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    रूठी रानी उमादे भटियाणी

    जैसलमेर की राजकुमारी थी उमादे भटियाणी को राजस्थान की रूठी रानी उमादे भटियाणी के नाम से जाना जाता है। वह जैसलमेर के राजा रावल लूणकरण की बेटी थीं। एवं जोधपुर के राजा राव मालदेव की परिणीता थीं। उमादे भटियाणी मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह की रानी धीरबाई भटियाणी की बहन थी। स्वाभिमानी उमादे भटियाणी जीवनभर अपने पतिदेव मालदेव से रूठी रही। लेकिन राजा मालदेव के स्वर्गवास के बाद सती हुई ऐसे अनूठे उदाहरण इतिहास में शायद ही मिलेंगे।

    जैसलमेर की राजकुमारी उमादे भटियाणी

    राजस्थान की माटी में वीरता ही नहीं, अदम्य स्वाभिमान भी रचा-बसा है। यहाँ की रानियों ने न केवल युद्ध भूमि में शौर्य दिखाया, बल्कि अपने मान-सम्मान के लिए राजसी ठाट-बाट तक को ठुकरा दिया। ऐसी ही एक अनोखी और अद्वितीय शख्सियत हैं – जैसलमेर की राजकुमारी उमादे भटियाणी, जिन्हें इतिहास ‘राजस्थान की रूठी रानी‘ के नाम से याद करता है।

    जिनके पति थे मारवाड़ के पराक्रमी शासक राव मालदेव – जिन्होंने 52 युद्ध लड़े, जिन्हें फारसी इतिहासकार ‘हिंदुस्तान का हशमत वाला बादशाह’ कहते थे। फिर भी, यही शक्तिशाली राजा अपनी एक रानी को मनाने में जीवनभर असफल रहा। रानी उमादे ने न सिर्फ अपने पति का साथ छोड़ा, बल्कि जीवनभर उनका मुख न देखने की कसम खा ली।

    लेकिन सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया, जब इसी ‘रूठी रानी’ ने अपने पति की मृत्यु के बाद उनकी पगड़ी के साथ चिता में प्रवेश कर सती होने का फैसला किया – ऐसा विरल उदाहरण न तो राजस्थान के इतिहास में मिलता है और न ही विश्व के किसी अन्य प्रेम-प्रसंग में।

    जोधपुर के राजा राव मालदेव

    जोधपुर के राजा राव मालदेव अपने समय के राजपुताना के शौर्यवान एवं सर्वाधिक शक्तिशाली शासक थे। उन्होंने जोधपुर राज्य की सीमाओं का काफी विस्तार किया था। 52 युद्धों के विजेता राव मालदेव का छोटे बड़े 58 परगनों पर अधिकार रहा। इतिहास के फारसी लेखकों ने राव मालदेव को “हिन्दुस्तान का हशमत वाला राजा” की उपाधि से नवाजा गया।

    लेकिन ये परम शूरवीर राजा अपनी एक रूठी रानी को पुरी जिन्दगी मना नही सके। राव मालदेव अपनी उस सुन्दर और स्वाभिमानी रानी को मनाने में कामयाब नहीं हो पाए। और रानी उमादे भटियाणी मरते दम तक अपने शूरवीर पति राव मालदेव से रूठी रही।

    राजा राव मालदेव और रानी उमादे भटियाणी का विवाह

    जोधपुर के राजा राव मालदेव अपने समय के राजपुताना के सर्वाधिक शक्तिशाली शासक थे। जैसलमेर के राजा रावल लूणकरण ने अपनी बेटी उमादे की शादी का प्रस्ताव राव मालदेव के सामने रखा। जोधपुर के राजा राव मालदेव की बारात शाही लवाजमे के साथ जैसलमेर पहुँची। राजकुमारी उमादे राव मालदेव जैसा शूरवीर और महाप्रतापी राजा को पति के रूप में पाकर बहुत प्रसन्नचित थी। यह बात राजा मालदेव की शादी के समय की है। राव मालदेव का विवाह बैसाख सुदी ४ वि.स. १५९२ को जैसलमेर के राजा राव लुनकरण की राजकुमारी उमादे के साथ हुआ था। उमादे भटियाणी मारवाड़ के राजा मालदेव की दूसरी पत्नी थी।

    रानी उमादे भटियाणी का रूठना

    रानी उमादे ना सिर्फ सुंदर थीं बल्कि वो बेहद स्वाभिमानी भी थीं। किसी बात को लेकर उन्हें अपने पति के साथ तनावपूर्ण सम्बंधों के कारण नाराज हो गई और कवि आसा बारहठ के दोहे की दो पंक्तियों ने रानी उमादे की प्रसुप्त रोषाग्नि को वापस प्रज्वल्लित करने के लिए घी का काम किया। आशा बारहठ के दोहे का भावार्थ इस प्रकार था –

    अर्थात मान रखना है तो पति को त्याग दो और पति रखना है तो मान को त्याग दो, लेकिन दो हाथियों का एक ही स्थान पर बाँधा जाना असंभव है। यह सुनकर रानी उमादे ने प्रण लिया कि आजीवन रावजी का चेहरा नहीं देखूंगी।

    कुछ ख्यातों में वर्णित रानी उमादे विवाह की पहली रात को ही रूठ गई यह असत्य प्रतीत होता है । जब की वास्तविकता में उमादे विवाह के कुछ वर्ष बाद रूठी थी ।

    रानी उमादे भटियाणी को मनाना

    राव मालदेव को अपनी गलती का एहसास हुआ, तो उन्होंने रानी उमादे को मनाने के लिए अपने भतीजे ईश्वरदास व आसा बारहठ को भेजा। काफी मनाने के बाद जब रानी उमादे साथ चलने को तैयार हो गईं, तब मार्ग में कोई बात निकली, जिसके बाद आसा बारहठ ने एक दोहा कहा

    “मान रखे तो पीव तज, पीव रखे तज मान। दो दो गयंद न बंधही, हेको खम्भु ठाण।।”

    अर्थात मान रखना है तो पति को त्याग दो और पति रखना है तो मान को त्याग दो, लेकिन दो हाथियों का एक ही स्थान पर बाँधा जाना असंभव है। यह सुनकर रानी उमादे ने प्रण लिया कि आजीवन रावजी का चेहरा नहीं देखूंगी। कवि के इस दोहे की दो पंक्तियों ने रानी उमादे की प्रसुप्त रोषाग्नि को वापस प्रज्वल्लित करने के लिए घी का काम किया और कहा मुझे ऐसे पति की आवश्यकता नहीं। और रानी ने रथ को वापस जैसलमेर ले जाने का आदेश दे दिया।

    रानी उमादे भटियाणी का सती होना

    क्षत्रिय संस्कृति

    रानी उमादे भटियाणी ने अजमेर के तारागढ़ दुर्ग के निकट महल में रहना शुरू किया और ये रूठी रानी के नाम से प्रसिद्ध हुईं। राव मालदेव ने रूठी रानी के लिए तारागढ़ दुर्ग में पैर से चलने वाली रहट का निर्माण करवाया। जब अजमेर पर अफगान बादशाह शेरशाह सूरी के आक्रमण की संभावना थी, तब रूठी रानी कोसाना चली गईं, रानी उमादे ने कुँवर राम सिंह को अपना दत्तक पुत्र मान लिया तो राव मालदेव ने कुँवर राम सिंह को देश निकाला दे दिया तब वे कुँवर राम सिंह के साथ पहले गूंदोज चली गईं। गूंदोज से कुछ समय बाद रूठी रानी ने मेवाड़ के केलवा में निवास किया।

    कार्तिक सुदी १२ वि.स.१६१९ में जब राव मालदेव जी के निधन का समाचार मिलने पर रानी उमादे को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्हें बहुत कष्ट पहुंचा। रानी भटियाणी ने गंगाजल से स्नान किया, रानी उमादे भटियाणी सोलह शृंगार कर सत्यव्रत धारण किया तो मानो बारह सूर्य की आभा झलक रही थी। राव मालदेव से बहुत प्रेम करने वाली रानी उमादे प्रायश्चित के रूप में उनकी पगड़ी के साथ जलती चिता में प्रवेश कर सती हो गई।

    भ्रामक तथ्य

    1. जैसलमेर के रावल लूणकरण ने मारवाड़ के राव मालदेव से अपनी पुत्री उमादे का विवाह तय किया। राव मालदेव बारात लेकर जैसलमेर पहुंचे। कहते हैं कि रानी उमादे को ये बात पता चली कि उनके पिता रावल लूणकरण राव मालदेव को मरवाना चाहते हैं रानी उमादे ने अपना धर्म निभाते हुए ये बात राजपुरोहित राघवदेव के ज़रिए रावजी को बता दी, तो रावजी बड़े क्रोधित हुए फिर विवाह की पहली रात को राव मालदेव नृत्यगान का आनंद लेते रहे और रानी उमादे के पास नहीं गए रानी उमादे को इस बात से बड़ा क्रोध आया और वे वहां से चली गईं।

    2. जब दोनों की शादी हुई तब उस समय की परंपरा के अनुसार राव लूणकरण ने अपनी बेटी को दहेज में दासिया भी साथ दी। उनमें से एक दासी का नाम था “भारमली” जो दिखने में काफी सुंदर थी। अपनी इसी रूपवती दासी भारमली के चलते ही अपने पति जोधपुर के शक्तिशाली शासक राव मालदेव से रूठ गई थी और मालदेव के लाख कोशिश करने के बाद भी वह आजीवन अपने पति से रूठी ही रही। लेकिन यह वास्तविकता नहीं है।

    3. जोधपुर के राजा राव मालदेव चारों तरफ अपने राज्य जोधपुर की सीमा बढ़ा रहे थे। उस समय राव मालदेव की छवि एक शौर्यवान और शक्तिशाली राजा की थी। अपने प्रसार कार्य में है राव मालदेव ने जैसलमेर पर भी आक्रमण करने का फैसला किया। तो उन्होंने अपनी बेटी उमादे की शादी राव मालदेव से करवाने का प्रस्ताव उनके सामने रखा।

    इतिहास की अन्य रूठी रानियां

    • बाहरवी सदी में रानी सुहावा देवी रूठकर मेवाड़ के मेनाल में स्थित महल में रहने लगीं। उन्होंने सुहावेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण भी करवाया।
    • मेवाड़ के जयसमंद क्षेत्र में एक और रूठी रानी का महल है जिसे रूठी रानी का महल भी कहा जाता है। एक अन्य रूठी रानी का महल ईडर में भी है।

    निष्कर्ष:

    राजस्थान के इतिहास में रानी उमादे भटियाणी का चरित्र अद्वितीय एवं प्रेरणादायक है। वे केवल एक सुंदरी नहीं, अपितु अत्यंत स्वाभिमानी, सत्यनिष्ठ एवं क्षत्राणी धर्म की प्रतिमूर्ति थीं। जैसलमेर की राजकुमारी, जोधपुर की रानी और मेवाड़ की महारानी धीरबाई की बहन होने का गौरव उन्हें प्राप्त था, किंतु उन्होंने अपने पति राव मालदेव से आजीवन रूठे रहने का व्रत लेकर इतिहास में ‘राजस्थान की रूठी रानी‘ के नाम से अमरत्व पा लिया।

    विशेष बात यह है कि वे जीवनपर्यंत पति से रूठी रहीं, फिर भी राव मालदेव के स्वर्गवास के बाद उनकी पगड़ी के साथ सती हो गईं – यह दुर्लभ उदाहरण बताता है कि उनके मन में अपने पति के प्रति गहरा प्रेम और कर्तव्यबोध था, केवल ‘मान’ (अपनी प्रतिष्ठा) के कारण वह उनसे दूर रहीं। कवि आसा बारहठ के दोहे ने इस अग्नि को और प्रज्वलित किया, और उन्होंने अपने फैसले पर दृढ़ता दिखाई।

    रानी उमादे का जीवन इस बात का प्रतीक है कि क्षत्रिय संस्कृति में स्वाभिमान और प्रेम दोनों को समान महत्व दिया जाता था, और कभी-कभी यह द्वंद्व व्यक्ति को जीवनभर अलग रहने पर भी मजबूर कर सकता है। उनकी कहानी राजस्थान की वीरांगनाओं के इतिहास में एक अनोखा अध्याय है – जहाँ रूठना भी एक प्रकार का अटूट प्रेम ही था, और सती होना उसी प्रेम की चरम अभिव्यक्ति।

    इसे भी जानें –

    Bhanwar Singh Thada
    Bhanwar Singh Thadahttp://kshatriyasanskriti.com
    Guardian of Kshatriya heritage and warrior traditions. Promoting Rajput history, dharmic values, and the timeless principles of courage, honor, and duty. Dedicated to cultural preservation and inspiring pride in our glorious past.
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