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    Homeइतिहासऐतिहासिक घटनाएंचित्तौड़गढ़ के अतुलनीय जौहर और शाके

    चित्तौड़गढ़ के अतुलनीय जौहर और शाके

    चित्तौड़गढ़ का विशाल दुर्ग केवल पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि राजपूती शौर्य, बलिदान और क्षत्रिय धर्म का जीवंत इतिहास है। इसकी प्रत्येक ईंट गवाह है उस रणचंडी तेज की, जब राजपूत वीरों ने धर्म, स्वतंत्रता, आन-बान-शान के लिए केसरिया बाना धारण कर रणभूमि में प्राण न्यौछावर कर दिए।

    Table of Contents

    यह दुर्ग साक्षी है उन महान वीरांगनाओं के अग्नितेज का, जिन्होंने एक नहीं, तीन-तीन बार जौहर की ज्वाला को प्रज्वलित किया और आने वाली पीढ़ियों को यह शिक्षा दी कि –

    “शील और सतीत्व से बढ़कर इस पृथ्वी पर और कुछ भी नहीं है।”

    विश्व के इतिहास में इतनी अधिक विशेषताओं वाला और कोई स्थान नहीं होगा।

    जौहर और शाके

    जौहर और शाके केवल इतिहास की घटनाएँ नहीं, बल्कि क्षत्रिय आत्मसम्मान की अग्नि में तपे अमर प्रतीक हैं।

    जौहर वह क्षण था, जब अस्मिता की रक्षा हेतु वीरांगनाएँ अग्निकुंड को अंगीकार कर अपने शील की मर्यादा को अक्षुण्ण रखती थीं। यह त्याग नहीं, बल्कि आत्मगौरव की सर्वोच्च अभिव्यक्ति थी।

    शाका वह व्रत था, जब केसरिया बाना धारण कर क्षत्रिय वीर अंतिम युद्ध के लिए निकलते, विजय या वीरगति-दोनों को समान भाव से स्वीकार करते।

    इन दोनों की संगति में एक ही संदेश गूंजता है –
    “जीवन से बढ़कर है मर्यादा, और मर्यादा हेतु प्राणों का अर्पण ही सच्चा वीरधर्म है।”

    चित्तौड़गढ़ का प्रथम जौहर और शाका (25 अगस्त, 1303 ई.)

    क्षत्रिय संस्कृति

    ऐतिहासिक पृष्ठभूमि – अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण

    चित्तौड़ की प्राचीर प्रथम बार 25 अगस्त, सन् 1303 में जौहर की ज्वाला से तपी थी। उस समय चित्तौड़पति महारावल रतनसिंह जी थे। दिल्ली के आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया।

    छह महीने तक राजपूत योद्धाओं ने डटकर मुकाबला किया। इस लंबे युद्ध में अनेक वीर वीरगति को प्राप्त हुए। दुर्ग की आंतरिक व्यवस्था गड़बड़ा गई और रसद सामग्री भी समाप्त होने लगी। गौरा और बादल ने इस युद्ध में अदम्य साहस का परिचय दिया।

    रानी पद्मिनी का जौहर – 16,000 क्षत्राणियों का अग्नितेज

    अंततः कोई अन्य विकल्प न देखकर राजपूत वीरों ने शाका करने का निर्णय लिया। रानी पद्मिनी के नेतृत्व में सोलह हजार क्षत्राणियों ने दुर्ग के गोमुख के उत्तर वाले मैदान में जौहर किया।

    यह था चित्तौड़ का प्रथम जौहर – इतिहास का वह स्वर्णिम अध्याय, जहाँ नारियों ने सतीत्व की रक्षा के लिए अग्नि में प्रवेश किया।

    शाका – जब वीरों ने जौहर की राख माथे पर लगाई

    जौहर के तत्पश्चात राजपूत वीरों ने केसरिया बाना धारण किया, जौहर की भस्म को सिर पर लगाकर दुर्ग के द्वार खोल दिए। वीर योद्धा शेर की भांति आक्रांताओं पर टूट पड़े। किन्तु संख्या में कम होने के कारण अंततः एक-एक कर वीरगति को प्राप्त हुए।

    अलाउद्दीन युद्ध तो जीत गया, किन्तु हाथ उसके कुछ नहीं लगा – सिर्फ राख की ढेरी के सिवाय।

    ऐतिहासिक स्पष्टीकरण – शीशे वाली कहानी भ्रामक है

    इतिहास में बाद में यह नैरेटिव जोड़ दिया गया कि रानी पद्मिनी की सुंदरता और उनका शीशे में प्रतिबिम्ब आक्रांता को दिखाया गया। यह पूरी तरह से गलत है।

    जो क्षत्रिय अपने धर्म की रक्षा के लिए बलिदान को त्यौहार मानते हों, ऐसा कैसे संभव हो सकता है? और न ही उस समय शीशा या दर्पण हुआ करता था।

    अधिक जानकारी: जौहर: सतीत्व रक्षार्थ सर्वस्व समर्पण

    चित्तौड़गढ़ का द्वितीय जौहर और शाका (8 मार्च, 1535 ई.)

    पृष्ठभूमि – महाराणा सांगा के बाद का संकट

    चित्तौड़ का दूसरा जौहर 8 मार्च, सन् 1535 को हुआ। महाराणा सांगा के निधन के बाद उनके द्वितीय पुत्र रतन सिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठे। उनके असामयिक निधन के बाद छोटे भाई विक्रमादित्य शासक बने।

    इसी दुर्बलता का लाभ उठाकर गुजरात के तुर्क आक्रांता बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया।

    हाड़ी रानी कर्मवती का आह्वान

    ऐसे विकट समय में हाड़ी रानी कर्मवती ने सभी सामंतों को पत्र लिखा –

    “यह किला तुम्हें सौंपा जाता है। आप अपने वंश की मर्यादा का ख्याल कर जैसा उचित समझो वैसा करो।”

    इस भावपूर्ण अपील का असर यह हुआ कि मेवाड़ के सभी सामंत आपसी मतभेद भुलाकर प्रतापगढ़ के रावत बाघसिंह जी के नेतृत्व में बहादुरशाह के विरुद्ध रणक्षेत्र में उतर आए।

    रणचण्डी वीरांगना जवाहर देवी का शौर्य

    घमासान युद्ध हुआ। बहादुरशाह के पास शक्तिशाली तोपखाना था। तोपों के गोलों से किले की दीवारें टूट गईं। युद्धभूमि में अनेक राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए।

    अंत में महाराणा सांगा की राठौड़ रानी – रणचण्डी वीरांगना जवाहर देवी ने पुरुष वेश धारण कर अपनी वीरांगनाओं की सेना के साथ दुश्मनों पर टूट पड़ीं और वीरगति को प्राप्त हुईं।

    महारानी कर्मवती का जौहर – 13,000 क्षत्राणियों का बलिदान

    सभी मोर्चे ध्वस्त हो गए। राजमाता कर्मवती ने प्रतिकूल परिस्थितियों में जौहर का निर्णय किया। तेरह हजार क्षत्राणियों के साथ सार्गदेश्वर (जौहर स्थल) मंदिर के प्रांगण में अग्नि में प्रवेश किया।

    दुर्ग में शेष बचे वीरों ने केसरिया बाना पहनकर दुश्मनों पर हमला बोल दिया। रावत बाघसिंह जी ने अप्रतिम शौर्य का प्रदर्शन करते हुए पाडन पोल के मोर्चे पर घनघोर युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुए।

    चित्तौड़गढ़ का तृतीय जौहर और शाका (23 फरवरी, 1568 ई.)

    ऐतिहासिक पृष्ठभूमि – अकबर का आक्रमण

    चित्तौड़ का तीसरा जौहर और शाका 23 फरवरी, 1568 की रात को हुआ। मुगल आक्रमणकारी अकबर के सामने भारत के अधिकांश शासकों ने समर्पण कर दिया था। ऐसे समय में केवल मेवाड़ ने ही प्रतिरोध किया

    परिणामतः अकबर ने लगभग तीन लाख सैनिकों के साथ चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया।

    महाराणा उदयसिंह का चित्तौड़ छोड़ना

    मेवाड़ के सामंतों ने परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए निर्णय किया कि महाराणा उदयसिंह राजपरिवार सहित किले से निकल जाएं। युवराज प्रताप चित्तौड़ में रहकर युद्ध करना चाहते थे, किन्तु सेनापति राठौड़ जयमल ने उनकी बात स्वीकार नहीं की।

    महाराणा उदयसिंह को रावत नेतसी (नेत सिंह) के साथ चित्तौड़ से बाहर भेजा गया। मेवाड़ की शक्ति को संगठित करने का भार साईदास सलूंबर, सिसोदिया पत्ता केलवा और राठौड़ जयमल बदनौर पर छोड़ा गया। दुर्ग में आठ हजार राजपूत योद्धा रह गए थे।

    जयमल का अप्रतिम उत्तर – इतिहास का स्वर्णिम अक्षर

    युद्ध प्रारंभ हुआ। मेवाड़ी वीरों की बहादुरी के आगे मुगल सेना के छक्के छूट गए। अकबर ने राठौड़ जयमल को अपनी ओर मिलाने का प्रयास किया। स्वामिभक्त वीरवर जयमल ने यह ऐतिहासिक उत्तर दिया –

    “जैमल लिखें जवाब जद, सुणजे अकबर शाह।
    आण फिरे गढ़ उपरा, टूटा सिर पतशाह।।
    है गढ़ म्हारो हूं धणी, असुर फिरे किम आन।
    कूंची गढ़ चित्तौड़ री, दीवी मुझ दीवाण।।”

    अर्थात: अकबर शाह सुनिए – सिर के टुकड़े होने पर ही चित्तौड़गढ़ पर तेरी दुहाई फिर सकती है। चित्तौड़ मेरा है, मैं ही यहाँ का स्वामी हूँ। एकलिंग जी के दिवाण महाराणा ने इस किले की कुंजी मुझे सौंपी है।

    वीरगति और जौहर – रानी फूल कुंवर का नेतृत्व

    एक रात जयमल दीवार की मरम्मत करवा रहे थे कि अकबर की संग्राम बंदूक की गोली उनके पैर में लगी, फिर भी वे दुर्ग की रक्षा में लगे रहे।

    पराजय को समीप देखकर 23 फरवरी 1568 की रात को तीन अलग-अलग स्थानों पर लगभग सात हजार क्षत्राणियों ने अपने तेज को अग्नि के तेज में मिला दिया। जयमल की बहन तथा पत्ता की बहन रानी फूल कुंवर ने इस जौहर की अगवानी की।

    अंतिम शाका – केसरिया बाना और हर-हर महादेव

    प्रातःकाल शेष बचे वीरों ने गोमुख कुण्ड में स्नान किया, तुलसी-गंगा जल पीया, जौहर की राख माथे पर लगाई, केसरिया बाना पहना और दुर्ग के द्वार खोल दिए।

    “हर-हर महादेव” के घोष से आकाश गूंज उठा।

    घायल जयमल को राठौड़ कल्लाजी ने कंधे पर बिठाया। मेवाड़ी वीरों का रौद्र रूप देखकर अकबर स्वयं कांप उठा। जयमल के अनूज राठौड़ इसरदास ने अकबर की सुरक्षा पंक्ति को भेदकर उसके हाथी तक पहुँच गए। किन्तु देश के गद्दार राजा भगवानदास ने पीछे से वार कर उस वीर का मस्तक काट दिया।

    राजपूत वीरों ने इतना प्रचंड युद्ध किया कि अकबर की सेना को तीन बार पीछे हटना पड़ा। इसी कारण कायर अकबर ने तीस हजार निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया।

    FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

    प्रश्न 1: चित्तौड़गढ़ में कुल कितने जौहर हुए?

    उत्तर: चित्तौड़गढ़ में तीन बार जौहर हुए – 1303 ई. (रानी पद्मिनी), 1535 ई. (रानी कर्मवती), और 1568 ई. (रानी फूल कुंवर)।

    प्रश्न 2: चित्तौड़ का पहला जौहर कब और किसके नेतृत्व में हुआ?

    उत्तर: चित्तौड़ का प्रथम जौहर 25 अगस्त, 1303 को रानी पद्मिनी के नेतृत्व में हुआ था।

    प्रश्न 3: चित्तौड़ का दूसरा जौहर किसके खिलाफ हुआ?

    उत्तर: दूसरा जौहर गुजरात के तुर्क आक्रांता बहादुरशाह के खिलाफ हुआ, जिसका नेतृत्व हाड़ी रानी कर्मवती ने किया।

    प्रश्न 4: रणचण्डी वीरांगना जवाहर देवी कौन थीं?

    उत्तर: वह महाराणा सांगा की राठौड़ रानी थीं, जिन्होंने पुरुष वेश धारण कर बहादुरशाह की सेना पर आक्रमण किया और वीरगति प्राप्त की।

    प्रश्न 5: चित्तौड़ का तीसरा जौहर किस मुगल शासक के खिलाफ हुआ?

    उत्तर: तीसरा जौहर मुगल बादशाह अकबर के खिलाफ हुआ, जिसका नेतृत्व रानी फूल कुंवर ने किया।

    प्रश्न 6: जयमल और पत्ता कौन थे?

    उत्तर: जयमल राठौड़ और पत्ता सिसोदिया चित्तौड़ के महान योद्धा थे, जिन्होंने तीसरे जौहर और शाके में अप्रतिम शौर्य दिखाया।

    प्रश्न 7: क्या रानी पद्मिनी का शीशे वाला प्रसंग सच है?

    उत्तर: नहीं, यह पूरी तरह से गलत और बाद में जोड़ा गया नैरेटिव है। क्षत्रिय अपने धर्म की रक्षा के लिए ऐसा नहीं कर सकते थे।

    निष्कर्ष – गर्व है इन बलिदानों पर

    चित्तौड़गढ़ के जौहर और शाके केवल इतिहास की घटनाएँ नहीं, बल्कि उस अमर आत्मबल और स्वाभिमान के प्रतीक हैं, जिसने मेवाड़ की धरती को युगों-युगों तक गौरवान्वित किया। चित्तौड़गढ़ दुर्ग की ये गाथाएँ हमें यह संदेश देती हैं कि विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म, मर्यादा और सम्मान की रक्षा सर्वोपरि है।

    इन अतुलनीय बलिदानों की स्मृति आज भी प्रत्येक हृदय में साहस, त्याग और अडिग संकल्प की प्रेरणा जागृत करती है। यह केवल अतीत का गौरव नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी वह प्रकाश है, जो हमें अपनी संस्कृति, अस्मिता और आदर्शों पर अटल रहने की दिशा दिखाता है।

    क्षत्रिय वीरों ने अपने धर्म, स्वतंत्रता, आन-बान-शान के लिए केसरिया बाना धारण किया। और इन महान वीरांगनाओं ने अपने शील और सतीत्व की रक्षा के लिए जो कदम उठाया – उस पर केवल क्षत्रिय वंश को ही नहीं, अपितु संपूर्ण हिंदू राष्ट्र को गर्व है।

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    कमेंट में अवश्य बताएँ – चित्तौड़गढ़ के इन तीनों जौहर में से कौन सी घटना आपको सबसे अधिक प्रभावित करती है?

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    खास आपके लिए –

    Bhanwar Singh Thada
    Bhanwar Singh Thadahttp://kshatriyasanskriti.com
    Guardian of Kshatriya heritage and warrior traditions. Promoting Rajput history, dharmic values, and the timeless principles of courage, honor, and duty. Dedicated to cultural preservation and inspiring pride in our glorious past.
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