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Monday, March 30, 2026
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चित्तौड़गढ़ के अतुलनीय जौहर और शाके

शौर्य और बलिदान का प्रतीक चित्तौड़गढ़ का यह विशाल दुर्ग अपने ह्रदय में महान वीरो और क्षत्राणियो की गौरवपूर्ण गाथा को संजोए हुए हैं। यह गवाह है चित्तौडगढ़ के जौहर और शाके के लिए , जो वीरो का अपने धर्म, अपनी स्वतन्त्रता, अपनी आन – बान और शान के लिए केसरिया बाना धारण कर रणचंडी का कलेवा बन गए।

यह दुर्ग साक्षी है उन महान वीरांगनाओं के अग्नितेज का जिसने एक नहीं तीन तीन बार जौहर की ज्वाला को प्रज्वलित किया और आने वाली पीढ़ियों को शिक्षा दी कि शील और सतीत्व से बढ़कर इस पृथ्वी पर और कुछ भी नहीं है।

विश्व प्रसिद्ध गढ़ चित्तौड़गढ़ के जौहर और शाके में वीर और वीरांगनाओं के उनका गर्म लहू और उनकी गर्म राख एक चुनौती भरी आवाज आक्रांता को ललकारती थी कि हम जीते जी गुलाम नहीं होंगे। यह दुर्ग हमें याद दिलाता है प्रताप के राष्ट्र प्रेम का , सांगा के पराक्रम का , कुम्भा के शौर्य का , रानी पद्मिनी के जौहर का , गौरा – बादल के बलिदान का और क्षत्राणी पन्नाधाय का जिसने राष्ट्र के लिए अपने पुत्र का बलिदान दे दिया।

विश्व के इतिहास में इतनी अधिक विशेषताओं वाला और कोई स्थान नहीं होगा।

चित्तौड़गढ़ का पहला जौहर और शाका –

चित्तौड़ प्राचीर प्रथम बार 25 अगस्त , सन् 1303 में जौहर की ज्वाला से तपी थी। चित्तौड़पति महारावल रतनसिंह जी के समय दिल्ली का आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी ने चितौड़ पर आक्रमण कर दिया। छः महीने तक राजपूत योद्धाओं ने डटकर मुकाबला किया। लम्बे समय तक चले इस युद्ध में कई वीर योद्धा वीरगति को प्राप्त प्राप्त हुए। दुर्ग की आन्तरिक व्यवस्था गड़बड़ा गई थी। रसद सामग्री भी कम होने लगी थी। इस युद्ध में गौरा और बादल ने अदम्य साहस का परिचय दिया।

अन्त में कोई और विकल्प न देखकर राजपूत वीरों ने शाका करने का निर्णय लिया। रानी पद्मिनी के नेतृत्व में सोलह हजार क्षत्राणियो ने दुर्ग के गौमुख के उत्तर वाले मैदान में जौहर किया। यह था चितौड़ का प्रथम जौहर । जौहर के तत्पश्चात राजपूत वीरों ने केसरिया बाना धारण कर जौहर की भस्म को सिर पर लगाकर दुर्ग के द्वार खोल दिए। वीर योद्धा शेर की भांति आक्रांताओं पर टूट पड़े। किन्तु संख्या में कम होने के कारण अन्त में एक एक कर वीरगति को प्राप्त हो गए। अलाउद्दीन युद्ध तो जीत गया, किन्तु हाथ उसके कुछ नहीं लगा सिर्फ राख की की एक ढेरी के सिवाय।

(इतिहास में बाद में यह नेरेटिव भी जोड़ दिया कि रानी पद्मिनी की सुंदरता और उनका शीशे में प्रतिबिम्ब आक्रांता को दिखाया गया, लेकिन यह पूरी तरह से गलत है। जो क्षत्रिय अपने धर्म की रक्षा के लिए बलिदान देने को त्यौहार मानते हों तो ऐसा कैसे सम्भव हो सकता हैं । और न ही उस समय शीशा या दर्पण हुआ करता था । )

जौहर पर अधिक जानकारी के लिए इसे देखें – जौहर : सतीत्व रक्षार्थ सर्वस्व समर्पण

चित्तौड़गढ़ का दूसरा जौहर और शाका –

चितौड़ का दूसरा जौहर 8 मार्च सन् 1535 को हुआ। महाराणा सांगा के निधन के बाद उनके द्वितीय पुत्र रतन सिंह मेवाड़ की गद्दी पर बैठे। किन्तु उनके असामायिक निधन होने से उनका छोटा भाई विक्रमादित्य मेवाड़ के शासक बने। गुजरात का शासक बहादुरशाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण कर दिया। ऐसे विकट समय में हाड़ी रानी कर्मवती ने सभी सामंतो को पत्र लिखा कि – “यह किला तुम्हें सौपा जाता हैं इसलिए आप अपने वंश की मर्यादा का ख्याल कर जैसा उचित समझो वैसा करो। ” इस भावपूर्ण अपील का असर ऐसा हुआ कि मेवाड़ के सभी सामंत आपसी मतभेद भुलाकर प्रतापगढ़ के रावत बाघसिंह जी के नेतृत्व में बहादुर शाह के विरुद्ध रणक्षेत्र में उतर आए।

घमासान युद्ध हुआ, बहादुर शाह के पास तोपखाना था। तोपो के गोलों से किले की दिवारे टूट गई। युद्ध भूमि में कई राजपूत वीरगति को प्राप्त हुए। अन्त में राणा सांगा की राठौड़ रानी रणचण्डी वीरांगना जवाहर देवी पुरुष वेश धारण कर अपनी वीरांगनाओं की सेना के साथ दुश्मनों की सेना पर टूट पड़ी और वीरगति को प्राप्त हो गई।

वीरांगना रानी जवाहर देवी के बारे में अधिक जानकारी के लिए – रणचण्डी वीरांगना जवाहर देवी और तुर्क आक्रांता बहादुरशाह

इस प्रकार सभी मोर्चे ध्वस्त हो गए। राजमाता कर्मवती ने प्रतिकूल परिस्थितियों में जौहर करने का निर्णय किया। तेरह हजार क्षत्राणियो के साथ सार्गदेश्वर (जौहर स्थल) मन्दिर के प्रांगण में अग्नि में प्रवेश किया दुर्ग में शेष बचे वीर केसरिया बाना पहनकर दुश्मनों पर टूट पड़े। रावत बाघसिंह जी ने अप्रतिम शौर्य का प्रदर्शन करते हुए पाडन पोल के मोर्चे पर घनघोर युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुए।

जौहर पर अधिक जानकारी के लिए – जौहर : सतीत्व रक्षार्थ सर्वस्व समर्पण

चित्तौड़गढ़ का तीसरा जौहर और शाका –

चित्तौड़ का तीसरा जौहर और शाका 23 फरवरी, 1568 की रात को हुआ। मुगल आक्रमणकारी अकबर के सामने भारत के अधिकांश शासकों ने समर्पण कर दिया। ऐसे समय में केवल मेवाड़ ने ही प्रतिरोध किया। परिणामत: अकबर ने लगभग तीन लाख सैनिकों के साथ चितौड़ पर आक्रमण कर दिया।

मेवाड़ के सामंतो ने परिस्थितियों की गंभीरता को देखते हुए निर्णय किया कि महाराणा उदयसिंह राजपरिवार सहित किले से निकल जाए। ऐसी स्थिति में युवराज प्रताप चित्तौड़ में रहकर युद्ध करना चाहते थे किन्तु सेनापति राठौड़ जयमल ने प्रताप की बात स्वीकार नहीं की।

महाराणा उदयसिंह को रावत नेतसी (नेत सिंह) के साथ चित्तौड़ से बाहर भेजा गया और मेवाड़ की शक्ति को संगठित करने का भार साईदास सलूंबर, सिसोदिया पत्ता केलवा एवम् राठौड़ जयमल बदनौर पर छोड़ गए। इन राजपूत वीरों ने शक्ति को संगठित किया। दुर्ग में आठ हजार राजपूत योद्धा रह गए थे।

युद्ध शुरू हुआ, एक बार पुनः रणभेरी के स्वर गूंजने लगे और तांडव नृत्य शुरू हो गया। मेवाड़ी वीरो की बहादुरी और शौर्य के आगे मुगल सेना के छक्के छूट गए। तोपो की मार से दुर्ग की दीवार ढह गई। सैनिक दिन में तो युद्ध करते और रात में दीवार की मरम्मत करते रहते थे।

युद्ध की प्रतिकूलता को देख कर अकबर ने राठौड़ जयमल को अपनी ओर मिलाने का प्रयास किया। स्वामिभक वीरवर जयमल ने इसका जवाब इस प्रकार से दिया –

जैमल लिखें जवाब जद , सुणजे अकबर शाह । आण फिरे गढ़ उपरा , टूटा सिर पतशाह ।।

है गढ़ म्हारो हूं धणी , असुर फिरे किम आन । कूंची गढ़ चितौड़ री , दीवी मुझ दीवाण ।।

अर्थात् अकबर शाह सुनिए। अरे सिर के टुकड़े होने पर ही चित्तोडगढ़ पर तेरी दुहाई फिर सकती है । चितौड़ तो मेरा ही है , मै ही यहां का स्वामी हूं। एकलिंग जी के दिवाण महाराणा ने इस किले की कुंजी मुझे सोपी है। इसलिए मेरे जीते जी यहां मुगलों की दुहाई कैसे फिर सकती हैं।

वीर शिरोमणी जयमल के इस वीरोचित जवाब को सुनकर अकबर निश्तेज हो गया। एक रात राठौड़ जयमल दीवार की मरम्मत करवा रहें थे कि अकबर ने अपनी संग्राम बंदूक से गोली चलाई जो जयमल के पांव में लगी फिर भी वे दुर्ग की रक्षा में लगे रहे। इतने संघर्ष के उपरांत भी अन्ततः नियति को कुछ और ही मंजूर था। पराजय को समीप देखकर शुरवीरो ने जौहर और शाका का निर्णय लिया।

23 फरवरी 1568, की रात को तीन अलग – अलग स्थानों पर लगभग सात हजार क्षत्राणियो ने अपने तेज को अग्नि के तेज मे मिला दिया। जयमल की बहन तथा वीरवर पत्ता की बहन रानी फूल कुंवर ने इस जौहर की अगवानी की थी। दुसरे दिन प्रातः काल शेष बचे हुए वीर योद्धाओं ने गोमुख कुण्ड में स्नान किया। तुलसी गंगा जल पीया और जौहर की राख को माथे पर लगा कर केसरिया बाना पहनकर दुर्ग के द्वार खोल दिए।

हर हर महादेव के घोष के साथ युद्ध प्रारम्भ हो गया। शस्त्रों की झंकार से आकाश गूंज उठा। घायल जयमल को राठौड़ कल्लाजी ने यह कहकर अपने कंधे पर बिठाया कि अब चारों हाथों से तलवार चलेगी। मेवाड़ी वीरों का रौद्र रूप देखकर अकबर स्वयं भी कांप उठा। जयमल का अनूज राठौड़ इसरदास अकबर की सुरक्षा पंक्ति को भेदकर मुगल बादशाह के हाथी तक पहुंच गया। एक हाथ से हाथी का दांत पकड़ कर अकबर के होदे तक पहुंचने के लिए यह वीर उछला तभी देश के गद्दार राजा भगवानदास ने पीछे से वार कर उस वीरवर के मस्तक काट दिया। 

राजपूत वीरों ने इस कदर युद्ध किया कि अकबर की सेना को तीन बार पीछे हटना पडा। इसी कारण अकबर ने कायरता का नंगा खेल खेलते हुए तीस हजार निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया।

क्षत्रिय वीरों ने अपने धर्म, अपनी स्वतन्त्रता, अपनी आन बान और शान  के लिए केसरिया बाना धारण कर और  अपने शील और सतीत्व की रक्षा के लिए इन महान वीरांगनाओं ने जो कदम उठाया उस पर क्षत्रिय वंश को ही नहीं अपितु सम्पूर्ण हिन्दू राष्ट्र को गर्व है ।

जौहर पर अधिक जानकारी के लिए – जौहर : सतीत्व रक्षार्थ सर्वस्व समर्पण

आपके अमूल्य सुझाव, क्रिया प्रतिक्रिया स्वागतेय है। 

कुंभलगढ़ Kumbhalgarh का अभेध्य दुर्ग – जहां महाराणा प्रताप का जन्म हुआ

मेवाड़ (मेदपाट) अपने अंक में समेटे हुए है – एक गौरवशाली इतिहास, जिसका एक – एक पृष्ठ वीरता, शौर्य, त्याग, समर्पण, बलिदान और विजय की गाथा से अंकित है। जिसका एक – एक स्थान अपने मे अद्भुत स्मृतियां संजोए है। और जिसका एक – एक भवन, मन्दिर, प्रासाद, खंडहर, वन – प्रान्तर, गिरी – गहवर, पर्वत – घाटियां और माटी का एक – एक कण आज भी कीर्ति गाथा सुना रहा है। उसी मेवाड़ का कुंभलगढ़ (Kumbhalgarh) – अभेद्य दुर्ग , मेवाड़ के स्वाभिमान की याद दिला रहा है।

मेवाड़ का मुकुट कुंभलगढ़ (Kumbhalgarh) अभेद्य दुर्ग है। आज भी गर्व से सिर ऊंचा किए हुए मेवाड़ के स्वाभिमान की याद दिला रहा हैं। यह वह ऐतिहासिक स्थल है, जिसका निर्माण महाराणा कुम्भा ने करवाया। यहीं वह शौर्य भूमि है, जिसने महाराणा उदय सिंह जी को आश्रय देकर मेवाड़ को पुन: संगठित कर शत्रुओं से लोहा लेने का सामर्थ्य उन्हें प्रदान किया।

यहीं वह कुंभलगढ़ (Kumbhalgarh) अजेय दुर्ग है, जहां युवराज पृथ्वीराज ने अपना पराक्रम दिखाया। कुंभलगढ़ दुर्ग की सबसे महत्वपूर्ण यह कि हिंदुआ सूरज महाराणा प्रताप की जन्मस्थली होने का गौरव भी इसी भूमि को प्राप्त है। कुंभलगढ़ दुर्ग में ही महाराणा प्रताप का प्रारम्भिक जीवन बीता। यहीं से ही प्रताप ने जनता से सीधा सम्पर्क स्थापित कर भावी जीवन का उद्देश्य निश्चित किया।

अबुल फजल के अनुसार – यह दुर्ग इतनी बुलंदी पर बना हुआ है कि नीचे से ऊपर की तरफ देखने पर सिर से पगड़ी गिर जाती है।

कर्नल जेम्स टॉड ने चितौड़गढ़ के बाद इस दुर्ग को रखा है। सुदृढ़ प्राचीर, बुर्जों और कंगुरो के कारण इसकी तुलना एस्ट्रस्कन से की है।

कुंभलगढ़ दुर्ग का निर्माण –

इस दुर्ग का निर्माण महाराणा कुम्भा ने राजा सम्प्रति के दुर्ग के ध्वंसावशेषो पर 1448 ई . में प्रारम्भ करवाया था। एवम् 1458 ई . तक यह पूरा बन गया था। समुद्र तल से इसकी ऊंचाई 3568 फीट है।

कुंभलगढ़ दुर्ग उदयपुर (राजस्थान) से लगभग 100 किमी उत्तर में अरावली की पर्वतमाला के बीच एक ऊंची उपत्यका पर बना है।

इस दुर्ग की प्राचीर 36 मील लम्बी एवं 7 मीटर चौड़ी है। जिस पर पांच घुड़सवार एक साथ चल सकते हैं। इसलिए इसे भारत की महान दीवार के नाम से जाना जाता हैं।

कुंभलगढ़ (Kumbhalgarh) अजेय दुर्ग महाराणा कुम्भा की सामरिक एवं कृतित्व शक्ति की प्रतिभा का अद्वितीय प्रतीक हैं।

दुर्ग के निर्माण के उपलक्ष में कुम्भा ने नए सिक्कों का भी प्रचलन आरम्भ किया और उन पर अपना तथा दुर्ग का नाम अंकित करवाया।

प्राचीन पुस्तकों एवम् शिलालेखों में इस दुर्ग के कई नाम मिलते हैं जैसे – माहोर, कुम्भपुर, कुंभलमेरू, माछिंदरपुर आदि।

इस दुर्ग का निर्माण प्रमुख शिल्पी मंडन के द्वारा करवाया। इस दुर्ग की गिनती पूरे भारत में अभेद्य दुर्गों में होती है।

द्वार एवं प्रासाद –

इस दुर्ग में प्रवेश करने के लिए तीन प्रमुख द्वार हैं। केलवाड़ा से जाने पर लगभग 700 फीट की ऊंचाई पर एक प्रहरी द्वार आता है, जिसे ” आरेठ पोल “ कहते हैं। गढ़ का प्रमुख प्रवेश द्वार ” हनुमान पोल “ हैं। जहां महाराणा ने मांडल्यापुर से लाई गई हनुमान जी की मूर्ती की स्थापना की थी।

“कटार गढ़” – इस बाहरी दुर्ग में अन्तरंग दुर्ग स्थित हैं, जिसे कटार की भांति उर्ध्व स्थिति के कारण कटार गढ़ कहते हैं। इसके भीतर पहुंचने के लिए विजयपोल , रामपोल , भेरवपोल , नींबूपोल , चौगानपोल , पागड़ापोल एवं गणेशपोल हैं।

इस भीतरी दुर्ग का प्रथम प्रासाद झील का मालिया है, जो महाराणा उदयसिंह की झाली रानी के नाम से जाना गया है। यहां का सबसे ऊंचा स्थान महाराणा कुम्भा द्वारा निर्मित राज प्रासाद हैं, जो अपने आप में इस महान विभूति की सादगी का परिचायक हैं।

कुंभलगढ़ दुर्ग में शिव एवं विष्णु के मंदिरों के अतिरिक्त कई जैन मंदिर भी हैं। गढ़ के भीतरी भागों को इस प्रकार से बांधा गया है कि वे जलाशय बन जाए और उनके द्वारा सिंचाई की सुविधा हो सके।

यह किला एक अपवाद छोड़ कर कभी भी आक्रांताओ द्वारा जीता नहीं जा सका। मालवा का सुल्तान महमूद तथा गुजरात के सुल्तान ने यह किला जितने की कोशिश की, लेकिन उन्हें मात खाकर लौटना पड़ा।

महाराणा उदयसिंह का राज्याभिषेक भी इसी किले में हुआ तथा प्रताप के लिए भी यह उपयोगी सिद्ध हुआ।

सामरिक दृष्टि से सुरक्षित स्थल –

कई पहाड़ियों और घाटियों को मिलाकर इस किले को ऐसा सुनियोजित किया गया कि जिससे उसकी सुरक्षा स्वाभाविक रूप से भी होती रहें। आस पास के ऊंचे स्थान, मन्दिर, और राजप्रासादो के लिए और ढलान के भागों को जलाशयों के लिए रखा गया है।

कुंभलगढ़ दुर्ग को यथासाध्य स्वावलंबी बनाने का प्रयत्न किया गया है। जिससे भीतर रहने वाले परिवार लम्बे समय तक चलने वाले घेरे में भी सुरक्षित रह सकें। महाराणा कुम्भा के समय से महाराणा राजसिंह तक के काल में हुए आक्रमणों के समय राज परिवार एवम् नागरिकों को यहां सुरक्षित रखने की व्यवस्था की गई थी।

इस सम्पूर्ण क्षैत्र को सुदृढ़ प्राचीरो, बुर्जो और द्वारों से इस प्रकार से बनाया गया कि जिससे शत्रु सेना का प्रवेश आसानी से न हो सके। किले के चारों ओर की प्राचीर इस युक्ति से बनाई गई कि जिन पर सीढ़ियां लगा कर बाहर से चढ़ना कठिन था।

यह परकोटा इतना चौड़ा है कि इस पर कई सैनिक और घुड़सवार एक साथ चल सकते है। बीच – बीच में बुर्जों के निर्माण से सैनिक संगठन और सुरक्षा का प्रबन्ध सुदृढ़ हो गया। आज भी बीहड़ों, जंगलों से घिरा हुआ या कुंभलगढ़ (Kumbhalgarh) अजेय दुर्ग है जो देश के सबसे दुर्गम दुर्गों में से एक है।

आपके अमूल्य सुझाव, क्रिया प्रतिक्रिया स्वागतेय है।

रणचण्डी वीरांगना जवाहर देवी और तुर्क आक्रांता बहादुरशाह

     मै आपको इतिहास की ऐसी घटना के बारे में बता रहा हूं जो इतिहास में इस घटना को छिपाया गया , लेकिन मुगलों के इतिहास में इसका वर्णन मिलता है। एक ऐसी रणचण्डी वीरांगना जवाहर देवी और तुर्क आक्रांता बहादुर शाह की। जिसमें जवाहर देवी ने रणचण्डी बन, अप्रतिम शौर्य से शत्रु सेना को तहस नहस कर दिया। और लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुई।

चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर गुजरात के तुर्क आक्रांता बहादुर शाह ने आक्रमण कर दिया। किले को चारों ओर से घेर लिया। शत्रुओं की तोपे किले पर गोले बरसा रही थीं। शत्रु सेना का दबाव दिनोदिन बढ़ता ही जा रहा था। चितौड़गढ़ के किले का भार रावत बाघसिंह जी पर था। अपने एवं साथी शुरवीरो के असाधारण रणकोशल के बावजूद उन्हें अब चित्तौड़ की रक्षा की उम्मीद नहीं थी। बड़े ही निराश मन से वह महारानी कर्मवती के पास पहुंचे। और महारानी जी को उन्होंने युद्ध की ताजा जानकारी दी।

” फिर आपने क्या सोचा है रावत जी ? ”  महारानी कर्मवती ने पूछा।

” महारानी साहिबा , चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा करना अब मुमकिन नहीं हैं।” बाघसिंह जी ने बताया, ” शत्रुओं की तोपो के गोलों को हमारी तलवारें कब तक रोक पाएगी। दुर्ग पर आज नहीं तो कल शत्रु की सेना का कब्जा होने वाला है। चित्तौड़ की रक्षा न सही राजपूती आन – बान – शान की रक्षा तो होनी ही चाहिए ।  इसके बाद बाघसिंह जी रुक गए।  

 ” आप रुके नहीं और बिना संकोच कहें।” रानी कर्मवती ने थोड़ा संचित होते हुए किन्तु दृढ़ स्वर में कहा।

 बाघसिंह जी बोले, ” महारानी साहिबा ! अब हमारे लिए बस एक ही रास्ता है।  राजपूत सैनिक तो केसरिया बाना पहन आखिरी लड़ाई लड़े और क्षत्राणीयां जौहर करे , फिर जैसा आपका हुक्म। ” 

 रानी कर्मवती कुछ देर तक विचार मग्नता की स्थिति में रहीं। काफी देर इस सोच विचार के बाद वह गंभीरता से बोली —  रावत जी ! आप ठीक ही कहते हैं। अब हमारे सामने दूसरा उपाय भी क्या है ? गढ़ की रक्षा न सही, मान मर्यादा की रक्षा तो करनी ही होगी। आप हुक्म जारी कर दे और जौहर के लिए चन्दन एवम् घी का प्रबन्ध करें।”

रानी जवाहर देवी वहीं पास ही खड़ी थी। वह कर्मवती की दूर के रिश्ते में चचेरी बहन लगती थी। वह कर्मवती के साथ ही रहती थी। इस बातचीत को सुनकर वह बोलीं – ” बाईजी सा ! मै जौहर नहीं करूंगी। ” 

 ” क्यूं   ?  जौहर की ज्वाला से डर लगता हैं क्या ? ” रानी कर्मवती ने पुछा । जवाहर देवी ने जवाब दिया — ” बाईजी सा ! ज्वाला से तो मेरा तन जल ही रहा है। मेरी रगों में भी वहीं खून है जो आपकी रगो में बह रहा है। क्षत्राणीयों को डर कैसा ? ” 

” तो फिर क्या बात है ? ” कर्मवती ने पूछा। 

” बात यह है बाईजी सा कि जब मरना ही है तो शत्रुओं से डरकर क्यों , शत्रु से लड़कर ही क्यों न मरा जाए । ” जवाहर देवी ने दृढ़ता से कहा। 

 ” क्या कह रही हो ?” रानी कर्मवती के कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। 

” बाईजी सा मैने अपने दाता (पिता) से तलवार चलाना और घुड़सवारी सीखी है।” जवाहर देवी ने आगे कहा  – मै जौहर करना नहीं शौर्य दिखाना चाहती हूं। इस युद्ध में तुर्को को धरती में गाड़ दूंगी। 

बाघसिंह जी ने शंका व्यक्त की – ”  यह तो ठीक है रानी सा ! लेकिन आप युद्ध में लड़ती हुई शत्रुओ के हाथों में पड़ गई और उन्होंने ….”

 ”  रावतजी हम पर भरोसा रखो । नारी के शौर्य एवम् तेज पर इस प्रकार संशय करना उचित नहीं है। ”   अपनी बात पूरी करते करते जवाहर देवी का चेहरा तमतमा उठा।  ” हम राजपूत नारियां अपनी इज्जत रखना बखूबी जानती है । ऐसी स्थिति में हम जहर से बुझी कटार अपनी छाती में घोप लेंगे। ”  

रावत बाघसिंहजी की शंका दूर हो गई। कर्मवती ने प्यार से जवाहर देवी का माथा चूमा। उन्होंने उन्हें आज्ञा दी एवम् आशीष भी।  देखते देखते बहुत सी क्षत्राणीयां  सैनिक के वेश में जवाहर बाई के साथ हो ली। 

सुबह किले का प्रवेश द्वार खोल दिया गया। राजपूतों ने केसरिया बाना पहना। वे हर हर महादेव कहते हुए शत्रुओं पर टूट पड़े । उधर रणचंडी जवाहर देवी की सैन्य टुकड़ी भी ” जय महाकाली !  जय भवानी ।। कहती हुई शत्रुओं का सफाया करती हुई आगे बढ़ने लगी । 

शत्रु मुगल सेना में भगदड़ मच गई। मुगलों के पास राजपूतों की तुलना में बहुत बड़ी सेना थी। आखिर में राजपूत इस लड़ाई में वीरगति को प्राप्त हुए। जवाहर देवी रणचण्डी बन मुगलों की सेना पर टूट पड़ी। वह असाधारण शौर्य दिखाते हुए घायल हुई। इसके बाद भी लड़ती रही। एक के बाद अनेक आक्रमणों की बौछारों ने उन्हें वीरगति प्राप्त हुई। जब तुर्क आक्रांता बहादुर शाह को यह पता चला कि उनकी सेना को तहस – नहस एक राजपूत वीरांगना ने किया है, तो वह भी नारी के शौर्य एवम् तेज के समक्ष मस्तक झुकाए बिना न रह सका। ऐसी वीरांगना रानी जवाहर देवी को नमन।

आशापुरा मां – चक्रवती सम्राट पृथ्वीराज चौहान की कुलदेवी

चौहान वंश के प्रथम प्रतापी राजा वासुदेव ने  551 ई . में शाकम्भर (सांभर) को अपनी राजधानी बनाया तथा अपनी कुलदेवी शाकम्भरी मां का मन्दिर बनवाया। शाकम्भरी आद्यशक्ति भगवती दुर्गा का ही रूप है। शाकंभरी देवी ही आशापुरा मां है। यहीं आशापुरा मां – चक्रवती सम्राट पृथ्वीराज चौहान की कुलदेवी थी।

दुर्गा सप्तशती के अनुसार –

ततोहमखिल लोकमात्मदेहसमुद्भवें: ।  भारीष्यामि सुरा: शाकेरावृष्टे: प्राणधारकै: ।।

शाकंभरीति विख्याती तदा यास्याम्याह भुवि । तत्रेव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यम महासुरम ।।    (दुर्गा सप्तशती ४८-४९/११)

” जब पृथ्वी पर सौ वर्षो के लिए वर्षा रुक जायगी और पानी का अभाव हो जायेगा तो मैं अयोनिजा रुप में प्रकट होऊंगी और अपने शरीर से उत्पन्न हुए शाको द्वारा समस्त संसार का भरण पोषण करूंगी। वे शाक ही सभी जीवधारियों की रक्षा करेंगे। ऐसा करने के कारण पृथ्वी पर शाकम्भरी के नाम से मेरी ख्याति होगी।”

श्रीमद्देवीभागवत के अनुसार –

जब पृथ्वी पर भीषण अकाल पड़ा तो देवी शाकंभरी प्रकट हुई। देवी ने अपनी सैकड़ों आंखों से नौ दिनों तक लगातार वर्षा की तथा अपने शरीर पर भी शाक पात, फल उत्पन्न किए जिससे सभी जीवधारियों की रक्षा हुई और अकाल समाप्त हुआ।

शत शत नेत्रों से बरसाया नौ दिनों तक अति अविरल जल। भूखे जीवों के हित दिए अमित तृण शाक सुचि फल।।

उस समय से शाकमभरी देवी की पूजा की जाने लगी। राजा वासुदेव ने अमृत तुल्य फल देने वाली शाकमभरी देवी को अपनी कुलदेवी बनाया। राजा वासुदेव ने जांगल देश की एक बड़ी झील के किनारे देवगिरि पहाड़ी पर कुलदेवी शाकंभरी का मन्दिर बनाया। और उसी स्थान पर एक नगर बसा कर उसका नाम शाकंभर रखा। जो कालान्तर में बिगड़ कर सांभर कहलाने लगा।

प्राचीन काल में चौहान जांगल देश, सपालदक्ष एवं अनन्त देश के राजा थे और अहिछत्रपुर उनकी राजधानी थी। वे शाकंभरी देवी के कारण ही शाकंभराधीश कहलाते थे।

शाकम्भरी मां के शक्तिपीठ – 

सहारनपुर (उ . प्र .) –  

सहारनपुर की शिवालिक पहाड़ियों के अंचल में स्थित शाकमभरी देवी का अति प्राचीन मन्दिर है। जहां देवी प्रकट हुई थी।

सांभर (राज .) – 

सांभर झील के पास देवगिरि पहाड़ी पर राजा वासुदेव द्वारा प्रतिष्ठित अति प्राचीन मन्दिर है।

सकराय माता (सीकर – राज .) – 

सीकर जिले में सकराय माता जी का प्रसिद्ध मन्दिर जो लगभग 1250 वर्ष प्राचीन है। यहां पर भी पूरे वर्ष माता के भक्त आते हैं।

कालांतर  में सब आशाओं को पूर्ण करने वाली शक्ति के रुप में शाकंभरी ही आशापुरा, आशापुरी या आशापूर्णा कहलाने लगी। वैसे इस नामकरण के पीछे कई कथाएं प्रचलित हैं। आशापूर्णा नाम इतिहास में सबसे पहले सांभर नरेश वाकपतिराज (917- 944 ई .) व नाडोल राज्य के संस्थापक राव लाखण (951 – 982 ई.) के बीच मिलता हैं।

राजा वासुदेव, सामंत, दुर्लभराज एवम् वाक् पति आदि ने कुलदेवी की आराधना करके अपनी मनोकामनाएं, आशाएं पूर्ण कर ली थी। कुलदेवी की कृपा से ही साम्राज्य एवं वंश का विस्तार हुआ था।  यह देवी सब की आशाएं पूर्ण करने वाली थीं इसलिए इस देवी को आशापुरा या आशापूर्णा कहलाने लगा। 

राजा सोमेश्वर, पृथ्वीराज एवं चाहड़देव  आदि राजाओं के सिक्को पर आशापुरी देवी का नाम अंकित होता था।

नाडोल (राज .) – 

क्षत्रिय धर्म – क्षतात् त्रायते इति क्षत्रिय:

क्षत्रिय धर्म – क्षतात् त्रायते इति क्षत्रिय अर्थात् जो विनाश से बचाए, विनाश से रक्षा (त्राण) करता है वही क्षत्रिय हैं। धर्म का अर्थ है धारण करना। जो अधर्म, अन्याय, अत्याचार, असत्यता एवम् उत्पीड़न से रक्षा करता है वही क्षत्रिय धर्म है।

मनुस्मृति के अनुसार –

धृति: क्षमा दमोऽस्‍तेयं शौचमिन्‍द्रियनिग्रह:।धीर्विद्या सत्‍यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्‌।। (मनुस्‍मृति ६.९२)

अर्थ – धृति (धैर्य ), क्षमा (अपना अपकार करने वाले का भी उपकार करना ), दम (हमेशा संयम से धर्म में लगे रहना ), अस्तेय (चोरी न करना ), शौच ( भीतर और बाहर की पवित्रता ), इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को हमेशा धर्माचरण में लगाना ), धी ( सत्कर्मों से बुद्धि को बढ़ाना ), विद्या (यथार्थ ज्ञान लेना ). सत्यम ( हमेशा सत्य का आचरण करना ) और अक्रोध ( क्रोध को छोड़कर हमेशा शांत रहना )। यही धर्म के दस लक्षण है।

श्रीमद्भागवत के अनुसार धर्म के तीस लक्षण –

श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कन्ध में धर्म के तीस लक्षण बतलाये हैं और वे बड़े ही महत्त्व के हैं :सत्यं दया तप: शौचं तितिक्षेक्षा शमो दम:।अहिंसा ब्रह्मचर्यं च त्याग: स्वाध्याय आर्जवम्।।संतोष: समदृक् सेवा ग्राम्येहोपरम: शनै:।नृणां विपर्ययेहेक्षा मौनमात्मविमर्शनम्।।अन्नाद्यादे संविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हत:।तेषात्मदेवताबुद्धि: सुतरां नृषु पाण्डव।।श्रवणं कीर्तनं चास्य स्मरणं महतां गते:।सेवेज्यावनतिर्दास्यं सख्यमात्मसमर्पणम्।।नृणामयं परो धर्म: सर्वेषां समुदाहृत:।त्रिशल्लक्षणवान् राजन् सर्वात्मा येन तुष्यति।। (७-११-८ से १२ )

लेकिन क्या यह सब क्षत्रियों के लिए ही है या मानव मात्र के लिए ! क्षत्रिय कभी अधर्म, अन्याय, अत्याचार, असत्यता, धूर्तता एवं उत्पीड़न के सामने झुका नहीं लेकिन अब बस … हम बहुत पीड़ा भोग चुके हैं। अब जाग कर उठना ही हमारा धर्म हैं। धीरे धीरे हम जहां थे, वहा से हटाने के लिए साजिशें रची गई। हमारे त्याग, तप और बलिदानों को दूसरे रूप में पेश करना शुरू कर दिया। सभी वर्गो की दृष्टि में हमारा शोषक का चरित्र चित्रण कर उनकी नजरों से गिराने की साजिशें रची गई। उसी साजिश के तहत आज भी 70 वर्षों से यह क्रम निरन्तर जारी है।

चाहे मीडिया (प्रिन्ट और इलेक्ट्रोनिक) हो, बड़ा हिन्दूवादी संगठन हो या सरकारें हो यह सब राजपूतों के खिलाफ एक टूल किट की तरह काम कर रही है। कभी राणा पूंजा को भील प्रचारित करते हैं तो सम्राट मिहिरभोज को गुर्जर, सम्राट पृथ्वीराज को, पन्नाधाय आदि को अन्य जाति के बता कर आपस में लड़ाने का कार्य कर रहे हैं। धीरे धीरे इतिहास को विकृत किया जा रहा है।

अब क्षत्रियों को मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की तरह नहीं, योगेश्वर श्री कृष्ण की तरह सोचने को मजबूर कर देगे। हमें भी यहीं करना होगा।

धर्म –

धर्म “ शब्द ‘ धृ धारणे ‘ धातु में मन प्रत्यय लगाने पर निष्पन्न होता हैं। इसका अर्थ है धारण, पोषण और रक्षण करना आदि। इसलिए जो धारण किया जाता हैं वह धर्म है। धारणाद धर्म:। वैश्विक दर्शनकार कणाद मुनि ने भी धर्म के लक्षण बताते हुए लिखा है – यतोभ्युदयनि: श्रेयससिद्धि: स धर्म:(सूत्र .१/१/२) अर्थात् जिन कर्मो का अनुष्ठान करने से मनुष्य जीवन का अभ्युदय हो और अन्त में नि: श्रेयस की प्राप्ति हो वह धर्म है। यहां अभ्युदय का अर्थ है जीवन में सर्वांगीण विकास अर्थात् उत्थान या उन्नति। इसमें लौकिक तथा अध्यात्मिक दोनों आ जाते है। इससे भिन्न नि: श्रेयस का अभिप्राय मोक्ष की प्राप्ति।

जिसे धारण किया जाए वह धर्म है। प्रजा धर्म को धारण करती है। धर्म का आचरण एवं पालन करती है इसलिए वह धर्म है। और धर्म भी प्रजा को धारण करता है अर्थात् उन्नति या उत्थान के मार्ग पर ले जाता है इसलिए इसका नाम धर्म हैं। अतः जो व्यक्ति को, समाज को तथा राष्ट्र को धारण करता है, उसका रक्षण करता है और कल्याण करता है। वह निश्चय धर्म ही है।

ऋग्वेद के अनुसार –

त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्य: । अतो धर्माणी धार्यन ।। (ऋग .१/२२/२८)

परमेश्वर ने व्योम मण्डल के बीच त्रिपाद परिमित स्थानों में त्रिलोक (पृथ्वी, अन्तरिक्ष और धुलोक) का निर्माण करके उनके भीतर धर्मो (जगत – निर्वाहक कर्मों) को स्थापित किया है।

इसलिए शास्त्रों में कहा गया है – धर्म चर । मानव को चाहिए कि वह धर्म कर्मो का आचरण करें, धर्म के मार्ग पर चले क्योंकि धर्मों सुखमासित – धर्म में ही परम सुख, तथा शांति निहित है। इसलिए मनुष्य धर्म के मार्ग पर चलकर ही सुख, समृद्धि, शांति और मोक्ष रूप परम पद को प्राप्त कर सकता हैं।

धर्मान्न प्रमादितव्यम – धर्म कर्मो के आचरण में कदापि प्रमाद नहीं करना चाहिए। हमारे प्राचीन काल के ऋषि महर्षि गण इसी धर्म के बल पर ही महान बने थे। और धर्म के बल पर ही उन्होंने इस देश को स्वर्गादपि गरीयसी बना दिया था।

मनु ने कहा है – धर्म एव हतो हंति धर्मों रक्षति रक्षित:। तस्माद्धर्मो न हंतव्यो मा नो धर्मो हतो वधित।। अर्थात् जो मनुष्य धर्म का अतिक्रमण – उल्लंघन करता है, धर्म का परित्याग कर देता है तो धर्म भी उसे क्षमा नही करता। उसका समूल नाश कर डालता है। परन्तु जो धर्म की रक्षा करता है, सच्चे मन से धर्म का अनुष्ठान करता है धर्म भी उसकी रक्षा करता है। नष्ट हुआ धर्म कही हमे नष्ट न कर दे, इसलिए धर्म का नाश अर्थात् परित्याग कदापि नहीं करना चाहिए।

धर्म के आचरण से कितने ही राजपद तथा मोक्ष पद को प्राप्त हो गए और धर्म का परित्याग करके कितने ही नष्ट भ्रष्ट हो गए।

धर्म मानवता का मेरूदंड है। धर्म मानवता को तोड़ता नहीं जोड़ता है। विघटन नही करता प्रत्युत समाजस्य स्थापित करता है। संकट में नहीं डालता किन्तु संकट से उभारता हैं। शत्रुता नहीं करता बल्कि प्रेम, प्रीति तथा मित्रता की भावना को उजागर करता है। युद्ध नहीं करता वरन शांति का साम्राज्य स्थापित करता है। केवल इतना ही नहीं – वसुधैव कुटुंबकम् की भावना को जागृत करके विश्वबंधुत्व स्थापित करता है।

आपके अमूल्य सुझाव, क्रिया प्रतिक्रिया स्वागतेय है।

हल्दीघाटी : रक्तरंजित पावन माटी

हल्दीघाटी का स्वतंत्रय महायुद्ध मेवाड़ इतिहास का स्वर्णिम अध्याय हैं। मेवाड़ के इस गरिमामय धरा के योद्धाओं ने हमेशा तीर – तलवारों की चमचमाहट और तोपो की गर्जनाओं में अपनी स्वाधीनता की रक्षार्थ तपते रहकर शोर्यपरक संघर्ष से राष्ट्रीय चेतना की मशाल को प्रदीप्त रखा है। 

महाराणा प्रताप के नेतृत्व में लड़े गए हल्दीघाटी युद्ध में इस धरती का कण कण क्षत्रिय और क्षत्रियेत्तर जातियों के योद्धाओं के खून से लाल होकर मानव शौर्य का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत करता है। मेवाड़ के महाराणा और जन जन अपनी धरा, धर्म की रक्षार्थ चौदह सौ वर्षो पर्यन्त विदेशी आक्रांताओं से लोहा लेते रहें हैं । 

हल्दीघाटी का युद्ध 

हिंदुआ सूरज महाराणा प्रताप ने अपनी कुल मर्यादा और देश रक्षा के लिए कठोर जीवन जीकर जो अनवरत संघर्ष किया , वह इतिहास में सुनहरे अक्षरों में अंकित है। शहंशाह अकबर के आगे समस्त शासक नत – मस्तक हो गए लेकिन राष्ट्रवीर प्रताप अडिग रहें। मेवाड़ वंश की गौरव – गरिमा को बनाए रखा और साहस के साथ परिस्थितियों से जूझते रहे। 

ऐसे अनमोल राष्ट्रहित कार्यों ने उनको राष्ट्रनायक बना दिया । हल्दीघाटी युद्ध में मेवाड़ के मुट्ठी भर शूरवीर , आक्रांता की विशाल और सुसज्जित सेना का डटकर मुकाबला करते अपने प्राणों का उत्सर्ग कर आज़ादी की तवारिख में अमर हो गए । 

बहलोल खा को घोड़े सहित काटना

हल्दीघाटी युद्ध इतना भीषण था कि नरकेसरी महाराणा प्रताप ने शत्रु सेना के बहलोल खा को एक ही वार मे घोड़े सहित काट दिया। ऐसे राष्ट्रवीर नर नाहर प्रताप का राष्ट्र ऋणी है।

सेनापति मान सिंह का होंदे में छिपना

नरकेसरी प्रताप युद्ध भूमि में सीधे अकबर के सेनापति मान सिंह, जो हाथी पर सवार था के सामने पहुंचे। चेतक ने जैसे ही हाथी के मस्तक पर पांव रखा तो प्रताप ने भाले से वार किया। महावत मारा गया। मान सिंह हाथी के होंदे में छिपने से बच गया। हाथी की सूंड में लगी तलवार से चेतक घायल हो गया।

रक्त तलाई

हल्दीघाटी के भीषण युद्ध में इतना रक्त बहा की उस भूमि पर खून की तलाई बन गई। तब से उस स्थान को रक्त तलाई के नाम से जाना जाता हैं । धर्म और धरा के लिए लड़े इस युद्ध में मेवाड़ की सेना के वीरों ने अपना बलीदान दिया। वास्तव मे यह हल्दीघाटी किसी धाम या तीर्थ से कम नहीं हैं रक्त रंजित पावन माटी।

इतिहासकारों के अनुसार

लेफ्टी . कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार- 

कर्नल जेम्स टॉड ने हल्दीघाटी युद्ध को अत्यन्त महत्त्व देते हुए इसे मेवाड का  थर्मोपाली और  दिवेर युद्ध को मैराथन  लिखा हैं (थर्मोपेली, उत्तरी और पश्चिमी यूनान के बीच एक संकरी घाटी है। जिसके बीच की भूमि सपाट है) एनाल्ज एण्ड एंटीक्वाटीज ऑफ राजस्थान के रचयिता कर्नल जेम्स टॉड (1782- 1835) राजस्थान की आधुनिक एतिहासिकी के संस्थापक के रूप में एक यशश्वी हस्ताक्षर है।

डॉ. गोपीनाथ जी शर्मा के अनुसार – 

मेवाड़ – धरा के प्रतिष्ठित इतिहासविद डॉ. गोपीनाथ जी शर्मा ने इस युद्ध को अपने शब्दों में यूं चित्रित किया है –  ” The Haldighati fitly assigns to Pratap a position of an upholder of pride of his race and his country. As a great warrior of liberty, devoted lover of noble cause and hero of moral character, his name is to millions of men, a ray of hope by day and a pillar of light by night. Even today Pratap remains a beacon light to millions and the Haldighati a pilgrimage to thousands. “

कवि श्यामल दास (वीर विनोद), गौरीशंकर ओझा, अल्बदायुनी, अबुल फ़ज़ल आदि इतिहासकारों ने युद्ध के वर्णन में इसकी भीषणता का वर्णन किया है।

 

हल्दीघाटी युद्धभूमि

विश्व प्रसिद्ध हल्दीघाटी भारत के राजस्थान में उदयपुर शहर से उत्तर पश्चिम में 44किलोमीटर तथा भगवान श्री नाथजी (नाथद्वारा) की नगरी से 11 मील दक्षिण – पश्चिम में है। गोगुंदा और खमनोर के बीच विकट पहाड़ी श्रेणियां में एक तंग रास्ते वाली घाटी को हल्दीघाटी कहते हैं। यहां की मिट्टी हल्दी जैसे पीले रंग की होने के कारण ही हल्दीघाटी नाम पड़ा है। दोनो सेनाओं का भीषण युद्ध विक्रम संवत्1633 द्वितीय ज्येष्ठ सुदी तदानुसार  18  जून 1576 में  हुआ । 

महाराणा प्रताप की सेना

मेवाड़ की ख्यातो में महाराणा प्रताप के साथ 20,000 सवार लिखा है। नेनसी ने प्रताप के साथ 10000 सवार होना बताया है। अल्बदायू ने महाराणा की सेना में 3000 सैनिक बताया है। लेकिन यह तो सत्य है की मेवाड़ की सेना से दुगुनी से कहीं अधिक थी। मेवाड़ की सेना में धर्म और धरा के लिए लड़ने वाले राष्ट्रवीर योद्धा थे। तो अकबर की सेना में भाड़े के सैनिक थे।

अकबर की सेना

मेवाड़ की ख्यातो में अकबर की सेना में मान सिंह के नेतृत्व के साथ 40,000 सैनिक लिखा है। मुहनोत नेनसी ने मान सिंह की सेना में 40,000 सेना बताया है। अल्बदायू ने जो इस लड़ाई में स्वयं था उसने मान सिंह की सेना में 5000 सवार लिखा है।

हल्दीघाटी के योद्धा

महाराणा प्रताप के योद्धा –

हल्दीघाटी युद्ध में मेवाड़ की सेना में ग्वालियर के रामशाह तंवर अपने तीनों पुत्रों शालीवाहन , भवानी सिंह और प्रताप सिंह सहित , झाला मान सिंह सज्जावत (देलवाड़ा वालों के पूर्वज) , भामाशाह और भाई तारा चन्द , झाला बीदा सुल्तानोत (बड़ी सादड़ी वालों के पूर्वज ) , सोनगरा मान सिंह अक्षयराजोत , डोडिया भीम सिंह (सरदार गढ़ वालों के पूर्वज) , रावत कृष्णदास सलुंबर , रावत नेत सिंह सारंगदेवोत कानोड़ , रावत सांगा देवगढ़ , राठौड़ रामदास (बदनोर के प्रसिद्ध जयमल के सातवें पुत्र) , मेरपुर (पानरवा) के राणा पूजा सोलंकी, पुरोहित गोपीनाथ, पुरोहित जगन्नाथ, पड़िहार कल्याण, मेहता जयमल बच्छावट, मेहता रतन चन्द खेतावत, महा साहनी जगन्नाथ, राठौड़ शंकर दास केलवा, चारण जैसा और केशव सौदा बारहट सोन्याना प्रमुख थे। हकीम खां सूर भी मुगलों से लड़ने के लिए राणा की सेना में शामिल हुए।

अकबर के योद्धा –

हल्दीघाटी युद्ध में अकबर की सेना से सेनापति कुंवर मान सिंह आमेर अपने साथियों – गांजी खा, ख्वाजा मुहमद बादाख्शी, कांजी खां, इब्राहिम चिश्ती, जगन्नाथ कछवाहा, राजा भारमल आमेर का छोटा पुत्र, माधो सिंह कच्छवाहा , मुजाहिद बेग, खंगार कच्छवाहा, लूणकरण (शेखावत शाखा के मूल पुरुष शेखा का प्रपौत्र) आदि प्रमुख थे ।

हल्दीघाटी युद्ध का परिणाम

महाराणा प्रताप की विजय

मेवाड़ की ख्यातो, पट्टे – परवानों के अनुसार हल्दीघाटी युद्ध महाराणा प्रताप जीते। राज . वि . वि . के प्रो . एवम् इतिहासकार डॉ . चंद्रशेखर शर्मा अपने शोध में प्रताप की विजय को दर्शाते ताम्र पत्र और पट्टो का हवाला देते हुए बताया कि – हल्दीघाटी युद्ध के बाद अगले एक वर्ष तक महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के आसपास के गांवो के भूमि के पट्टे, ताम्रपत्र जारी किए। इन ताम्रपत्रो पर एकलिंगनाथ के दीवान प्रताप के दस्तखत है। उस समय भूमि के पट्टे जारी करने का अधिकार केवल राजा (शासक) को ही होता था। 

अकबर की हार

इतिहासकार डॉ . चंद्रशेखर शर्मा शर्मा ने अपने शोध में बताया कि युद्ध के बाद सेनापति और आसिफ खा से अकबर नाराज हुआ। दोनों को छः माह तक दीवाने खास/दीवाने आम (दरबार) में आने की पाबंदी लगा दी।

यदी मुगल सेना विजय होती तो अकबर का सबसे बड़ा शत्रु प्रताप को हराने वाले को पुरुस्कृत करता न कि सजा देता।

मुगल सेना न तो प्रताप को बंदी बना सकी और न ही मार सकी। इतिहास में सर्वविदित है कि जब तक कोई राजा मारा नहीं जाता या बंदी नहीं बना लिया जाता या फिर आत्मसमर्पण नहीं करता तब तक वह हारा हुआ नहीं माना जाता। 

निष्कर्ष (Conclusion)

हल्दीघाटी की रक्तरंजित पावन माटी किसी तीर्थ या धाम से कम नहीं हैं। इसी भूमि पर धर्म और धरा (मातृभूमि) के लिए शत्रु सेना अकबर से राष्ट्रवीर मेवाड़ की सेना के बीच युद्ध हुआ। महाराणा प्रताप की सेना में अनगिनत योद्धाओ के साथ राणा पूंजा सोलंकी के नेतृत्व में वनवासी भीलो ने भी तीर – कमानो से युद्ध लड़ा। और तो और इसमें चेतक, हाथी रामप्रसाद, हाथी लूणा आदि ने भी अतुलनीय योगदान दिया। पठान योद्धा हकीम खां सूर भी प्रताप की ओर से अकबर के विरुद्ध लड़कर इतिहास में अमर हो गए। इनकी वीरगति के बाद भी हाथ से तलवार नहीं छूटी तो तलवार के साथ ही दफनाया गया।

हल्दीघाटी युद्ध में जाति, धर्म, वर्ग और वर्ण की भावनाओ से परे जहा अनगिनत योद्धाओं ने अपना बलिदान दिया। और शत्रु सेना से लोहा लिया। ऐसी शौर्यधरा हल्दीघाटी दुनिया में इकलौती ही है।

यह शोधपरक लेख आपकों कैसा लगा हमे सुझाव देवे। आपके सुझाव हमारा मार्गदर्शन करेंगे। धन्यवाद। जय एकलिंगनाथ ।

सन्दर्भ : –

  • एनाल्ज एण्ड एंटिक्विटिज ऑफ राजस्थान
  • वीरविनोद
  • गौरीशंकर ओझा का इतिहास
  • डॉ . गोपीनाथ शर्मा 
  • राणा रासो
  • बांकीदास री ख्यात
  • कु . देवीसिंह मंडावा की पुस्तक ‘ स्वतन्त्रता के पुजारी प्रताप
  • राणाजी री बात 
  • प्रो . देवकर्ण सिंह जी रूपाहेली कृत ‘ हल्दीघाटी हाल ‘

जौहर : सतीत्व रक्षार्थ सर्वस्व समर्पण

जौहर शब्द में शौर्य , त्याग , बलिदान नारी जीवन की अस्मिता , निष्कलंकता और प्राणोत्सर्ग की उद्दात भावना का समावेश रहा है। जिस प्रकार जौहरी रत्नों की निष्कलुशिता की परख करता है। उसी प्रकार जौहर ने समाज एवं संस्कृति को पतित होने से रोकने में अपना जीवन समर्पित कर दिया है। 

जौहर क्या है :-

कर्नल जेम्स टॉड (A Historian) के अनुसार –  

O ! the galaxy of those brave , determined , women – mothers , daughters , sisters , who had willingly and unflinchingly embraced the leaping flames of  ” Johur ” lest theerass desires of a savage and barbarous horde desecrate their persons ? – a galaxy well worthy of being …..celestiafied higher than the nabulous galaxies , at the very feet of God . 

1.  ” ……. nor can we doubt that , educated as are the females of that country , they gladly embrace such a refuse from pollution . Who would not be a Rajput in such a case ? ….. ” 

‘ राष्ट्रकवि ‘ मैथिलीशरण गुप्त ने  ” जौहर ” पर सटीक शब्दों में निम्न वर्णन प्रस्तुत किया है जो पठनीय है — 

” विख्यात थे जौहर यहां के आज भी है लोक में ।  हम भग्न है उन ‘पद्मिनी ‘ सी देवी ओ की शोक में ।।

” आर्य स्त्रियां निज धर्म पर मरती हुई डरती नहीं । साधान्त सर्व सतीत्व शिक्षा विश्व में मिलती नहीं ।।

सुकवि  ‘ दिनकर ‘ ने भाव विभोर होकर कहा है कि  — 

” कितनी द्रुपदा के बाल खुले , कितनी कलिओ का अन्त हुआ ।

 कह हृदय खोल चित्तौड़ , कितने दिन जौहर बसन्त हुआ ।।

इतिहासकार डॉ . लक्ष्मण सिंह जी राठौड़ के अनुसार —

” History is awash with many an illuminating tale , But ; no where in its cavernous collection , one cantrace . The unrivalled example of a beloved Handing over the blade of a sword to her dearest ! “

डॉ . लक्ष्मण सिंह जी राठौड़ की अपनी काव्य कृति में ( The Johar of Padmini) निम्न उद्गार बहुत ही सुन्दर बन पड़े हैं — 

Thus spoke ! Padmini paused and then continued : ‘Johar ‘ is the highest form of sacrifice An offering of one’s honour to him At whose touch the soul attains everlasting chastity .

‘ Johar ‘ is without blemish . It flame is imperishable . where soul’s splendour is unfaded glory shine . 

Over its undying embers. ‘ Johar ‘ is the zenith of bravery where one is willing to face pain . To bring into existence  A brave new world of enduring existence . 

‘  Johar ‘ is faith supreme , A miracle of an astral body , Inspired by occult power. That lifts the soul to the highest pinnacle . ‘ Johar ‘ is for immortal ,Where one can test the power of her soul   And fling one self joyously,

In the unfailing bowers of paradise . Let the flame of ‘ Johar ‘ … Burn in purified glory …. Let it burn bright red …. And illumine for ever the page of History . 

Let the fires of Johar… Awaken the hiroes dead…. And make them feel proud….. Of the sacrifices we made . Let the head of our dead…. Be held high and aloft ………. Over the pride of blazing Johar …. Emblazoned with immortal blaze.

महारानी पद्मिनी के जौहर पर डॉ . एल एस राठौड़ ने मार्मिक चित्रण किया है — 

” Her dazzling ‘Johar ‘  !  Her bright pyre…. Burn up with blazing fire…. And the golden flames in radiance swelled… Spreading far and wide , the saga of a deathless heroine . 

Across the firmament , … Padmini ‘s  soul echoed aloud :  Awake !  the world is for the brave …. Keep your freedom intact …. And don’t let your spirits droop .

Fare well ! Glorious Chittor … Fare well !  To the abode of the brave…. Fare well !  To the determined and the unyielding …. Ages shall not fade their name and their sacrifices .

जौहर – शाका  : — 

जौहर

मध्यकाल की युद्ध प्रणाली में दुर्गों का विशेष महत्व था , दुर्गों को अभेद्य एवं सुरक्षात्मक माना जाता था। शत्रु द्वारा किले को घेर लेने पर महीनों की रसद एवम् भोजन सामग्री एकत्रित करके दरवाजे बंद कर दिए जाते थे । शत्रुओं से टुकड़ियों में झड़पे होती रहती थीं । शत्रु के प्रबल होने पर भोजन सामग्री एवम् रसद समाप्त हो जाती थीं और तब अंतिम निर्णायक खुला युद्ध लड़ने के सिवाय कोई चारा नहीं रह जाता था

ऐसी परिस्थिति उत्पन्न होने पर दुर्ग में उपस्थित महिलाओं का सामूहिक अग्नि समर्पण जौहर के नाम से प्रसिद्ध हुआ । संभवतः यह शब्द अरबी / फारसी या हिब्रू भाषा से आया है। जिसका अर्थ होता है ” बेमिसाल करिश्मा ”

मुस्लिम आक्रांताओं ने भी जब यह देखा कि दुर्ग की समस्त सेना केसरिया कसूमल बाना पहन कर बाहर निकल बाहर निकल आई है एवम् अभूतपूर्व वीरता दिखा कर शत्रु में त्राहि त्राहि मचा कर समाप्त हो गई है । स्वाधीनता हेतु यह मृत्यु सुख शाका के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।

किले में कहीं कोई हलचल नहीं , नीरव निस्तब्धता चील , कोवों की कांव कांव या दूर किसी श्वान के रोदन के सिवाय कोई आवाज नहीं। शत्रु पक्ष अपनी विजय से उल्लासित तो होता परन्त दुर्ग में प्रवेश के बाद उसकी बैचेनी बढ़ जाती । किले में कहीं कोई हलचल नहीं, नीरव निस्तब्धता , चील कोवों की कांव कांव या दूर किसी श्वान के रोदन के सिवाय कोई आवाज नहीं । एक गहरा सन्नाटा ………….. ।

शत्रु सेना को खबर मिलती है दुर्ग (किले) में भयंकर आग लगी हुई है । अब वहा राख और कोयलो के सिवाय कुछ नहीं है । ऐसा लगता है जैसे सब कुछ जला दिया है । शत्रु सेना भी कहने लगती है । तोबा – तोबा ! क्या इंसान हैं ? ऐसा जौहर न कभी देखा और न कभी सुना , या खुदा ….. । ऐसा तो सिर्फ राजपूत ही कर सकते हैं ।

हिन्दी शब्द सागर के अनुसार जौहर शब्द ‘ जीव ‘ और ‘ हर ‘ शब्द से मिलकर बना है । जिसके अनुसार गढ़ या किले में शत्रु का प्रवेश सुनिश्चित प्रतीत होने पर महिलाएं एवम् बच्चे दहकती हुई चिता में जल जाते थे । इसके अलावा जौहर का अर्थ उस चिता से भी है जो दुर्ग में महिलाओं के जलने के लिए बनाई जाती थी ।

किसी भी प्रारम्भिक मुस्लिम इतिहासकार ने जौहर शब्द का प्रयोग नहीं किया है । जबकि इन घटनाओं का विस्तृत वर्णन दिया है । इससे स्पष्ट है कि इस शब्द की उत्पत्ति और प्रयोग के बारे में शब्द कोश सहायक नहीं हो सकते । इस ऐतिहासिक एवम् गरिमामय शब्द ने अपना जौहर दिखा कर शब्दकोशो को अलंकृत किया है।

संक्षेप संक्षेप में जौहर शब्द में शौर्य , त्याग , बलिदान , नारी जीवन की अस्मिता , निस्कलंकता और प्राणोत्सर्ग की उद्दात भावना का समावेश रहा है । जिस प्रकार जौहरी रत्नों की निष्कलुशिता की परख करता है। उसी प्रकार जौहर ने समाज एवं संस्कृति को पतित होने से रोकने में अपना जीवन समर्पित कर दिया है ।

विविध मान्यताओं के अनुसार संसार का सर्व प्रथम जौहर ईसा से 500 वर्ष पूर्व राजा क्रोस के समय हुआ था, जब क्रोस के ऊपर फारस के राजा कुरुष ने हमला किया ।

भारत में सबसे प्राचीन व प्रथम जौहर 327 ईसा पूर्व में सिकन्दर के आक्रमण के समय पंजाब के अगल्लसोई गणराज्य में हुआ एवम् संसार का सबसे अन्तिम जौहर इंडोनेशिया के बाली द्वीप में डचों के आक्रमण से वहा के राजा देवावांग के मारे जाने पर सम्वत 1908मे हुआ ।

उपरोक्त घटनाओं में नारियों ने सामूहिक प्राणोत्सर्ग तो किया परन्तु उनको जौहर शब्द से जोड़ना कठिन है । भारत में मुस्लिम आक्रांताओं के साथ इस स्थिति में व्यापक परिवर्तन आया ।

मोहमद बिन कासिम का सिंध पर आक्रमण 712 ई . में हुआ। राजा दाहर वीरतापूर्वक लड़ता हुआ मारा गया । उसकी पत्नी बाई ने रावर दुर्ग में जौहर किया। इसी राजा की दूसरी पत्नी लाड़ी ने ब्रह्मणाबाद दुर्ग में दूसरा प्रयास किया जो शत्रु के आ जाने के कारण सफल नहीं हो सका । इसे भारतीय इतिहास में प्रथम जौहर की संज्ञा दी जाती हैं ।

राजपुताने का प्रथम जौहर 725 ई. में गोगामेड़ी के ठाकुर की गढ़ी में सम्पन हुआ । मोहम्मद गजनवी के आक्रमण के समय 1004 ई . में भटनेर के शासक विजय राव भाटी के परिवार की स्त्रियों ने आत्मोत्सर्ग किया था । 1060 ई . में बचौरा के तंवरो ने और 1232 ई . में ग्वालियर में जौहर होने के उल्लेख मिलते हैं ।

प्रमुख जौहर : –

भारतीय इतिहास में तुर्क आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल को जौहर युग कहा जा सकता हैं । इस सुल्तान की साम्राज्यवादी विस्तार की भावना, अर्थ संग्रह की लिप्सा एवम् सुन्दर स्त्रियों को प्राप्त करने की कामेच्छा ने समस्त भारत को उद्वेलित किया, परंतु राजपुताने को इसकी सर्वाधिक कीमत चुकानी पड़ी ।

  • रणथंभोर 1301 ई.
  • सिवाना 1301 ई .
  • चित्तौड़ (पहलाशाका) 1303 ई .
  • जालौर 1311 ई.
  • जैसलमेर तिथि प्रमाणित नहीं
इसके बाद दिल्ली के सुल्तानो एवम् प्रांतीय मुगल शासकों के आक्रमणों से जौहर किए जाते रहे। जिनमें प्रमुख इस प्रकार है —
स्थानवर्षआक्रांता
1 कंपिल………मुहम्मद तुगलक
2 जैसलमेर1368 ई .फिरोज तुगलक
3 भटनेर1398 ई .तैमूरलंग
4 गांगरॉन (झालावाड़)1423 ई .गुजरात का सुल्तान
5 गांगरॉन (झालावाड़)1444 ई.मालवा का सुल्तान
6 चांपानेर (गुजरात)1484 ई.गुजरात का सुल्तान
7 चित्तौड़ का दूसरा शाका1535 ई.गुजरात का सुल्तान
8 जैसलमेर1550 ई.कांधार का अलीखान
9 चित्तौड़ का तीसरा शाका1568 ई.अकबर
10 चौरागढ़ (रानी दुर्गावती)………..सेनापति आसफ खां

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में भी रोडियागढ़ और जगदीशपुर की वीरांगनाओं ने अग्रेजों के आक्रमण के समय जौहर किया ।

धन्य है वो वीरांगनाएं जिन्होंने धर्म के इस युद्ध अपने स्वामियों को युद्ध में भेज दिया। और अपने शील और सतीत्व की रक्षार्थ अपने आपको पवित्र अग्नि में समर्पित कर दिया। अपने छोटे छोटे पुत्रों सहित अग्नि का वरण कर लिया। नमन है बारम्बार वीरांगनाओं को ।

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चेतक Chetak : महाराणा प्रताप का स्वामीभक्त घोड़ा

चेतक (Chetak) – महाराणा प्रताप का स्वामीभक्त घोड़ा अद्वितीय वीरता, बुद्धिमता एवम् स्वामीभक्ति के लिए युगों तक याद किया जाएगा। युद्ध में घायल होने पर भी अपने स्वामी हिन्दुआ सूरज महाराणा प्रताप को रणभूमि हल्दीघाटी से सुरक्षित बाहर निकालने में सफल रहा। उसने बड़े नाले (लगभग 26 फीट) पर छलांग लगाकर जैसे ही पार किया गम्भीर रूप से घायल हो गया और वीरगति को प्राप्त हुआ। आज भी उस स्थान पर चेतक (Chetak) का स्मारक (समाधि) बना हुआ है।

चेतक (Chetak) :

चेतक ((Chetak) महाराणा प्रताप का स्वामीभक्त घोड़ा था। इसके बारे में ख्यातो में कहा गया है कि एक घोड़े का व्यापारी काठियावाड़ क्षैत्र (वर्तमान गुजरात) से काठियावाड़ी नस्ल के घोड़े लेकर मेवाड़ में आया। महाराणा प्रताप ने उनमें से तीन घोड़ों चेतक , त्राटक और अटक का चयन किया।

महाराणा प्रताप ने तीनों घोड़ों के युद्ध कोशल, दौड़ आदि का परीक्षण किया, जिनमें से अटक परीक्षण के दौरान काम ( मृत्यु) आ गया। चेतक को महाराणा प्रताप ने अपने लिए रखा। त्राटक अपने छोटे भाई महाराज शक्ति सिंह जी को दे दिया।

चेतक नीले रंग का था। यहाँ नीले रंग का अर्थ Blue से नहीं है । मेवाड़ी भाषा में नीले रंग को – श्वेत रंग लिए हल्का घुसर रंग को कहते हैं। चेतक अपने आप में अद्वितीय घोड़ा था जो महाराणा प्रताप के साथ साथ उनके जिरह बख्तर, भाला, तलवारे एवम् अन्य अस्त्र शस्त्रों सहित वजन को लेकर युद्धों में सफलतापूर्वक कार्य करता था।

विकिपीडिया के अनुसार – इन घोड़ों के बदलें महाराणा प्रताप ने व्यापारी को जागीर में गढ़वाड़ा और भानोल नामक दो गांव दिए।

चेतक घोड़े के नाम से ही भारतीय वायुसेना के हेलीकॉप्टर एच एल चेतक रखा गया है।

चेतक (Chetak) और हल्दीघाटी का युद्ध :

हल्दीघाटी हाल के रचयिता प्रो. देवकर्ण सिंह जी रूपाहेली लिखते हैं –

आवध अर पाखर मंड्या , गज अस करी धुमाल ।

जंह अनबोल्या रण चढ्या , हल्दीघाटी हाल। ।।

इस जगविख्यात युद्ध के लिए प्रताप की फौज में इस धरती का जन जन ही सज धज कर नहीं गया बल्कि सेना के मूक हाथी घोड़े भी शस्त्रों सहित जिरह बख्तर धारण किए अपने अपने मालिको के साथ चढ़ाई में शरीक हुए और करिश्माई लड़ाई लड़ कर इतिहास में गौरव मंडित है ।

(In this world – famed battle, the participation of diverse people equipped with various weapons is undoubtedly important. Nonetheless, it needs to be noticed amply that a significant number of dumb war – animals also played their part admirably. The names of the horse Chetak and the elephants Ramprasad and Luna in the army of the Maharana are worthy of particular mention .)

दुनिया में युद्ध तो अनेक हुए किन्तु जाति, धर्म, वर्ग ओर वर्ण की भावनाओ से परे जहा अनगिनत राष्ट्रभक्तो योद्धाओं ने शत्रु से लोहा लिया ऐसी शौर्य धरा हल्दीघाटी इकलौती ही है ।

हल्दीघाटी युद्ध :

विक्रम संवत् १६३३ द्वितीय ज्येष्ठ तदानुसार 18 जून 1576 को हल्दीघाटी युद्ध हुआ था। हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप का सारथी चेतक जिरह बख्तर से युक्त था। चेतक को उसके मस्तक पर हाथी की सूंड का कवच पहनाया गया था।

चेतक घोड़े ने भी युद्ध में अपना रण कौशल दिखाया। वो अपने स्वामी प्रताप के इशारों पर एक बार तो मुगल सेनापति के हाथी के मस्तक पर चढ़ गया और प्रताप ने जैसे ही भाले का वार किया। हाथी का महावत मारा गया और मानसिंह हाथी के होदे में छुप गया।

चेतक बहलौल खा के पास पहुंचा महाराणा प्रताप ने एक ही वार मे उसको घोड़े सहित काट दिया। शत्रु सेना में हाहाकार मच गया और वो पीछे हटने लगी।

हमे आज दिन तक यही पढ़ाया गया की युद्ध में शत्रु सेना जीती। लेकिन सत्य ये है कि हल्दीघाटी मे राष्ट्रीय सेना जीती। क्योंकि युद्ध के बाद अकबर ने मानसिंह का दीवाने खास में आना बन्द करवा दिया था।

चेतक की वीरगति :

चेतक शत्रु सेना के हाथी के ऊपर छलांग लगाते समय हाथी के सूंड में लगी तलवार से जख्मी हो गया था। महाराणा प्रताप को भी कई घाव लगे थे । चेतक अपने स्वामी को युद्ध क्षैत्र से बाहर निकालने में सफल रहा और जैसे ही एक बरसाती बड़े नाले को पार करने के लिए छलांग लगाई। और नाला पार किया लेकिन चेतक गंभीर घायल हो गया। गम्भीर घायल चेतक का सिर प्रताप अपने गोद में लेकर बैठे और अन्ततः चेतक वीरगति को प्राप्त हो गया । अपने जीवन में पहली बार प्रताप की आंखों में आसूं थे।

चेतक का स्मारक (समाधि) :

चेतक की वीरगति होने के बाद दोनो भाई महाराणा प्रताप और छोटे भाई शक्ति सिंह जी ने चेतक का दाह संस्कार किया । उस स्थान पर स्मारक बना हुआ है। उसके सार संभाल एवम् पूजा करने के लिए महाराणा ने बहुत भूमि दी। जो अब तक पुजारियों के अधिकार में है।

विश्व में एक मात्र मेवाड़ धरा जहां घोड़े की भी पूजा होती हैं । धन्य है मेवाड़ धरा। धन्य है राष्ट्रीय चेतक घोड़ा । जिसने राष्ट्रभक्त की तरह विश्व – पटल पर अपना नाम अंकित करा गया। नमन है चेतक की राष्ट्रभक्ति को । नमन है उसकी स्वामीभक्ति को ।

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वीरांगना किरण देवी : प्राणों की भीख मांगता अकबर।

भारतीय इतिहास में अनगिनत वीरांगनाओं ने अपने शौर्य, पराक्रम और सतीत्व की रक्षा के लिए अमर बलिदान दिए हैं। हमारी संस्कृति में “यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता:” की परंपरा सदियों से रही है। ऐसी ही एक असाधारण वीरांगना थीं राजकुमारी किरण देवी, जिनकी वीरता और साहस के आगे तथाकथित ‘महान’ मुगल अकबर को अपने प्राणों की भीख मांगनी पड़ी और अपने कुकृत्यों के लिए क्षमा याचना करनी पड़ी।

वीरांगना किरण देवी : परिचय एवं पारिवारिक पृष्ठभूमि

मेवाड़ राजवंश की राजकुमारी

वीरांगना किरण देवी 16वीं शताब्दी में मेवाड़ के शासक महाराणा उदयसिंह द्वितीय के पुत्र राजकुंवर शक्ति सिंह की सुपुत्री थीं। वह हिन्दुआ सूरज महाराणा प्रताप की भतीजी थीं। किरण देवी का जन्म मेवाड़ के सिसोदिया वंश में हुआ था, जो अपनी वीरता, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के लिए प्रसिद्ध था।

पारिवारिक विवरण:

  • पिता: राजकुंवर शक्ति सिंह (महाराणा उदयसिंह द्वितीय के द्वितीय पुत्र, रानी साज्जा बाई सोलंकी से जन्मे)
  • बड़े पिता : महाराणा प्रताप (महान् मेवाड़ शासक, जो अकबर के समक्ष कभी झुके नहीं)
  • पति: कुंवर पृथ्वीराज राठौड़ (बीकानेर नरेश राव कल्याणमल के पुत्र, महाराज रायसिंह के छोटे भाई)

महाराज शक्ति सिंह जी : महाराणा प्रताप के वीर भ्राता

शक्ति सिंह महाराणा प्रताप से मात्र कुछ माह छोटे थे। हल्दीघाटी युद्ध (1576 ई.) में निर्णायक क्षण में वे अपने बड़े भाई महाराणा प्रताप को बचाने आए और दो मुगल सैनिकों को मार गिराया। इसके पश्चात् वे पुनः मेवाड़ लौट आए। शक्तावत राजपूतों की उत्पत्ति इन्हीं से है।

पृथ्वीराज राठौड़ : प्रसिद्ध कवि और वीर योद्धा

किरण देवी का विवाह बीकानेर के प्रसिद्ध कवि-योद्धा पृथ्वीराज राठौड़ से हुआ था। पृथ्वीराज (1549-1600 ई.) न केवल वीर योद्धा थे बल्कि डिंगल भाषा के महान कवि भी थे। उन्होंने “वेलि कृष्ण रुकमणी री”, “दशम भागवत रा दूहा” जैसी उत्कृष्ट रचनाएं कीं।

प्रसिद्ध घटना: जब महाराणा प्रताप कठिन परिस्थितियों में निराश हो गए थे और अकबर से संधि करने का विचार कर रहे थे, तब पृथ्वीराज राठौड़ ने उन्हें एक ओजस्वी पत्र भेजा जिसमें लिखा था:

“पातळ सूं पातशाह, बोले मुख हुंता।
सो किण बिध राणा, सिरै चढै न कुंता।”

इस पत्र ने महाराणा प्रताप के मन में पुनः राजपूती स्वाभिमान जगा दिया और उन्होंने कभी अकबर के समक्ष समर्पण नहीं किया।

वीरांगना किरण देवी की शिक्षा और युद्ध प्रशिक्षण

16वीं शताब्दी में राजपूत महिलाओं की शिक्षा

मेवाड़ और अन्य राजपूत राज्यों में राजघरानों की कन्याओं को उच्च शिक्षा दी जाती थी। उन्हें न केवल साहित्य, संगीत, कला में प्रशिक्षित किया जाता था, बल्कि अस्त्र-शस्त्र विद्या और युद्ध कौशल में भी निपुण बनाया जाता था।

प्रशिक्षण में शामिल कौशल:

  • तलवार, कटार, भाला, धनुष-बाण का संचालन
  • घुड़सवारी और रणनीति
  • आत्मरक्षा तकनीकें
  • युद्ध में निर्णय लेने की क्षमता

किरण देवी भी इसी परंपरा में अस्त्र-शस्त्र और युद्ध कौशल में पूर्णतः निपुण थीं। वह साहसी, निडर और स्वाभिमानी राजपूत महिला थीं जो अपने सतीत्व और मर्यादा की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकती थीं।

अकबर और नौरोज मेला (मीना बाजार) : एक काला अध्याय

मीना बाजार का वास्तविक स्वरूप

इतिहासकारों ने अकबर को ‘महान’ बताया है, परंतु नौरोज मेले (मीना बाजार) की घटनाएं उसकी विकृत मानसिकता को उजागर करती हैं। यह मेला वर्ष में नवरोज़ (फारसी नववर्ष) के अवसर पर 5-8 दिनों तक आयोजित होता था।

मीना बाजार की विशेषताएं:

  • यह बाजार केवल महिलाओं के लिए था, पुरुषों का प्रवेश वर्जित था
  • अकबर और कुछ राजकुमार ही इसमें प्रवेश कर सकते थे
  • अकबर स्वयं महिला वेश (बुर्के) में घूमता था
  • यह दिल्ली के आगरा किले में आयोजित होता था
  • मुगल हरम की महिलाएं और अभिजात्य वर्ग की महिलाएं कपड़े, आभूषण और हस्तशिल्प बेचती थीं

अकबर के हरम का विवरण

ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, अकबर के हरम में 300 से अधिक पत्नियां थीं और कुल मिलाकर 5000 महिलाएं (दासियां, नर्तकियां, सेविकाएं) रहती थीं। इतालवी यात्री निकोलाओ मानूची ने अपने विवरण में लिखा है कि नौरोज मेले का उपयोग अकबर सुंदर हिंदू लड़कियों को अपने हरम में लाने के लिए करता था।

छल और दुराचार की योजना

मेले में जो भी महिला अकबर को पसंद आती, वह अपनी दासियों को निर्देश देता कि छल-कपट से उस महिला को हरम में लाया जाए। कई बार महिलाओं को सम्मान दिखाने या उपहार देने के बहाने अकबर के समक्ष लाया जाता था।

वीरांगना किरण देवी और अकबर : ऐतिहासिक घटना

मेले में किरण देवी का आगमन

एक दिन महाराणा प्रताप की भतीजी, महाराज शक्ति सिंह की पुत्री बाईसा किरण देवी भी अपनी सहेलियों के साथ नौरोज मेला देखने गई। वह उस समय बीकानेर के कुंवर पृथ्वीराज राठौड़ की पत्नी थीं। किरण देवी अत्यंत रूपवती और तेजस्वी थीं।

अकबर की कुदृष्टि

जब अकबर ने किरण देवी को देखा, तो वह उनके सौंदर्य पर मोहित हो गया। उसने तुरंत अपनी दासियों को आदेश दिया कि किसी भी प्रकार उस महिला को हरम में लाया जाए। दासियों ने छल-कपट से किरण देवी से कहा कि बादशाह उन्हें सम्मानित करना चाहते हैं और उपहार देना चाहते हैं।

निश्छल किरण देवी, जो राजपूत मर्यादाओं में पली-बढ़ी थीं, दासियों के साथ अकबर के हरम में चली गईं। उन्हें अकबर के नापाक इरादों का कोई आभास नहीं था।

सिंहनी का प्रहार

जैसे ही अकबर ने अपने दुराचारपूर्ण इरादों से किरण देवी को छूने का प्रयास किया, वीरांगना किरण देवी क्षण भर में समझ गईं कि यह एक षड्यंत्र है

राजपूत सिंहनी ने तत्काल प्रतिक्रिया दी। उन्होंने एक सिंहनी की भांति झपटकर अकबर की छाती पर चढ़ बैठीं और अपनी कमर से कटार निकालकर उसकी गर्दन पर रख दी।

ऐतिहासिक वर्णन

इस घटना का वर्णन कवि गिरधर आसिया द्वारा रचित “सगत रासो” ग्रंथ में पृष्ठ संख्या 632 पर इस प्रकार किया गया है:

“सिंहनी सी झपट, दपट चढ़ी छाती पर,
मानो षठ दानव पर, दुर्गा तेज धारी हैं।”

एक अन्य दोहा:

“किरण सिंहणी सी चढ़ी, उर पर खींच कटार।
भीख मांगता प्राण की, अकबर हाथ पसार॥”

अकबर की याचना

जब किरण देवी ने अपनी तीक्ष्ण कटार अकबर के गले पर रखी और वार करने को तैयार हुईं, तब अकबर भयभीत होकर उनके चरणों में गिर गया और प्राणों की भीख मांगने लगा।

किरण देवी ने क्रोध में कहा:

“दुराचारी! नीच! नराधम! मैं महाराणा प्रताप की भतीजी हूं। जिनके नाम से तुझे नींद नहीं आती। मैं मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश की राजकुमारी हूं और बीकानेर के पृथ्वीराज राठौड़ की पत्नी हूं। तेरी यह धृष्टता तुझे आज प्राणों से हाथ धोना सिखाएगी!”

अकबर का वचन

प्राणों की रक्षा के लिए अकबर ने कुरान की कसम खाकर किरण देवी से वचन दिया:

  1. आज के बाद कभी नौरोज का मेला (मीना बाजार) आयोजित नहीं होगा
  2. किसी भी महिला के साथ दुराचार या छल-कपट नहीं किया जाएगा
  3. जहां बीकानेर के महाराज पृथ्वीराज का निवास है, उस मार्ग से जीवनपर्यंत नहीं गुजरेगा

वीरांगना किरण देवी ने अपनी ठोकरों से अकबर को अधमरा कर दिया और उसे जीवन भर के लिए सबक सिखा दिया।

घटना के पश्चात्

अकबर की लज्जा

इस घटना के बाद अकबर कई दिनों तक अपने महल से बाहर नहीं निकला। उसे भारी लज्जा और अपमान का सामना करना पड़ा।

ऐतिहासिक तथ्य: इस घटना के पश्चात् वास्तव में अकबर ने नौरोज मेले (मीना बाजार) का आयोजन बंद कर दिया, जो उसकी पराजय और वीरांगना किरण देवी के साहस का प्रमाण है।

बीकानेर संग्रहालय में प्रमाण

बीकानेर संग्रहालय में एक प्रामाणिक पेंटिंग लगी है जिसमें यह ऐतिहासिक घटना दर्शाई गई है। पेंटिंग में किरण देवी को अकबर की छाती पर कटार रखते हुए दिखाया गया है, और नीचे उपरोक्त दोहा अंकित है।

यह पेंटिंग राजस्थान के इतिहास में वीरांगना किरण देवी के अद्वितीय शौर्य का ठोस प्रमाण है।

ऐतिहासिक स्रोत और प्रमाण

साहित्यिक स्रोत

  1. “सगत रासो” – कवि गिरधर आसिया द्वारा रचित (1755 ई. के बाद)
    • यह ग्रंथ डिंगल भाषा में रचित है
    • इसमें शक्ति सिंह और उनके शक्तावत वंश का विस्तृत वर्णन है
    • पृष्ठ 632 पर किरण देवी की घटना का विस्तृत वर्णन
  2. बीकानेर के राजवंश के अभिलेख
  3. मेवाड़ के सिसोदिया वंश के ऐतिहासिक दस्तावेज
  4. इतालवी यात्री निकोलाओ मानूची का विवरण – मुगल दरबार और नौरोज मेले का वर्णन

भौतिक प्रमाण

  1. बीकानेर संग्रहालय में पेंटिंग – घटना का चित्रण
  2. मेवाड़ और बीकानेर के शाही अभिलेखागार में संबंधित दस्तावेज

वीरांगना किरण देवी का महत्व

नारी सशक्तिकरण का प्रतीक

वीरांगना किरण देवी 16वीं शताब्दी में नारी सशक्तिकरण की जीवंत मिसाल थीं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि:

  1. राजपूत महिलाएं केवल सुंदरता की प्रतिमूर्ति नहीं, बल्कि वीरता और साहस की धनी थीं
  2. स्वाभिमान और मर्यादा की रक्षा के लिए वे किसी भी शक्तिशाली से टकराने को तैयार थीं
  3. अस्त्र-शस्त्र विद्या में प्रशिक्षित होना महिलाओं के लिए अत्यंत आवश्यक था

मेवाड़ और मारवाड़ का गौरव

किरण देवी ने अपनी वीरता से दोनों राजवंशों – मेवाड़ (सिसोदिया) और मारवाड़ (राठौड़) का नाम इतिहास में अमर कर दिया।

अकबर की वास्तविकता

यह घटना अकबर के तथाकथित ‘महानता’ पर प्रश्नचिह्न लगाती है और उसके वास्तविक चरित्र को उजागर करती है। इतिहासकारों ने जिसे ‘अकबर महान’ बताया, वह वास्तव में:

  • महिलाओं के प्रति सम्मान की कमी रखता था
  • छल-कपट से निर्दोष महिलाओं को हरम में लाता था
  • अपनी शक्ति का दुरुपयोग करता था

संदर्भ ग्रंथ और स्रोत

  1. गिरधर आसिया – “सगत रासो”, पृष्ठ 632 (डिंगल भाषा)
  2. महिला उत्थान मंडल – “अथाह शौर्य की धनी: किरण देवी”
  3. बीकानेर संग्रहालय – ऐतिहासिक पेंटिंग और दस्तावेज
  4. Times Now News – Meet Kiran Devi Rathore, The Queen Who Made Akbar Beg For Mercy (March 25, 2025)
  5. My India My Glory – Akbar a Philanderer? How He Begged Kiran Devi Rathore for His Life (August 31, 2019)
  6. Wikipedia – Meena Bazaar
  7. Wikipedia – Shakti Singh (16th century Indian noble)
  8. En Route Indian History – “Meena Bazaar: The Market for the Women of Zenana” (October 23, 2022)
  9. Scroll.in – “The making of Akbar’s complicated harem, where Rajput women played a critical role” (April 29, 2020)
  10. हिंदवी – पृथ्वीराज राठौड़ का जीवन परिचय
  11. भारतकोश – “पृथ्वीराज द्वारा राणा प्रताप का स्वाभिमान जाग्रत करना”

निष्कर्ष

वीरांगना किरण देवी प्रतीक है सम्पूर्ण मातृ शक्ति की , शौर्य की , पराक्रम की । हमारे यहां ” यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवता: “की संस्कृति रही हैं। हमारी पावन संस्कृति में अनगिनत वीरांगनाओं ने अपने सतीत्व की रक्षार्थ जौहर किए हैं। ऐसी ही वीरांगना किरण देवी जिनकी वीरता और पराक्रम के कारण अकबर को अपने प्राणों की भीख मांगनी पड़ी।

वीरांगना किरण देवी ने अपनी वीरता और क्षत्रियत्व से मेवाड़ और मारवाड़ (बीकानेर) दोनों का इतिहास में नाम अमर कर दिया ।

वीरांगना किरण देवी का जीवन संपूर्ण मातृशक्ति, शौर्य और पराक्रम का प्रतीक है। उन्होंने अकबर जैसे शक्तिशाली सम्राट को अपने साहस और निर्भयता से नतमस्तक कर दिया।

मुख्य संदेश:

  • नारी शक्ति किसी भी परिस्थिति में अपराजेय है
  • स्वाभिमान और मर्यादा सर्वोपरि हैं

वीरांगना किरण देवी की गाथा आज भी मेवाड़ी और राजस्थानी जनमानस के मुख पर जीवित है और प्रत्येक भारतीय नारी के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगा।

इतिहास में अनेक ऐसी घटनाओं का वर्णन ही नहीं किया गया , क्योंकि इन तुर्क आक्रांताओं को महान बताना था। आजादी के बाद भी तुष्टिकरण की नीति के कारण हमें यहीं बताया गया। क्षत्रिय संस्कृति (kshatriyasanskriti) के माध्यम से मै आपको प्रामाणिक और सत्य घटना बताऊँगा। आपके सुझाव हमे भेजे। आपके सुझाव हमारा मार्गदर्शन करेंगे।

खास आपके लिए –

विजय स्तम्भ – महमूद खिलजी पर विजय की याद में बनाया

विजयस्तम्भ चित्तौड़गढ़ :

चित्तौड़गढ़ के बारे में कहा गया है कि गढ़ तो गढ़ चित्तौड़गढ़ बाकी सब गढ़ैया ”

कभी काबुल और कंधार तक फैला, मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़गढ़ जिसका कण कण भक्ति, शक्ति और शौर्य कि गाथा अपने मे समेटे हुए, अनगिनत युद्ध, अनगिनत योद्धाओं का बलिदान तो मीरा बाई की भक्ति हजारों वीरांगनाओं के जौहर और शाकाओ का साक्षी रहा चित्तौड़गढ़ ।

चित्तौरगढ़ दुर्ग का कण कण आज भी हमे क्षत्रिय संस्कृति और सनातन धर्म की याद दिलाता है।

विजय स्तम्भ का निर्माण महाराणा कुम्भा ने मालवा के सुल्तान महमूद शाह खिलजी और उसकी सेना को सारंगपुर युद्ध में परास्त कर अपनी ऐतिहासिक विजय की याद में निर्माण करवाया। महाराणा कुम्भा हमेशा अजेय रहे हैं। उन्होंने गुजरात और मालवा के तुर्क आक्रांताओं को न केवल परास्त किया बल्कि उनको कैद में भी रखा।

विजय स्तम्भ का निर्माण सन् 1440 से 1448 के मध्य करवाया। और इसकी प्रतिष्ठा विक्रम संवत १५०५ माघ सुदी दश्मी को हुई । महाराणा कुम्भा ने अपने आराध्य देव भगवान श्री विष्णु के निमित्त और समर्पित किया है। इसे विष्णु स्तम्भ भी कहा जाता हैं।

विजय स्तम्भ 47 फीट के 10 फीट ऊंचे आधार पर बना 122 फीट ऊंचा नौ मंजिला यह स्तम्भ भारतीय वास्तु कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। विजय स्तम्भ आधार पर 30 फीट चौड़ा तथा ऊपर तक पहुंचने के लिए 157 सीढियां है। सीढ़ियों का क्रम गोलाकार है। इसके निर्माण में सात वर्ष लगे और 90 लाख रूपए निर्माण व्यय आया था ।

इसके मुख्य शिल्पकार सूत्रधार राव जेईता थे। और उनके सहयोगी तीनो पुत्र नापा , पूंजा और पोमा थे। विजय स्तम्भ की पांचवी मंजिल पर इनके नाम अंकित है ।

भारतीय स्थापत्य गौरव – विजयस्तम्भ :

कला की दृष्टि से कर्नल जेम्स टॉड ने इसे कुतुबमीनार से भी श्रेष्ठ माना हैं। उत्तरी भारत में कुतुबमीनार के पश्चात् लम्बाई में इसी का स्थान आता है ।

इसमें भगवान विष्णु के अवतारों और ब्रह्मा, विष्णु , और महेश तथा अनेक देवी देवताओ , रामायण और महाभारत के पात्रों की सैकड़ों मूर्तियां खुदी हुई हैं। वास्तव में यह सनातन धर्म और हिन्दुओं के पौराणिक देवताओं का अमूल्य धरोहर हैं।

विजयस्तम्भ के बाहरी एवम् अन्दर देवी, देवताओं अर्ध नरीश्वर, उमा महेश्वर, लक्ष्मीनारायण, सावित्री, हरिहर और विष्णु जी के विभिन्न अवतारों की मूर्तियां उत्कीर्ण है । इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रत्येक मूर्ति के नीचे नाम अंकित है।

विजयस्तम्भ देश का स्थापत्य गौरव है। देश की भौगोलिक विचित्रता को अनेकानेक प्रकार से उत्कीर्ण किया है । इसे भारतीय मूर्तिकला का विश्वकोष कहा जाता हैं ।

सन् 1949 को विजयस्तम्भ पर भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया है । इसकी आठवी मंजिल पर विजयस्तम्भ प्रशस्ति का लेखन किया गया है। इसके रचयिता और लेखक अत्रि और महेश भट्ट है । सबसे ऊपरी नवीं मंजिल पर स्थित शिलालेख में चित्तौड़गढ़ के महाराणा हम्मीर से लेकर कुम्भा तक वंशावली उत्कीर्ण है।

सन् 1852 में बिजली गिरने से नौवीं मंजिल क्षतिग्रस्त हो गई थी। जिसे महाराणा स्वरूप सिंह जी ने बनवाया था । एवम् महाराणा भूपाल सिंह जी ने इसका जीर्णोद्धार कराया।

विजयस्तम्भ राजस्थान पुलिस एवम् माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान का प्रतीक चिन्ह भी है ।

महाराणा कुम्भा को मेवाड़ और चित्तौरगढ़ का आधुनिक निर्माता भी कहते हैं। महाराणा कुम्भा का इतिहास केवल युद्धों में विजय तक सीमित नहीं था। बल्कि उनकी शक्ति और संगठन क्षमता के साथ साथ उनकी रचनात्मकता भी आश्चर्यजनक थी। संगीतराज उनकी महान रचना है। जिसे साहित्य का कीर्ति स्तम्भ माना जाता हैं।

महाराणा कुम्भा को प्रजा नरपति , गजपति , हिन्दू सूरतान , वराह , परम भागवत आदि अनेक नामों से सम्बोधित करती थी ।

विजयस्तम्भ सैकडो वर्षो से आज भी विजय की याद दिलाता हैं और क्षत्रिय और सनातन धर्म की गौरव गाथा और कर्तव्य की याद दिलाता रहेगा ।

आपको यह जानकारी कैसी लगी, आपके सुझाव हमारा मार्गदर्शन करेंगे । धन्यवाद । जय श्री राम ।