह की ओर से मुगलों के विरुद्ध लड़ रहे थे। जनवरी 1636 में शाहजंहा स्वयं दक्षिण भारत आया। ठीक इसी समय निजामशाही राज्य समाप्त हो गया। मई में मुगल सम्राट तथा बीजापुर की सल्तनत में संधि हो गई। इसके पश्चात शाहजी भी बीजापुर की सेवा में चले गए। उनकी इन सेवाओं के बदले में उन्हें गोदावरी नदी के दक्षिण में एक जागीर दे दी गई।
यह घटना अक्टूबर 1636 की है। इन संघर्षों के समय में भी शाहजी ने पूना की जागीर पर अपना अधिकार सुरक्षित रखा था। बीजापुर जाने से पहले शाहजी ने जीजाबाई तथा शिवाजी को पूना भेज दिया। पूना की जागीर का प्रबंध करने के लिए उन्होंने दादाजी कोण्डदेव को नियुक्त कर दिया।
इस समय शिवाजी मात्र 7 – 8 वर्ष के थे। दादाजी कोण्डदेव जनता में एक लोकप्रिय व्यक्ति थे। उनकी कर्त्तव्य निष्ठा , देश भक्ति तथा निर्लिप्तता सर्वथा अनुपम थी। वह शिवाजी को जिस रूप में देखना चाहते थे उसके लिए कोई भी प्रयत्न करने में कुछ भी कमी नहीं की ।
यद्यपि उनकी तुलना मौर्यवंश के संस्थापक आचार्य चाणक्य से तो नहीं की जा सकती , तथापि उनका अवदान भी इतिहास में अपना उदाहरण है।
माता जीजाबाई ने सन् 1640 में फाल्टन के निंबालकर परिवार की कन्या सईबाई से उनका विवाह कर दिया । विवाह के समय शिवाजी की उम्र लगभग 12 – 13 वर्ष की थी।
जब शाहजी आदेशानुसार बीजापुर दरबार में गए तो वह अपने पुत्र शिवाजी को लेकर गए। वहा जाने पर सभी को माथा भूमि को लगा सजदा करना पड़ता था। शाहजी द्वारा किया गया सजदा शिवाजी को अपमान पूर्ण लगा। शिवाजी ने केवल मराठा ढंग से साधारण नमस्कार किया।
शिवाजी के इस व्यवहार को बादशाह ने अपने लिए अशिष्टता और अपमान जनक समझा। शिवाजी ने मुड़कर शाहजी की ओर देखा और कहा ” बादशाह मेरे राजा नहीं है मैं इनके आगे सिर नहीं झुका सकता , मेरा सिर माता तुलजा भवानी और आपकों छोड़कर अन्य किसी के आगे नहीं झुक सकता । “
दरबार में सनसनी फेल गई। शाहजी ने सहमते हुए प्रार्थना की क्षमा करें। यह अभी नादान है। और शिवाजी को घर जानें की आज्ञा दे दी। शिवाजी निर्भीकतापूर्वक दरबार से घर चले गए।
एक बार जब एक कसाई एक गाय को वध के लिए ले जा रहा था यह देखकर शिवाजी क्रोधित हो गए। उन्होंने म्यान से तलवार निकाल कर कसाई का सिर उड़ा दिया। इस मामले की जांच हुई। अतः भावी विपत्ति से बचने के लिए उन्हें शीघ्र ही बीजापुर छोड़ देना पड़ा।
छत्रपति शिवाजी महाराज धीरे धीरे अपने कार्यों और उत्तरदायित्वों को समझने लगे। उनके विचारों में भी अवस्था के साथ ही परिपक्वता आती गई। धीरे धीरे शिवाजी ने अपने बाल्यकाल के मित्रों का एक संगठन बना लिया। यह संगठन बलिदान करने को भी तैयार रहता। शिवाजी स्वतंत्र राज्य की स्थापना करने के लिए कटिबद्ध हो गए।
अपने लोगों का उत्साह बढ़ाने के लिए मुसलमानों के अत्याचारों का वर्णन करते हुए शिवाजी कहते – ” विदेशी मुसलमान हमारे देश और धर्म पर अत्याचर कर रहे हैं। क्या इन अत्याचारों का बदला लेना हमारा धर्म नहीं। “ इन आक्रांताओ के दिए हुए पुरुस्कारों तथा अपनी पैतृक संपत्ति से ही हम क्यों संतुष्ट रहे। हम हिन्दू हैं , यह सारा देश हमारा है फिर भी इस पर मुगलों का शासन है। वे हमारे मंदिरों को अपवित्र करते हैं। मूर्तियों को तोड़ते हैं। हमारे धन को लूटते हैं। हमारे देशवासियों को बलात मुसलमान बनाते हैं और गाय की हत्या करते हैं। अब हम इस व्यवहार को सहन नहीं करेंगे।
हमारी भुजाओं में बल है। अपने पवित्र धर्म की रक्षा के लिए अब हमें तलवारें खींच लेनी होगी। अपनी जन्मभूमि को स्वतंत्र करेंगे। अपने प्रयासों से नया हिंदवी स्वराज बनाएंगे। हम अपने पूर्वजों के समान ही वीर और योग्य है यदि हम इस पावन कार्य को प्रारंभ करे तो निश्चय ही ईश्वर हमारी सहायता करेगा । “
शिवाजी के इन शब्दों को सुनकर उनके मित्रों मे जोश भर गया एवम् मावल की बारह घाटियों को अपने पूर्ण अधिकार में ले लिया। शीघ्र ही कोढाना दुर्ग पर भी अपना अधिकार करके उसका नाम बदलकर सिंहगढ़ रख दिया । इस समाचार के बीजापुर पहुंचने पर शाहजी को दरबार से हटा दिया गया।
खण्डोजी और बाजी घोरपड़े को शिवाजी और कोण्डदेव के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए आदेश दिया । लेकिन वह भी शाहजी के परम मित्र एवम् शिवाजी के प्रबल समर्थक थे इसलिए उन्होंने इस विषय में कोई कार्यवाही नहीं की ।
अपनी सफलता से शिवाजी का उत्साह बढ़ा । अतः 30 मार्च 1645 के शुभ दिन उन्होंने स्वतत्र हिंदवी स्वराज की स्थापना करने का व्रत लिया। इसके बाद उन्होंने अपनी शासनीय मुहर चलाई। शासन का संचालन करने के लिए नए पदों का सृजन और उन पर नियुक्तियां की ।
सर्वप्रथम उन्होंने आसपास के किलो को अधिकार में कर लेने का निर्णय किया और कुछ ही समय में तोरण दुर्ग व चाकण पर अधिकार कर लिया। शिवाजी ने तोरण दुर्ग की मरम्मत का कार्य भी प्रारंभ कर दिया । इसी मरम्मत कार्य में खुदाई होने पर उन्हें पूर्वोक्त गढ़ा धन मिला। जिससे शिवाजी की सभी समस्याओं का समाधान हो गया।
छत्रपति शिवाजी महाराज ने विशाल मात्रा में अस्त्र शस्त्र आदि खरीदे तथा एक नए किले का निर्माण कार्य प्रारंभ कर दिया । यह किला तोरण दुर्ग से तीन मील दूर दक्षिण पूर्व में मौरबुध नामक पहाड़ी पर बनाया गया।

