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बुधवार, जनवरी 7, 2026

राजतिलक: राजाओं का राज्याभिषेक

क्या आपने कभी सोचा है कि जब कोई क्षत्रिय राजा सिंहासन पर बैठते थे, तो उस पल का माहौल कैसा होता होगा? कल्पना कीजिए-रायगढ़ के किले में वैदिक मंत्रों की गूंज, 108 पवित्र तीर्थों से लाए गए जल की पावनता, सोने के पात्रों में रखे पंचगव्य की सुगंध, और हजारों नागरिकों की आंखों में अपने राजा के प्रति श्रद्धा का समंदर। यह कोई साधारण समारोह नहीं था- यह था राजतिलक, वह पवित्र संस्कार जो एक योद्धा को धर्मरक्षक राजा में परिवर्तित कर देता था।

Table of Contents

जब सिंहासन पर विराजते थे धर्म के रक्षक

आज के युग में जब हम ‘कोरोनेशन’ या ‘इनॉगरेशन’ शब्दों से परिचित हैं, तब भी भारतीय राजपूत परंपरा का राज्याभिषेक अपनी विशिष्टता में अद्वितीय था। यह केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं था – यह था धर्म, न्याय और प्रजापालन की प्रतिज्ञा का क्षण। मेवाड़ के महाराणाओं से लेकर मारवाड़ के राठौड़ों तक, बीकानेर के राठौड़ों से लेकर आमेर के कछवाहों तक-प्रत्येक राजवंश ने इस पवित्र परंपरा को अपने-अपने ढंग से संजोया और निभाया।

इस लेख में हम उस गौरवशाली परंपरा की गहराइयों में उतरेंगे जो हमारे पूर्वजों ने स्थापित की थी। हम जानेंगे कि कैसे वैदिक ऋचाओं से लेकर राजनीतिक कूटनीति तक, धार्मिक संस्कारों से लेकर योद्धा परंपराओं तक-सब कुछ इस एक महान संस्कार में समाहित था।

आइए, इस यात्रा में हमारे साथ चलें और अपनी विरासत के उस स्वर्णिम अध्याय को पुनः जीवित करें जो आज भी हमें राजधर्म, क्षत्रिय मूल्यों और भारतीय संस्कृति की महानता का पाठ पढ़ाता है।

राजतिलक का ऐतिहासिक सत्य: वैदिक काल से मध्यकाल तक की अटूट परंपरा

प्राचीन ग्रंथों में राज्याभिषेक का उल्लेख

क्षत्रिय राजाओं का राज्याभिषेक केवल एक मध्यकालीन प्रथा नहीं थी-इसकी जड़ें वैदिक युग में गहराई से समाई हुई हैं। ऋग्वेद में ‘राजसूय यज्ञ’ और ‘अश्वमेध यज्ञ’ का उल्लेख मिलता है, जो राजा के अभिषेक और उसकी सार्वभौमिकता की घोषणा के महान संस्कार थे। अथर्ववेद में राजाभिषेक के मंत्र विस्तार से दिए गए हैं:

“इन्द्रो राजा वरुणो राजा सोमो राजा पृथिवीपते राजा।”
(अर्थ: इंद्र राजा हैं, वरुण राजा हैं, सोम राजा हैं -और पृथ्वी का पालक भी राजा है।)

यह श्लोक स्पष्ट करता है कि राजा को देवताओं के समकक्ष माना जाता था, परंतु यह समकक्षता उसकी जिम्मेदारी और कर्तव्य के कारण थी, अहंकार के कारण नहीं।

महाभारत के शांति पर्व में भीष्म पितामह युधिष्ठिर को राजधर्म समझाते हुए कहते हैं:

“सर्वेषां धर्माणां राजधर्मः परं मतम्।
राजधर्मेण धर्मं हि सर्वं संपरिवर्तते॥”

(अर्थ: सभी धर्मों में राजधर्म सर्वश्रेष्ठ है। राजधर्म के पालन से ही सभी धर्मों की रक्षा होती है।)

मध्यकालीन राजस्थान में राज्याभिषेक की प्रमाणिकता

7वीं शताब्दी से 17वीं शताब्दी तक राजस्थान के क्षत्रिय राजवंशों ने इस परंपरा को अत्यंत गरिमा के साथ निभाया। सरस्वती भंडार पुस्तकालय, उदयपुर में संरक्षित प्राचीन हस्तलिखित ग्रंथों से हमें महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है:

  1. “राजपत्ताभिषेक पद्धति” (विक्रम संवत 1709) – महाराणा राजसिंह प्रथम के राज्याभिषेक का विस्तृत विवरण
  2. “राज्याभिषेक पद्धति” – चक्रपाणि मिश्र द्वारा रचित
  3. “राजधर्म कौस्तुभ” – अनंतदेव द्वारा रचित (राजा बाज बहादुर, अल्मोड़ा के दरबार में)

ये ग्रंथ ब्रह्म पुराण और अग्नि पुराण में वर्णित विधियों का अनुसरण करते हैं, जो यह सिद्ध करता है कि राजपूत राजा वैदिक परंपराओं के कट्टर अनुयायी थे।

एकलिंगजी परंपरा: मेवाड़ की अनूठी विशिष्टता

मेवाड़ की राजपरंपरा में एक अद्वितीय विशेषता थी-भगवान एकलिंगनाथ (शिव) को मेवाड़ का असली राजा माना जाना। 734 ईस्वी में बप्पा रावल ने एकलिंगजी मंदिर की स्थापना की और यह प्रतिज्ञा ली कि मेवाड़ के सभी शासक स्वयं को केवल ‘एकलिंगजी के दीवान’ (प्रतिनिधि) मानेंगे।

यही कारण था कि मेवाड़ के प्रत्येक महाराणा का राज्याभिषेक होने से पहले वे एकलिंगजी मंदिर में दर्शन करते थे और वहां से आशीर्वाद लेकर ही सिंहासनारूढ़ होते थे। यह परंपरा विनम्रता और धर्मनिष्ठा का सर्वोत्तम उदाहरण है।

राज्याभिषेक की विस्तृत विधि: 7 महत्वपूर्ण चरण जो बनाते थे राजा को धर्मरक्षक

राजपूत राजाओं का राज्याभिषेक केवल एक दिन का आयोजन नहीं होता था-यह एक संपूर्ण धार्मिक और राजनीतिक प्रक्रिया थी जो कई दिनों तक चलती थी। आइए समझें इसके प्रमुख चरण:

1. योग्यात्रा संस्कार: शरीर और मन की शुद्धि

राज्याभिषेक के पहले दिन योग्यात्रा संस्कार होता था। इसमें राजकुमार के शरीर को विभिन्न पवित्र स्थानों की मिट्टी से शुद्ध किया जाता था:

  • माथे पर: विष्णु मंदिर की धूल
  • कमर पर: वेश्या के द्वार की धूल (यह प्रतीक था कि राजा को समाज के हर वर्ग का ज्ञान होना चाहिए)
  • छाती पर: यज्ञशाला की भस्म
  • हाथों पर: युद्धभूमि की मिट्टी

यह विधि अत्यंत प्रतीकात्मक थी-राजा को समाज के हर पहलू का अनुभव होना चाहिए, चाहे वह धर्म हो, युद्ध हो या सामाजिक यथार्थ।

2. पंचगव्य स्नान: पवित्रता का संस्कार

योग्यात्रा के बाद राजकुमार को पंचगव्य (गाय का दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर का मिश्रण) से स्नान कराया जाता था। यह स्नान शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों रूप से शुद्धिकरण का प्रतीक था। पंचगव्य को आयुर्वेद में औषधीय गुणों वाला माना जाता है और इसका उपयोग सदियों से भारतीय संस्कृति में पवित्रता के लिए होता आया है।

3. भद्रासन पर आसीन होना: राजसिंहासन पर विराजना

शुद्धिकरण के बाद राजकुमार को भद्रासन (राजसिंहासन) पर बैठाया जाता था। यह सिंहासन विशेष रूप से निर्मित होता था और इसे रेशम के वस्त्रों, सोने और रत्नों से सजाया जाता था। सिंहासन के चारों ओर मंत्री, सेनापति, प्रमुख सामंत और राज्य के गणमान्य नागरिक उपस्थित होते थे।

मारवाड़ (जोधपुर) में महाराजा तख्तसिंह जी ने श्रीनगर चौकी नामक संगमरमर का विशेष मंच बनवाया था जहां सभी राठौड़ शासकों का राज्याभिषेक होता था।

4. चार वर्णों द्वारा अभिषेक: समाज का आशीर्वाद

यह राज्याभिषेक की सबसे महत्वपूर्ण और लोकतांत्रिक विधि थी। चारों वर्णों के प्रतिनिधि राजा पर जल छिड़कते थे:

वर्णपात्रजल का प्रकारदिशाप्रतीकात्मकता
ब्राह्मणसोने का पात्रघी (100 छिद्रों से टपकता हुआ)पूर्वज्ञान और धर्म का आशीर्वाद
क्षत्रियचांदी का पात्रदूधदक्षिणशौर्य और रक्षा का संकल्प
वैश्यतांबे का पात्रदहीपश्चिमसमृद्धि और व्यापार का समर्थन
शूद्रमिट्टी का पात्रगंगाजलउत्तरसेवा और श्रम का सम्मान

यह विधि दर्शाती थी कि राजा केवल क्षत्रियों का नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज का प्रतिनिधि है। चारों वर्ण उसे अपना आशीर्वाद देते हैं और बदले में राजा उन सभी की रक्षा का वचन लेता है।

5. 108 तीर्थों का पवित्र जल: देवताओं का आशीर्वाद

चार वर्णों के अभिषेक के बाद सबसे पवित्र और भव्य विधि होती थी-108 तीर्थों से लाए गए जल से अभिषेक। सोने के कलशों में निम्नलिखित स्थानों से जल एकत्रित किया जाता था:

सप्त नदियां: गंगा, यमुना, सरस्वती, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी
चार धाम: बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम, जगन्नाथ पुरी
चार समुद्र: पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण
पवित्र तीर्थ: काशी, प्रयाग, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, उज्जैन, पुष्कर

प्रमुख दरबारी और सामंत इन सभी 108 सुनहरे कलशों से राजा पर जल छिड़कते थे। जयघोष और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच यह दृश्य अत्यंत भव्य और दिव्य होता था।

6. राज चिन्हों का समर्पण: सत्ता के प्रतीक

जल से अभिषेक के बाद राजा को राज चिन्ह समर्पित किए जाते थे:

छत्र (राजछत्र): सत्ता और संरक्षण का प्रतीक
तलवार (खड्ग): न्याय और शौर्य का प्रतीक
धनुष-बाण: युद्धकला और सुरक्षा का प्रतीक
राजमुकुट: राजसत्ता का सर्वोच्च चिन्ह
चंवर: गरिमा और मर्यादा का प्रतीक
सिंहासन: शासन का अधिकार

पुरोहित राजा के सिर पर राजमुकुट रखते हुए कहते थे:

“त्वं धर्मस्य रक्षिता, त्वं प्रजायाः पालकः।”
(अर्थ: तुम धर्म के रक्षक हो, तुम प्रजा के पालक हो।)

7. राजतिलक और नामकरण: राजा की उपाधि

अंत में मुख्य पुरोहित (राजगुरु) राजा के माथे पर केसर, चंदन और कुमकुम से तिलक लगाते थे और उन्हें नए नाम या उपाधि से संबोधित करते थे:

  • महाराणा (मेवाड़)
  • महाराजा (मारवाड़, बीकानेर)
  • राजा (छोटी रियासतें)
  • छत्रपति (छत्रपति शिवाजी महाराज)

इसके बाद राजा यज्ञ की परिक्रमा करते थे, अपने गुरुजनों को प्रणाम करते थे और फिर खुली सभा में सिंहासन पर विराजमान होते थे।

राजपूत रियासतों की विशिष्ट परंपराएं: हर राजवंश की अपनी पहचान

भारत के विभिन्न राजपूत राजवंशों ने राज्याभिषेक की मूल वैदिक परंपरा को बनाए रखते हुए अपनी-अपनी विशिष्ट प्रथाएं विकसित कीं। ये परंपराएं ऐतिहासिक घटनाओं, राजनीतिक गठबंधनों और सामाजिक सम्बन्धों का प्रतीक थीं।

मेवाड़: सलूंबर रावत के रक्त से राज्याभिषेक

सलूंबर के रावत श्री देवव्रत सिंह जी राजतिलक करते हुए

मेवाड़ का राजतिलक केवल सत्ता-हस्तांतरण नहीं, बल्कि रक्त, धर्म और मर्यादा से जुड़ा वह जीवित संस्कार है, मेवाड़ के महाराणा का राज्याभिषेक किसी राजसभा की औपचारिक घोषणा में नहीं होता। यह क्षण महाराणा लाखा के ज्येष्ठ कुँवर चुण्ड़ाजी के वंशज सलूंबर के रावत चुंडावत के हाथों सम्पन्न होता है, जब वे नए महाराणा को अपने अंगूठे के रक्त से तिलक करते हैं। यह रक्ततिलक केवल चंदन और केसर का लेप नहीं, बल्कि महाराणा प्रताप की वीर चेतना का पुनर्जागरण है।

उसी परंपरा का पुनः साक्षात्कार 25 नवंबर 2024 को चित्तौड़ दुर्ग की पावन भूमि पर हुआ, जब महाराणा प्रताप के वंशज महाराणा श्री विश्वराज सिंह जी मेवाड़ का राजतिलक सलूंबर के रावत श्री देवव्रत सिंह जी के हाथों 493 वर्षों बाद उसी विधि से सम्पन्न हुआ।

इस अनुष्ठान में सलूंबर के रावत की भूमिका सर्वोपरि है। उन्हें यह अधिकार महाराणा प्रताप के काल से प्राप्त है और वे इसे किसी पद की तरह नहीं, बल्कि धर्म की तरह निभाते हैं। उनका हाथ तिलक करता है, पर उसका भार पूरे मेवाड़ की मर्यादा उठाती है।

राजतिलक की साक्षी केवल राजपुरुष नहीं होते। मेवाड़ के प्रमुख ठिकानेदार, सामंत और जनता की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है, क्योंकि महाराणा स्वयं को शासक नहीं, बल्कि एकलिंगजी का दीवान मानते हैं। सत्ता देवता की है, महाराणा केवल सेवक हैं। यही भाव मेवाड़ को अन्य राजपरंपराओं से अलग करता है।

मारवाड़: बगड़ी ठाकुर का अधिकार

जोधपुर (मारवाड़) के राठौड़ शासकों का राजतिलक बगड़ी ठाकुर को करने का वंशानुगत अधिकार था। यह सम्मान बागड़ी घराने को मारवाड़ की स्थापना में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए दिया गया था।

बागड़ी ठाकुर रोली से तिलक लगाने के बाद महाराजा की कमर से अपनी तलवार खोलकर महाराजा की कमर में बांधते थे। इस सेवा के बदले में उन्हें बगड़ी ठिकाने की जागीर प्रदान की जाती थी।

महाराजा तख्त सिंह जी (1751-1752 ई.) के समय से श्रीनगर चौकी नामक संगमरमर का मंच सभी राज्याभिषेक समारोहों का केंद्र बना।

छत्रपति शिवाजी का राज्याभिषेक: राजपूत परंपरा का मराठा रूपांतरण

भारतीय इतिहास में एक और राज्याभिषेक का उल्लेख अवश्य करना चाहिए जो राजपूत परंपराओं से प्रेरित था-छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक (6 जून 1674, रायगढ़)

शिवाजी महाराज मराठा योद्धा थे, परंतु वे क्षत्रिय धर्म और राजपूत मूल्यों के प्रबल समर्थक थे। जब उन्होंने स्वतंत्र मराठा साम्राज्य की स्थापना की, तो उन्हें एक वैध और धर्मसम्मत राज्याभिषेक की आवश्यकता थी।

गंगाभट्ट का आगमन

शिवाजी ने काशी के प्रसिद्ध विद्वान पंडित गागाभट्ट (गंगाभट्ट) को आमंत्रित किया। गागाभट्ट ने वैदिक और पौराणिक विधियों के अनुसार शिवाजी का राज्याभिषेक संपन्न कराया:

  • व्रतबंध संस्कार: शिवाजी को पुनः क्षत्रिय धर्म में दीक्षित किया गया
  • सप्त नदियों का जल: सात पवित्र नदियों से लाए गए जल से अभिषेक
  • वैदिक मंत्रोच्चार: संस्कृत श्लोकों के साथ राजतिलक
  • छत्रपति उपाधि: “राजा” की जगह “छत्रपति” (छत्र धारण करने वाला) उपाधि

मुगल काल और ब्रिटिश काल में राज्याभिषेक

मुगल बादशाहों की स्वीकृति

मुगल काल में जो राजा मुगलों की अधीनता स्वीकार कर चुके थे, उन्हें दोहरा राज्याभिषेक करना पड़ता था:

  1. प्रथम अभिषेक: अपनी रियासत में वैदिक विधि से
  2. द्वितीय स्वीकृति: मुगल दरबार में बादशाह द्वारा तिलक और खिलअत (सम्मानित वस्त्र)

अकबर के शासनकाल में यह प्रथा अपने चरम पर थी। परंतु औरंगजेब (1679 ई.) ने हिंदू परंपराओं को हतोत्साहित करते हुए तिलक विधि को बंद कर दिया और उसके स्थान पर केवल ‘तसलीम’ (सलाम) की प्रथा चलाई।

ब्रिटिश काल में खरीता प्रथा

1818 में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ संधियों के बाद राजपूत रियासतों को ब्रिटिश सर्वोच्चता स्वीकार करनी पड़ी। अब नए राजा को ब्रिटिश गवर्नर जनरल (बाद में वायसराय) से खरीता (स्वीकृति पत्र) और रॉब (वस्त्र) प्राप्त करना अनिवार्य था।

परंतु राजपूत राजाओं ने अपनी मूल वैदिक परंपरा को कभी नहीं छोड़ा। ब्रिटिश स्वीकृति केवल औपचारिकता थी-असली राज्याभिषेक तो उनकी अपनी रियासत में पुरोहितों और जनता के बीच ही होता था।

सांस्कृतिक प्रासंगिकता

आज राजतिलक समारोह सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम के रूप में मनाए जाते हैं। ये हमें याद दिलाते हैं:

  • धर्म और कर्तव्य का महत्व
  • वैदिक परंपराओं की समृद्धि
  • सामाजिक समरसता और सम्मान
  • नेतृत्व की जिम्मेदारी

आज के युग में जब नेतृत्व का अर्थ केवल सत्ता प्राप्त करना रह गया है, तब राजतिलक की परंपरा यह सिखाती है कि नेतृत्व एक पवित्र जिम्मेदारी है, विशेषाधिकार नहीं

निष्कर्ष: धर्म, शौर्य और परंपरा का संगम

क्षत्रिय संस्कृति के ठाकुर भंवर सिंह जी थड़ा

तो क्या राजपूत राजाओं का राजतिलक केवल एक धार्मिक अनुष्ठान था? नहीं-यह था धर्म, राजनीति, समाज और संस्कृति का अद्भुत संगम। यह था वह पवित्र क्षण जब एक योद्धा धर्मरक्षक बनता था, जब सत्ता सेवा में परिवर्तित होती थी, और जब एक व्यक्ति संपूर्ण राज्य का प्रतिनिधि बन जाता था।

108 तीर्थों के पवित्र जल से, वैदिक मंत्रों की गूंज के बीच, चार वर्णों के आशीर्वाद से, और समस्त सरदारों के साथ – साथ अपनी प्रजा के सामने सम्मान के साथ-जो राजा सिंहासन पर बैठता था, वह केवल शासक नहीं बनता था, बल्कि क्षात्र धर्म का जीवंत स्वरूप बन जाता था।

क्षत्रिय संस्कृति के ठाकुर भंवर सिंह जी थड़ा

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संदर्भ और स्रोत

  1. Coronation Ceremony of Hindu Princes, R. P. Kathuria, Proceedings of Rajasthan History Congress, 1968
  2. Vir Vinod (वीर विनोद), श्यामलदास, राजस्थानी इतिहास ग्रंथ
  3. Rajputane ka Itihasa, गौरीशंकर हीराचंद ओझा
  4. राजपत्ताभिषेक पद्धति, विक्रम संवत 1709, सरस्वती भंडार पुस्तकालय, उदयपुर
  5. Annals and Antiquities of Rajasthan, Colonel James Tod
  6. Rajasthan History
  7. भारतकोश – महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक
  8. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India)

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Bhanwar Singh Thadahttp://kshatriyasanskriti.com
Guardian of Kshatriya heritage and warrior traditions. Promoting Rajput history, dharmic values, and the timeless principles of courage, honor, and duty. Dedicated to cultural preservation and inspiring pride in our glorious past.
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