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बुधवार, जनवरी 7, 2026

जैसलमेर का गोल्डन फोर्ट: मरुस्थल का स्वर्णिम रत्न

जब सूर्य थार की सुनहरी रेत पर अपनी आखिरी किरण बिखेरता है…

1156 ई. की एक शाम। त्रिकूट पहाड़ी पर रावल जैसल पत्थरों की नींव रख रहे थे। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह पीले बलुआ पत्थरों का ढांचा एक दिन दुनिया के सबसे अद्भुत किलों में गिना जाएगा। कि इसकी दीवारें सैकड़ों सालों तक भाटी राजपूतों के शौर्य और त्याग की गवाही देंगी। कि यह किला सिर्फ पत्थरों का महल नहीं, बल्कि एक जीवंत नगर बन जाएगा जहां आज भी हजारों लोग अपना जीवन गुजारते हैं।

Table of Contents

आज जब सूरज की रोशनी इस किले पर पड़ती है, तो यह इतना सुनहरा चमकता है कि लगता है मानो स्वयं सूर्यदेव ने अपना तेज इन दीवारों में उतार दिया हो। इसीलिए तो इसे सोनार किला या गोल्डन फोर्ट कहा जाता है। लेकिन इस किले की असली कहानी, इसके पत्थरों में नहीं, बल्कि उन भाटी योद्धाओं के खून में है जिन्होंने इसकी रक्षा के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।

आइए, आज हम एक ऐसी यात्रा पर चलते हैं जहां इतिहास की माटी में दबी वीरता की कहानियां फिर से जीवित हो उठेंगी। जहां हर पत्थर एक गाथा सुनाता है, हर बुर्ज एक किस्सा कहता है।

भाटी क्षत्रियों का गौरव: जब राजा ने एक संत की बात मानकर इतिहास रच दिया

रावल जैसल भाटी राजपूत वंश के एक महान योद्धा थे। कहते हैं कि वे स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के वंशज यादवों की संतान थे। जब उन्होंने लोद्रवा (उनकी पहली राजधानी) छोड़कर नई राजधानी बसाने का निर्णय लिया, तो उनकी मुलाकात एक स्थानीय सिद्ध संत एसल से हुई। संत ने उन्हें त्रिकूट पहाड़ी की ओर इशारा करते हुए कहा:

“महाराज, यह स्थान स्वयं भगवान कृष्ण द्वारा आशीर्वादित है। यहां बसाया गया दुर्ग शत्रुओं की नजरों से अदृश्य रहेगा।”

और रावल जैसल ने उसी पल निर्णय लिया। 1156 ईस्वी में त्रिकूट पहाड़ी पर जैसलमेर किले की नींव पड़ी। यह सिर्फ एक किला नहीं था – यह भाटी राजपूतों के स्वाभिमान, उनकी सैन्य कुशलता और उनकी अदम्य जिजीविषा का प्रतीक था।

भाटी वंश का इतिहास गौरव और साहस से भरा है। ये योद्धा केवल युद्ध में ही नहीं, बल्कि व्यापार मार्गों की सुरक्षा में भी माहिर थे। जैसलमेर भारत और मध्य एशिया के बीच रेशम मार्ग का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। यहां से गुजरने वाले व्यापारियों से मिलने वाली आय ने इस किले को समृद्ध बनाया। लेकिन साथ ही, यह समृद्धि अनगिनत आक्रमणकारियों को भी आकर्षित करती रही।

राजवंश की विशेषताएं

कालशासकउपलब्धि
1156 ई.रावल जैसलजैसलमेर किले की स्थापना
1294-99 ई.रावल जैत सिंह प्रथमअलाउद्दीन खिलजी के विरुद्ध प्रथम साका
1326 ई.रावल दूदाफिरोज शाह तुगलक के विरुद्ध द्वितीय साका
1550 ई.रावल लूणकरणकंधार के अमीर अली के विरुद्ध अर्ध साका

वास्तुकला का अद्भुत चमत्कार: जब पत्थर भी सोना बन जाते हैं

जैसलमेर किले की वास्तुकला देखकर आप सोचने पर मजबूर हो जाएंगे कि आखिर उस समय के कारीगरों ने यह कैसे कर दिखाया! यह किला त्रिकूट पहाड़ी पर 76 मीटर (250 फीट) की ऊंचाई पर बना है। इसकी दीवारें 460 मीटर लंबी हैं और इसका क्षेत्रफल करीब 1500 फीट लंबा और 750 फीट चौड़ा है।

क्यों कहलाता है गोल्डन फोर्ट ?

दोपहर में जब सूरज अपने चरम पर होता है, तब किले का पीला बलुआ पत्थर सुनहरे रंग में चमकने लगता है। यह दृश्य इतना अद्भुत होता है कि दूर से देखने पर लगता है मानो पूरा किला सोने से ढका हुआ हो। सूर्यास्त के समय तो यह और भी जादुई हो जाता है – जब आकाश नारंगी और लाल रंग में रंगा होता है, तब यह किला मानो आग की लपटों में नहा जाता है।

इस पत्थर की खासियत यह है कि यह थार रेगिस्तान की कठोर धूप और गर्मी को सहने की अद्भुत क्षमता रखता है। साथ ही, रात के समय यह अंदर की गर्मी को बाहर निकाल देता है, जिससे किले के भीतर रहने वालों को राहत मिलती है।

रक्षा प्रणाली: एक अभेद्य दुर्ग की रणनीति

जैसलमेर किले की रक्षा प्रणाली राजपूत सैन्य कौशल का अनूठा नमूना है। किले में चार मुख्य प्रवेश द्वार हैं:

  1. अखाई पोल (पहला द्वार)
  2. सूरज पोल (दूसरा द्वार)
  3. गणेश पोल (तीसरा द्वार)
  4. हवा पोल (चौथा द्वार)

हर द्वार पर दुश्मन को रुकना पड़ता था। और यहीं किले की असली चतुराई थी। द्वार घुमावदार तरीके से बनाए गए थे, जिससे दुश्मन सीधे आगे नहीं बढ़ सकता था। ऊपर से राजपूत योद्धा तीर-कमान, पत्थर, गर्म तेल और पिघला हुआ सीसा बरसाते थे।

क्या आप कल्पना कर सकते हैं? जब दुश्मन की विशाल सेना इन संकरी गलियों में फंस जाती होगी, तब क्या हाल होता होगा! ऊपर से वार, चारों ओर से घेरा, और भागने का कोई रास्ता नहीं। यही तो थी राजपूत रणनीति की खूबी।

जल प्रबंधन: मरुस्थल में जीवन का स्रोत

थार के मरुस्थल में पानी सोने से भी कीमती है। लेकिन जैसलमेर किले के निर्माताओं ने इसका भी शानदार समाधान निकाला था। किले में कई बावड़ियां और जल कुंड बनाए गए थे जो बारिश के पानी को संग्रहित करते थे। ये कुंड इतने बड़े थे कि महीनों तक घेराबंदी के दौरान भी किले के लोगों को पानी की कमी नहीं होती थी।

राजमहल और आवासीय क्षेत्र

किले के अंदर राजपरिवार के लिए बने राज महल आज भी राजपूत स्थापत्य के उत्कृष्ट नमूने हैं। इन महलों में बनी जाली का काम, नक्काशीदार खिड़कियां और रंगीन कांच के झरोखे देखते ही बनते हैं। मर्दाना (पुरुषों का क्षेत्र) और रनिवास (महिलाओं का क्षेत्र) अलग-अलग बने हुए हैं, जो उस समय की सामाजिक व्यवस्था को दर्शाते हैं।

जैन मंदिर: आस्था का अद्भुत केंद्र

जैसलमेर किले में सात जैन मंदिर हैं जो 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच बने हैं। ये मंदिर पीले बलुआ पत्थर पर की गई नक्काशी का अद्वितीय उदाहरण हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध है पार्श्वनाथ मंदिर और ऋषभदेव मंदिर

इन मंदिरों की दीवारों और छतों पर इतनी बारीक नक्काशी है कि देखकर आंखें चौंधिया जाती हैं। हर स्तंभ, हर तोरण, हर मूर्ति पर शिल्पकारों ने महीनों की मेहनत की होगी। और आज जब आप इन मंदिरों में खड़े होकर उस कला को देखते हैं, तो मन श्रद्धा से झुक जाता है – उन अनाम कारीगरों के प्रति जिन्होंने पत्थर में जान डाल दी।

जैसलमेर के ढाई साके: जब वीरता ने इतिहास रच दिया

राजस्थान में “साका” शब्द सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। साका यानी वह समय जब हार तय हो, जब दुश्मन के हाथों मरना निश्चित हो, तब महिलाएं जौहर की अग्नि में कूद जाती थीं और पुरुष केसरिया बाना पहनकर अंतिम युद्ध के लिए निकल पड़ते थे। जैसलमेर में ऐसे ढाई साके हुए। ढाई क्यों? क्योंकि तीसरा साका पूरा नहीं हो पाया था।

प्रथम साका (1294-1299 ई.): अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण

13वीं सदी के अंत में दिल्ली का सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी अपनी विजय यात्रा पर निकला था। उसकी नजर जैसलमेर की समृद्धि पर पड़ी। कहते हैं कि भाटी राजपूतों ने खिलजी के खजाने को ले जा रही एक टुकड़ी पर हमला कर दिया था – यह राजपूतों का पारंपरिक अधिकार था। लेकिन खिलजी को यह अपमान लगा।

1299 में खिलजी की विशाल सेना ने जैसलमेर को घेर लिया। उस समय यहां के शासक थे रावल जैत सिंह प्रथम और उनके कुंवर रतन सिंह

घेराबंदी महीनों तक चली। किले के भीतर खाने-पीने का सामान खत्म होने लगा। लेकिन राजपूतों ने हार नहीं मानी। दिलचस्प बात यह है कि इतिहासकारों के अनुसार घेराबंदी आठ से नौ साल तक चली! क्या आप सोच सकते हैं – नौ साल तक एक किले में बंद रहकर दुश्मन का सामना करना?

अंत में जब हार निश्चित लगी, तो रानियों और महिलाओं ने जौहर किया। हजारों महिलाएं और बच्चे आग में कूद गए। और फिर रावल जैत सिंह, रतन सिंह और हजारों राजपूत योद्धा केसरिया बाना पहनकर किले के द्वार खोलकर बाहर निकले। यह साका था। अंतिम युद्ध। जिसमें वापस लौटने का सवाल ही नहीं था।

उस दिन जैसलमेर की धरती वीरों के रक्त से लाल हो गई थी। लेकिन एक भी राजपूत ने अपनी तलवार नीचे नहीं की। एक भी योद्धा ने पीठ नहीं दिखाई। यही था क्षत्रिय धर्म। यही थी राजपूत परंपरा।

द्वितीय साका (1326 ई.): फिरोज शाह तुगलक का हमला

खिलजी के बाद दिल्ली की गद्दी पर तुगलक वंश आया। 1326 में फिरोज शाह तुगलक ने भी जैसलमेर पर हमला किया। उस समय यहां रावल दूदा का शासन था।

इतिहास फिर से दोहराया गया। फिर से घेराबंदी, फिर से लंबा संघर्ष, और फिर से वही अंत – जौहर और साका।

राजपूत इतिहास में यह दूसरा बड़ा साका माना जाता है। इस बार भी हजारों राजपूतों ने अपनी जान दे दी, लेकिन अपनी अस्मिता नहीं झुकाई।

अर्ध साका (1550 ई.): कंधार के अमीर अली का आक्रमण

तीसरी बार 1550 में कंधार (अफगानिस्तान) के शासक अमीर अली ने जैसलमेर पर हमला किया। उस समय रावल लूणकरण यहां के शासक थे।

इस बार युद्ध की स्थिति कुछ अलग थी। कहते हैं कि राजपूत योद्धा तो केसरिया पहनकर निकल गए, लेकिन महिलाओं ने पूरी तरह से जौहर नहीं किया – इसलिए इसे अर्ध साका (आधा साका) कहा जाता है।

साकों की विरासत

आज जब आप जैसलमेर किले में घूमते हैं, तो हर कोने में उन वीरों की छाया महसूस होती है। मानो पत्थर भी उन वीर आत्माओं की गाथा गा रहे हों। मारवाड़ में एक कहावत है:

“साका होय तो ऐसो होय, जैसो जैसलमेर होय।”

यानी अगर बलिदान देना है, तो जैसलमेर जैसा देना चाहिए।

जीवंत किला: दुनिया का अनोखा आवासीय दुर्ग

दोस्तों, अब आते हैं जैसलमेर किले की सबसे खास बात पर। यह दुनिया के उन चुनिंदा किलों में से एक है जिसे “Living Fort” या जीवंत किला कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि आज भी इस किले के अंदर करीब 3000 से 4000 लोग रहते हैं!

हां, आपने सही पढ़ा। 850 साल पुराने इस किले में आज भी घर हैं, दुकानें हैं, मंदिर हैं, होटल हैं, रेस्टोरेंट हैं। यहां के लोग अपना पूरा जीवन इन प्राचीन दीवारों के बीच ही गुजारते हैं। सुबह उठना, बच्चों को स्कूल भेजना, दुकान खोलना, शाम को मंदिर जाना – सब कुछ किले के भीतर ही होता है।

क्या कभी आपने सोचा है कि किसी ऐतिहासिक इमारत में रहना कैसा होता होगा? जहां हर पत्थर में इतिहास छुपा हो, जहां आपके पूर्वज सैकड़ों साल से रह रहे हों?

हवेलियां: पत्थर पर की गई कविता

किले के अंदर कई प्राचीन हवेलियां हैं जो राजस्थानी वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने हैं:

  1. पटवों की हवेली: यह पांच हवेलियों का समूह है, जिसे जैन व्यापारी गुमान चंद पटवा और उनके पांच बेटों ने बनवाया था। इसकी बालकनी और खिड़कियों पर की गई नक्काशी देखकर आप दंग रह जाएंगे।
  2. सालिम सिंह की हवेली: यह छह मंजिला इमारत नीचे से संकरी और ऊपर से चौड़ी है – जैसे जहाज का आगे का हिस्सा। इसकी छत पर बने मोर के आकार के झरोखे बेजोड़ हैं।
  3. नथमल की हवेली: इसकी खासियत यह है कि इसे दो भाई शिल्पकारों ने अलग-अलग बनाया था, फिर भी दोनों हिस्से एकदम समान हैं!

UNESCO विश्व धरोहर: वैश्विक पहचान

2013 में यूनेस्को ने जैसलमेर किले को “राजस्थान के पहाड़ी किलों” की श्रेणी में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। इस श्रेणी में कुल छह किले शामिल हैं:

  • चित्तौड़गढ़ किला
  • कुंभलगढ़ किला
  • रणथंभौर किला
  • गागरोन किला
  • आमेर किला
  • जैसलमेर किला

यह सम्मान मिलना कोई छोटी बात नहीं है। इसका मतलब है कि दुनिया ने इस किले के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य महत्व को स्वीकार किया है।

पर्यटन जानकारी: आपकी यात्रा के लिए जरूरी बातें

कैसे पहुंचें?

हवाई मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा जोधपुर (लगभग 285 किमी) है। वहां से टैक्सी या बस से जैसलमेर पहुंचा जा सकता है।

रेल मार्ग: जैसलमेर का अपना रेलवे स्टेशन है जो देश के प्रमुख शहरों से जुड़ा है। दिल्ली, जयपुर, जोधपुर से सीधी ट्रेनें उपलब्ध हैं।

सड़क मार्ग: जयपुर से 558 किमी, जोधपुर से 285 किमी। राजस्थान रोडवेज की नियमित बसें चलती हैं।

घूमने का सबसे अच्छा समय

अक्टूबर से मार्च का समय सबसे बढ़िया है। इस दौरान मौसम सुहावना रहता है। गर्मियों में तापमान 45-50 डिग्री तक पहुंच जाता है, जो बहुत कठिन हो सकता है।

फरवरी में डेजर्ट फेस्टिवल होता है जो बेहद खास है। अगर आप राजस्थानी संस्कृति को करीब से देखना चाहते हैं, तो यह सबसे अच्छा समय है।

प्रवेश शुल्क और समय

  • भारतीयों के लिए: ₹50 प्रति व्यक्ति
  • विदेशी पर्यटकों के लिए: ₹250 प्रति व्यक्ति
  • कैमरा शुल्क: ₹50
  • वीडियो कैमरा: ₹100

खुलने का समय: सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक (पूरे सप्ताह)

देखने योग्य मुख्य स्थान

  1. राज महल (King’s Palace)
  2. जैन मंदिर समूह
  3. लक्ष्मीनाथ मंदिर
  4. किले की प्राचीर और बुर्ज
  5. पटवों की हवेली
  6. सालिम सिंह की हवेली
  7. नथमल की हवेली

कहां रुकें?

किले के अंदर और आसपास कई होटल और गेस्ट हाउस हैं। किले के भीतर रुकने का अनुभव अद्भुत है – जैसे आप इतिहास के पन्नों में रह रहे हों। लेकिन याद रखें, किले की संकरी गलियों में बड़े वाहन नहीं जा सकते।

यात्रा के लिए सुझाव

  • पूरे किले को घूमने के लिए 3-4 घंटे का समय रखें
  • सुबह जल्दी या शाम को जाएं – दिन में बहुत गर्मी होती है
  • आरामदायक जूते पहनें – बहुत चढ़ाई-उतराई है
  • पानी की बोतल साथ रखें
  • गाइड रखना फायदेमंद रहता है
  • Sunset के समय किले से दृश्य अविस्मरणीय है

आधुनिक प्रासंगिकता: आज के युग में क्या सीख?

दोस्तों, जब हम इस प्राचीन किले में घूमते हैं, तो एक सवाल मन में उठता है – आज के इस आधुनिक युग में, जब हम स्मार्टफोन और कंप्यूटर की दुनिया में रहते हैं, तब इन पुराने किलों और इतिहास का क्या महत्व है?

जवाब सीधा है। यह किला हमें सिखाता है:

अस्मिता और स्वाभिमान: क्षत्रियों ने अपनी अस्मिता के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। आज के युग में भी अपनी पहचान, अपनी संस्कृति को बचाए रखना जरूरी है।

संघर्ष और धैर्य: नौ साल की घेराबंदी झेलना! आज हम छोटी-छोटी परेशानियों से घबरा जाते हैं। उन वीरों का संघर्ष हमें धैर्य सिखाता है।

कला और संस्कृति का संरक्षण: इस किले में की गई नक्काशी, बनाए गए मंदिर – ये सब हमें बताते हैं कि युद्ध के बीच भी कला जीवित रहती है।

पर्यावरण के अनुकूल निर्माण: सिर्फ पत्थर और रेत के उपयोग से ऐसी इमारत बनाना जो 850 साल बाद भी खड़ी है – यह sustainable architecture का बेहतरीन उदाहरण है।

युवा पीढ़ी के लिए संदेश

आज की युवा पीढ़ी को यह किला देखने जरूर आना चाहिए। इंस्टाग्राम पर फोटो खींचने के अलावा, यहां की कहानियां सुनो। उन पत्थरों को छुओ जिन पर वीरों का खून लगा है। उन दीवारों को महसूस करो जिन्होंने सैकड़ों युद्ध देखे हैं।

यह सिर्फ एक tourist spot नहीं है। यह हमारी विरासत है। हमारा गौरव है।

संरक्षण की चुनौतियां और प्रयास

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) जैसलमेर किले के रखरखाव के लिए जिम्मेदार है। लेकिन एक जीवंत किले को संरक्षित रखना बहुत चुनौतीपूर्ण है।

मुख्य समस्याएं:

  1. पानी का रिसाव: आधुनिक पाइप लाइनों से पानी का रिसाव पत्थरों को नुकसान पहुंचा रहा है
  2. बढ़ता वजन: अंदर की इमारतें और सड़कें किले की नींव पर दबाव डाल रही हैं
  3. प्रदूषण: पर्यटन से बढ़ता कचरा
  4. जलवायु परिवर्तन: बारिश के पैटर्न में बदलाव

संरक्षण के प्रयास:

  • ASI द्वारा नियमित मरम्मत कार्य
  • यूनेस्को से मिली मान्यता के बाद international funding
  • स्थानीय लोगों को जागरूक करना
  • पानी की निकासी व्यवस्था में सुधार

हम सब की भी जिम्मेदारी है कि जब इस किले में जाएं, तो इसे साफ-सुथरा रखें। कहीं भी कचरा न फेंकें। दीवारों पर अपना नाम न लिखें।

FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1: जैसलमेर का किला किसने बनवाया और कब?

उत्तर: रावल जैसल नामक भाटी राजपूत शासक ने 1156 ईस्वी में इस किले का निर्माण कराया। यह त्रिकूट पहाड़ी पर बना है और इसका नाम भी शासक जैसल के नाम पर ही पड़ा।

प्रश्न 2: जैसलमेर किले को ‘सोनार किला’ या गोल्डन फोर्ट क्यों कहते हैं?

उत्तर: यह किला पीले बलुआ पत्थर से बना है। जब सूर्य की किरणें इस पर पड़ती हैं, तो यह सुनहरे रंग में चमकने लगता है। इसी कारण इसे ‘सोनार किला’ या ‘गोल्डन फोर्ट’ कहा जाता है। सूर्यास्त के समय तो यह दृश्य अद्भुत हो जाता है।

प्रश्न 3: क्या जैसलमेर किला UNESCO विश्व धरोहर स्थल है?

उत्तर: हां। 2013 में यूनेस्को ने जैसलमेर किले को “राजस्थान के पहाड़ी किलों” की श्रेणी में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। इस श्रेणी में चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, रणथंभौर, गागरोन और आमेर किले भी शामिल हैं।

प्रश्न 4: जैसलमेर किले में कितने साके हुए थे?

उत्तर: जैसलमेर में ढाई साके हुए। पहला साका 1294-99 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के समय, दूसरा साका 1326 में फिरोज शाह तुगलक के आक्रमण के समय, और तीसरा अर्ध साका 1550 में कंधार के अमीर अली के आक्रमण के समय हुआ। तीसरे को ‘अर्ध साका’ इसलिए कहते हैं क्योंकि यह पूरी तरह संपन्न नहीं हुआ था।

प्रश्न 5: क्या आज भी लोग जैसलमेर किले में रहते हैं?

उत्तर: हां, यही तो इस किले की सबसे खास बात है! आज भी लगभग 3000-4000 लोग इस किले के अंदर रहते हैं। यहां घर, दुकानें, होटल, रेस्टोरेंट, मंदिर – सब कुछ है। इसे दुनिया के चुनिंदा ‘Living Forts’ (जीवंत किलों) में गिना जाता है।

प्रश्न 6: जैसलमेर किला देखने के लिए कितना समय चाहिए?

उत्तर: पूरे किले को अच्छे से देखने के लिए कम से कम 3-4 घंटे का समय रखें। अगर आप हवेलियां, म्यूजियम और जैन मंदिर भी देखना चाहते हैं, तो पूरा दिन लग सकता है। सुबह जल्दी या शाम को जाना बेहतर है क्योंकि दिन में बहुत गर्मी होती है।

प्रश्न 7: जैसलमेर जाने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?

उत्तर: अक्टूबर से मार्च का समय सबसे उत्तम है। इस दौरान मौसम सुहावना रहता है (15-30 डिग्री)। फरवरी में डेजर्ट फेस्टिवल होता है जो देखने लायक है। गर्मियों (अप्रैल-जून) में तापमान 45-50 डिग्री तक पहुंच जाता है, इसलिए उस समय जाने से बचें।

प्रश्न 8: जैसलमेर किले की Entry Fee क्या है?

उत्तर: भारतीयों के लिए ₹50 प्रति व्यक्ति, विदेशी पर्यटकों के लिए ₹250 प्रति व्यक्ति। कैमरा के लिए ₹50 और वीडियो कैमरा के लिए ₹100 अतिरिक्त शुल्क है। किला सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है।

समापन: एक आह्वान

जैसलमेर का गोल्डन फोर्ट सिर्फ पत्थरों और मिट्टी का ढांचा नहीं है। यह हमारी अस्मिता का प्रतीक है। हमारे पूर्वजों के शौर्य, त्याग और बलिदान का जीवंत साक्ष्य है।

जब आप इस किले की विशाल दीवारों के सामने खड़े होते हैं, तो एक अजीब सी अनुभूति होती है। मन में एक गर्व उठता है – कि हम उस संस्कृति के वारिस हैं जिसने कभी अपना सिर नहीं झुकाया। जिसने मौत को गले लगाया, लेकिन अपनी अस्मिता नहीं गंवाई।

हर भारतीय को, खासकर हर क्षत्रिय को, इस किले को एक बार जरूर देखना चाहिए। अपने बच्चों को यहां लाइए। उन्हें इतिहास की ये कहानियां सुनाइए। बताइए कि उनके पूर्वज कैसे थे। कितने वीर थे। कितने स्वाभिमानी थे।

थार के विशाल मरुस्थल में खड़ा यह सुनहरा किला आज भी चुनौती देता है हर उस व्यक्ति को जो सोचता है कि इतिहास बीत गया। नहीं, इतिहास कभी नहीं बीतता। वह हमारी रगों में बहता है। हमारी आत्मा में रचा-बसा है।

तो आइए, इस विरासत को सहेजें। इसे संजोएं। और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं।

लेखक के बारे में: यह लेख व्यापक शोध, ऐतिहासिक दस्तावेजों और जैसलमेर की व्यक्तिगत यात्रा के अनुभवों के आधार पर लिखा गया है। सभी ऐतिहासिक तथ्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), यूनेस्को की रिपोर्ट्स और प्रमाणिक इतिहास पुस्तकों से लिए गए हैं।

संदर्भ स्रोत:

खास आपके लिए –

Bhanwar Singh Thadahttp://kshatriyasanskriti.com
Guardian of Kshatriya heritage and warrior traditions. Promoting Rajput history, dharmic values, and the timeless principles of courage, honor, and duty. Dedicated to cultural preservation and inspiring pride in our glorious past.
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