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शनिवार, जनवरी 24, 2026

राव जयमल मेड़तिया – एक अद्वितीय योद्धा

राव जयमल मेड़तिया – एक अद्वितीय योद्धा थे। राव जयमल मेड़तिया का जन्म आश्विन शुक्ल एकादशी विक्रम संवत् १५६४ तदानुसार 17 सितम्बर 1507 को हुआ। मारवाड़ के शासक जोधा के चौथे पुत्र दुदा से राठौड़ वंश की सुप्रतिष्ठित मेड़तिया शाखा का प्रादुर्भाव हुआ। राव दूदा मेड़तिया राठोड़ों के मूल पुरूष थे लेकिन उनके पुत्र कुंवर विरमदेव उनसे कहीं अधिक वीर और पराक्रमी थे। विरमदेव के युवराज जयमल तो अपने अद्वितीय पराक्रम से पिता और पितामह के पराक्रम से आगे निकल गए।

इनके वंशज मूल पुरूष दूदा की संतति नहीं बतलाकर अथवा दुदावत न कहलाकर विरमदेव, जयमलोत कहलाते है। ये मेड़ता के अधिपति की संताने होने के कारण और इनकी मातृभूमि मेड़ता होने से मेड़तिया राठौड़ कहलाए।

अपने पिता राव विरमदेव की मृत्यु के पश्चात 36 वर्ष की आयु में मेड़ता की गद्दी पर आसीन हुए। अपने पिता के साथ अनेक युद्धों में बड़ी से बड़ी सेना के सामने अपना रणकोशल दिखाया।

राव जयमल मेड़तिया ने चित्तौड़गढ़ के रक्षार्थ अपने प्राणों का बलिदान करके न केवल राजस्थान अपितु भारत के इतिहास में मेड़तिया राठोडो का नाम अजर अमर बना दिया।

मेड़तिया राठौड़ –

मेड़तिया राठोड़ो के बारे में कहा गया है कि – ” मरण ने मेड़तिया अर राज करण ने जोधा ”

उक्त कहावत में मेड़तिया राठोड़ो को आत्मोत्सर्ग में अग्र तथा युद्ध कौशल में परांगत मानते हुए मृत्यु को वरण करने के लिए आतुर कहा गया है। मेड़तिया राठोड़ो ने शौर्य और बलिदान के एक से एक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। और इनमें राव जयमल मेड़तिया का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है।

मेड़तिया राठौड़ प्रारम्भ में एक स्वतंत्र शासक रहें और जोधपुर राजाओं की तरह ही इनका राव की पदवी थी। राठोड़ो की इस मेड़तिया शाखा का सबसे अधिक विस्तार हुआ, जिनका न केवल मेड़ता पर अधिकार था अपितु परबतसर , नावा मारोठ , जैतारण , कोलिया , दौलतपुरा तथा नागौर परगने की करीब 600 छोटी मोटी जागीर प्राप्त थी।

इस प्रकार मारवाड़ के एक बड़े भू भाग पर मेड़तिया राठौड़ देदीप्यमान थे। मेड़तिया राठोड़ो की गणना उच्च राठौड़ कुल होने के फलस्वरूप मेवाड़ के सुप्रसिद्ध सिसोदिया राजघराने में उनके वैवाहिक सम्बंध हुए थे। जिससे प्रेरित होकर मेड़तिया वीरों ने मेवाड़ महाराणाओ के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए ।

जिसके परिणाम स्वरूप मेवाड़ के महाराणाओं ने इनकी सेवाओं से प्रसन्न होकर बदनौर , चाणोद एवम् घाणेराव की महत्त्वपूर्ण जागीरे प्रदान की । इस प्रकार धर्म और स्वतन्त्रता के लिए प्राण उत्सर्ग करने वाले इस सुविख्यात राठौडो का मेंवाड़ और मारवाड़ में एक विशिष्ट स्थान रहा है।

राव मालदेव और राव जयमल मेड़तिया –

मेड़ता की स्वतंत्र राज्य के रुप में पहचान बनाए रखने के लिए राव जयमल ने मारवाड़ के शासक राव मालदेव से 22 महत्वपूर्ण युद्धों में अपने पराक्रम से कई बार विजय हासिल की । राव मालदेव को न राव जयमल से हार खानी पड़ी , बल्कि राव जयमल की असाधारण वीरता से इतने भयभीत हुए कि अपने प्राणों की रक्षा हेतु उन्हें चांदा मेड़तिया से सहयोग लेना पड़ा ।

राव जयमल मेड़तिया को अपनी मातृभूमि से अनन्य लगाव था लेकिन जयमल मेड़ता छोड़ कर मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह के पास आ गए। मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह ने राव जयमल मेड़तिया को उचित सम्मान के साथ जागीर एवम् चित्तौड़गढ़ के दुर्गाध्यक्ष के रुप में महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी।

राव जयमल और चित्तौड़गढ़ –

अकबर की चित्तौड़ पर चढ़ाई के समय जयमल ने अपने स्वामी महाराणा उदय सिंह को विकट पहाड़ों में सुरक्षित भेज दिया और चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा का सम्पूर्ण भार अपने हाथों में ले लिया। चित्तौड़गढ़ के अतुलनीय जौहर और शाके के अनुसार लम्बे समय तक अकबर का चित्तौड़गढ़ दुर्ग का घेराव रहने पर भी राजपूतों ने धैर्य और साहस नहीं खोया।

विकट युद्धों के अनुभवी जयमल ने खाद्य पदार्थों व शस्त्रों का संग्रह कर युद्ध की तैयारी प्रारम्भ कर दी। शत्रु आक्रांता अकबर ने भी चितौड़ की सामरिक महत्व की जानकारियां एकत्रित कर अपनी रणनीति तैयार कर चित्तौड़ दुर्ग को विशाल सेना के साथ घेरा दिया। ओर दुर्ग के नीचे सुरंग खोदी जाने लगी ताकि उनमें बारूद भरकर विस्फोट कर दुर्ग के परकोटे उड़ाए जा सके। तोप दागने एवम् सुरंग फटने से दुर्ग में पड़ती दरारों को राव जयमल मेड़तिया रात्रि के समय फिर मरम्मत करा ठीक करा देते। कई महीनों के भयंकर युद्ध के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकला। चित्तौड़ के वीरो ने मुगल सेना के इतने तुर्कों को मारा कि लाशों के ढेर लग गए।

अकबर ने किले के नीचे सुरंग खोद कर मिट्टी निकालने वाले मजदूरों को एक एक मिट्टी की टोकरी के बदलें एक एक सोने की मोहरे दी। अबुल फजल ने लिखा कि इस युद्ध में मिट्टी की कीमत भी स्वर्ण के समान हो गई।

अकबर राव जयमल के पराक्रम से भयभीत व आशंकित भी थे। उसने राजा टोडरमल के द्वारा जयमल को संदेश भेजा कि आप राणा और चित्तौड़ के लिए क्यों अपने प्राण व्यर्थ गवां रहे हो। , चित्तौड़ दुर्ग पर मेरा कब्जा करा दो। मैं तुम्हें तुम्हारा राज्य मेड़ता और अन्य जागीर दूंगा।

जयमल ने अकबर का प्रस्ताव ठुकरा दिया कि मैं राणा और चित्तौड़ के साथ विश्वासघात नहीं कर सकता और मेरे जीवित रहते तुम किले में प्रवेश नहीं कर सकते। जयमल ने टोडरमल के साथ जो संदेश भेजा जो इस प्रकार है – l

राव जयमल मेड़तिया एक दिन रात्रि में दुर्ग की मरम्मत करवा रहें थे उसी समय अकबर ने संग्राम नामक बंदूक से गोली दाग दी ओर से गोली मारने से वह घायल हो गए। चित्तौड़गढ़ के अतुलनीय जौहर और शाके , चित्तौड़गढ़ दूसरा जौहर और शाका हुआ। क्षत्राणियो ने जौहर किया और राजपूतों ने शाका। दुर्ग के द्वार खोल दिए गए और जयमल के नेतृत्व में राजपूत अकबर की सेना पर टूट पड़े।

राव जयमल मेड़तिया भैरव पोल के निकट युद्ध करते हुए काम आएं। अकबर स्वयं ने जयमल की वीरता से प्रभावित होकर उनकी हाथी पर सवार मूर्ति को अपने दुर्ग के सामने बनवाई। वीरवर जयमल ने अकबर की कूटनीतिक चालों को विफल करते हुए अपने पूर्वजों के निर्मल यश को सुरक्षित रखा और प्राणोत्सर्ग कर स्वामीभक्त का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।

Bhanwar Singh Thada
Bhanwar Singh Thadahttp://kshatriyasanskriti.com
Guardian of Kshatriya heritage and warrior traditions. Promoting Rajput history, dharmic values, and the timeless principles of courage, honor, and duty. Dedicated to cultural preservation and inspiring pride in our glorious past.
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