महाराज शक्तिसिंह जी का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया (1542 ई. ) मेवाड़ राजपरिवार में हुआ, वे महाराणा उदय सिंह के द्वितीय पुत्र एवं हिंदुआ सूरज महाराणा प्रताप के छोटे भाई थे। स्वाभिमानी महाराज शक्ति सिंह एक योद्धा ही नहीं बल्कि एक कूटनीतिज्ञ भी थे। उन्होंने अपनी कूटनीति से अकबर के षड़यंत्र को सफल नहीं होने दिया। प्रसिद्ध सिसोदिया वंश के शक्तावत शाखा के संस्थापक थे।
महाराज शक्तिसिंह जी
प्रारंभिक जीवन
महाराज शक्तिसिंह जी का जन्म कुम्भलगढ़ में हुआ। वे महाराणा उदय सिंह एवं रानी सज्जा बाई सोलंकी के पुत्र थे। उनके छोटे भाई विरमदेव थे। बाल्यकाल से ही शक्ति सिंह जी को क्षत्रियोचित संस्कार युद्धकला, घुड़सवारी और अन्य राजसी कौशल में प्रशिक्षित किया गया था। उन्होंने अपने प्रारंभिक जीवन में ही अपनी वीरता और साहस का प्रदर्शन किया।
महाराज शक्तिसिंह जी का नाराज होना
महाराणा उदयसिंह जी के दरबार में हथियार बेचने आया , महाराणा ने तलवार की परख के लिए एक महीन कपड़ा तलवार पर फेंका जिससे कपड़े के दो टुकड़े हो गए। कुँवर शक्ति सिंह ने तलवार की धार देखने के लिए अपना अंगूठा चीर दिया। महाराणा को यह राजमर्यादा का उल्लंघन लगा तो शक्तिसिंह जी को दरबार से बाहर निकाल दिया। जिससे शक्तिसिंह जी महाराणा उदय सिंह से नाराज हो गए।
शक्तिसिंह जी का एक बार महाराणा प्रताप से किसी बात पर विवाद हो गया, बीच-बचाव करने आए राजपुरोहित नारायण दास पालीवाल विवाद रोक न सके तो उन्होंने आत्महत्या कर ली। जिससे प्रताप ने नाराज हो कर शक्तिसिंह को मेवाड़ से निर्वासित कर दिया।
महाराज शक्तिसिंह जी का मेवाड़ से निर्वासन
महाराज शक्तिसिंह जी का धौलपुर जाना
अकबरनामा का लेखक अबुल फजल लिखता है कि – ” शहंशाह ने धौलपुर में पड़ाव डाला, जहाँ उनकी मुलाकात राणा उदय सिंह के बेटे शक्ता से हुई। शहंशाह ने शक्ता से कहा की हम मेवाड़ पर हमला करने जा रहे है, क्या तुम भी साथ चलोगे ? यह सुनते ही शक्ता गुस्से में आकार शहंशाह को सलाम किए ही बगैर चले गए “
कुँवर शक्ति सिंह ने अकबर के हमले और उसकी तैयारियों की सूचना शीघ्र ही चित्तौड़ आकर महाराणा को बताई। इस गुप्त सूचना की वजह से मेवाड़ में युद्ध की तैयारी हो सकी एवं मेवाड़ और राजपरिवार की सुरक्षा हो सकी।
महाराज शक्तिसिंह जी का डूंगरपुर जाना
महाराज शक्ति सिंह मेवाड़ से निर्वासित होकर डूंगरपुर महारावल आसकरण के पास चले गए । सन् 1572 ई. से 1576 ई. तक चार वर्ष तक रहे। अपने स्वाभिमानी स्वभाव के कारण डूंगरपुर में जगमाल (मंत्री) का वध कर देने पर शक्ति सिंह को डूंगरपुर छोड़ना पड़ा।
हल्दीघाटी युद्ध में योगदान
हल्दीघाटी युद्ध में महाराज शक्ति सिंह ने मुगलों की ओर से भाग नहीं लिया, यदि भाग लिया होता तो बदायूनी अवश्य लिखता।
महाराज शक्ति सिंह का सबसे महत्वपूर्ण योगदान हल्दीघाटी के युद्ध के समय देखा गया था। हल्दीघाटी का युद्ध 1576 में महाराणा प्रताप और मुग़ल सम्राट अकबर के सेनापति मान सिंह के बीच लड़ा गया था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की सेना और मुग़ल सेना के बीच कड़ा मुकाबला हुआ था।
युद्ध के अंतिम समय में शक्ति सिंह ने महाराणा प्रताप का पीछा कर रहे दो तुर्क खुरसान खां और मुल्तान खां को मार कर अपना घोडा महाराणा प्रताप को भेंट किया। नाराजगी के लिए क्षमा मांगी । फिर दोनों भाइयों ने स्वामिभक्त चेतक का अंतिम संस्कार किया। महाराज शक्ति सिंह का यह कृत्य उनके भाई के प्रति उनका समर्पण और मेवाड़ के प्रति निष्ठा दर्शाता है ।
आक्रान्ताओं से संघर्ष
हल्दीघाटी युद्ध के बाद महाराज शक्तिसिंह ने भीण्डर के पास स्थित वैणगढ़ दुर्ग पर तैनात मुगलों को मारकर विजय प्राप्त की, वैणगढ़ से महाराज शक्तिसिंह ने भैंसरोडगढ़ दुर्ग पर आक्रमण किया। भैंसरोडगढ़ में तैनात मुगलों से लड़ाई हुई जिसमें शक्तिसिंह विजयी हुए। महाराज शक्तिसिंह जी उदयपुर में महाराणा प्रताप से मिलने पहुंचे तब ये दुर्ग उन्होंने महाराणा को भेंट किया।
महाराणा प्रताप ने शक्तिसिंह जी के कार्यों से प्रसन्न होकर दुर्ग फिर से शक्तिसिंह जी को सौंप दिया और कहा कि “इस दुर्ग में हमारी सभी माताओं और बहनों को रखा जाए तथा उनकी सुरक्षा का दायित्व आपका और वीरमदेव (शक्तिसिंह जी के छोटे भाई) का होगा”। इन दोनों भाईयों ने पन्द्रह वर्षों तक राजपरिवार की महिलाओं की सुरक्षा रखा।
मन्दसौर (दशोर) के मिर्जा बहादुर ने भीण्डर पर आक्रमण किया। उस समय भीण्डर हल्दीघाटी युद्ध में वीरगति पाने वाले मानसिंह जी सोनगरा (महाराणा प्रताप के मामा) के पुत्र अमरसिंह जी सोनगरा के पास थी। अमरसिंह जी सोनगरा ने शक्तिसिंह जी से सहायता मांगी, तो शक्तिसिंह जी ने मिर्जा बहादुर को पराजित कर भीण्डर की रक्षा की, इस बात से महाराणा प्रताप काफी प्रसन्न हुए और उन्होंने शक्तिसिंह जी को तुरन्त बुलावाया और अमरसिंह जी सोनगरा को कोई दूसरी जागीर देकर भीण्डर की जागीर शक्तिसिंह जी को दी, जहां वर्तमान में शक्तिसिंह जी के वंशज महाराज साहब रणधीर सिंह जी भींडर है।
साथ ही साथ महाराणा प्रताप ने शक्तिसिंह जी को बेगूं की जागीर भी प्रदान की, चावण्ड बसाने के बाद महाराणा प्रताप ने सूरत के मुगल सूबेदार से युद्ध किया था। इस युद्ध में शक्तिसिंह जी अपने पुत्रों सहित महाराणा प्रताप के साथ रहे।
शक्तिसिंह जी के 17 पुत्र हुए, जिनमें से 11-12 पुत्र महाराणा अमरसिंह जी के शासनकाल में हुए ऊँठाळा (वर्तमान में वल्लभनगर) के भीषण युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए। महाराज शक्ति सिंह का योगदान मेवाड़ की स्वतंत्रता की लड़ाई में महत्वपूर्ण था और उन्होंने मुग़लों के खिलाफ संघर्ष में अपनी भूमिका निभाई। शक्ति सिंह का जीवन और कार्य उनके साहस, निष्ठा और परिवार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का प्रतीक हैं, वे अपने भाई महाराणा प्रताप के प्रति अत्यंत समर्पित थे और उन्होंने अपने जीवन को उनके संघर्ष और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया।
महाराज शक्ति सिंह ने बाद में मेवाड़ की सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उन्होंने अपने राज्य की रक्षा और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया। महाराज शक्ति सिंह को मेवाड़ के इतिहास में एक बहादुर योद्धा और निष्ठावान भाई के रूप में सम्मानित किया जाता है। महाराज शक्ति सिंह ने अपने भाई के प्रति निष्ठा और समर्पण का प्रदर्शन किया और मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए उनके साथ खड़े हो गए। उन्होंने अपने बाकी जीवन में मेवाड़ की सेवा की और कई युद्धों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। महाराज शक्ति सिंह की प्रशंसा में मेवाड़ में यह दोहा बहुत प्रसिद्ध है –
शक्ति थारी शक्ति नु हरि जाने ना नो, सुर थारी हुंकार महाकाल सु निकट ना आये।
महाराज शक्तिसिंह जी का स्वर्गवास
महाराज शक्ति सिंह एवं उनकी पीढ़ियों ने अपना जीवन मेवाड़ के लिए समर्पित कर दिया और अंत तक अपनी निष्ठा पर अडिग रहे। अस्वस्थता के कारण महाराज शक्तिसिंह जी का स्वर्गवास सन् 1594 ई. में 54 वर्ष की आयु में महाराणा प्रताप की मौजूदगी में हुआ भैसरोड़गढ़ में हुआ जहाँ उनकी याद में स्मारक बना हुआ है।

स्वाभिमानी महाराज शक्ति सिंह एक योद्धा ही नहीं बल्कि एक कूटनीतिज्ञ भी थे। उन्होंने अपनी कूटनीति से अकबर के षड़यंत्र को सफल नहीं होने दिया। इतिहास के ऐसे योद्धा जिन्हे महाराणा प्रताप के विरुद्ध युद्ध करने के लिए दोषी ठहराये जाते है, जबकि कई बार उन्होंने आक्रान्ताओं को पराजित किया।
निष्कर्ष:
महाराज शक्तिसिंह जी का जीवन इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि स्वाभिमान और कर्तव्य का टकराव कभी-कभी परिवार में दरारें पैदा कर देता है, लेकिन रक्त संबंधों से ऊपर उठकर भाईचारे का सच्चा प्रेम हर संकट में विजयी होता है।
चाहे वह अकबर के षड़यंत्र को नाकाम करना हो, हल्दीघाटी में भाई को जान बचाना हो, या फिर माताओं-बहनों की सुरक्षा के लिए पन्द्रह वर्षों तक संकट मोल लेना हो – शक्तिसिंह ने हर कदम पर साबित किया कि वे सच्चे योद्धा थे, जिनके लिए मेवाड़ और परिवार की इज्जत सर्वोपरि थी।
“शक्ति थारी शक्ति नु हरि जाने ना नो” – यह दोहा आज भी मेवाड़ की वीर भूमि में गूंजता है, जो बताता है कि शक्तिसिंह जी की शक्ति का कोई सानी नहीं था।
आज शक्तावत शाखा के रूप में उनकी विरासत जीवित है। उनके वंशज आज भी उसी शौर्य और स्वाभिमान के प्रतीक हैं, जिसकी नींव महाराज शक्तिसिंह जी ने रखी थी।
संदेश:
“इतिहास हमेशा वही नहीं लिखता जो घटता है, बल्कि कभी-कभी वही लिखता है जो दिखता है। महाराज शक्तिसिंह जी जैसे वीरों को सही परिप्रेक्ष्य में समझना हमारा कर्तव्य है। वे महाराणा प्रताप के छोटे भाई ही नहीं, बल्कि मेवाड़ के बड़े योद्धा थे – जिन्होंने कभी अपने परिवार से मुँह नहीं मोड़ा, बल्कि हर बार संकट में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे।”
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