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    Homeक्षत्रिय धर्मकुलदेवियाँमाँ बाला सती माता साक्षात् देवी रूप !

    माँ बाला सती माता साक्षात् देवी रूप !

    राजस्थान की भूमि सन्त सती और सूरमा की भूमि रहीं हैं। मां बाला सती जी ने साधना की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए परम तत्व से साक्षात्कार कर लिया था। वह अणु से विराट बन गई। ईश्वर के सामिप्य ने बाला सती जी को ब्रह्म से साक्षात्कार करा दिया था।

    योगश्चितवृति निरोध कलिकाल में बाला सती जी एक ऐसी योगिनी थी जिनने योगाभ्यास से ब्रह्मा – आभ्यांतर परिणामों को त्याग अपने स्वरूप में स्थित हो गई, वह एक सच्ची त्याग मूर्ती एवं लोक सेविका योगिनी थी।

    मां के दर्शन मात्र से ही शंका का समाधान एवं संशय का निवारण स्वत: ही हो जाता। भारत की अध्यात्मिक श्रेष्ठता का अनुपम उदाहरण था मां का महान् व्यक्तित्व।

    सती मां विराट व्यक्तित्व की स्वामिनी थी। मां का तेज पुंज शरीर के दर्शन मात्र से भक्तो को एक प्रकार का विचित्र चुंबकीय आकर्षण और असीम शांति का अनुभव होता था।

    सती मां के हथेली में शंख, चक्र, पद्म, त्रिशूल, शिवलिंग और स्वास्तिक स्पष्ट दृष्टिगोचर होते थे। पद ताल में सुदीर्घ उर्ध्व रेखा विद्यमान थी। उंगलियों और अंगूठों पर चक्र सुशोभित हो रहें थे। हथेली में भाग्य रेखा उत्तर से दक्षिण तक गहरी छाई हुई थी। और सूर्य रेखा भी अलग से देदीप्यमान हो रही थी।

    योग और भक्ति का सामंजस्य था सती मां का व्यक्तित्व। योग साधना ने जहां आपकों अलौकिक शक्ति सामर्थ्य से सुसज्जित किया, वहीं भक्ति भाव के ओदार्य से आपकों अलंकृत किया।

    मां में मीरा सी तन्मयता, सूर – तुलसी – कबीर सी आराधना, ज्ञानेश्वर चैतन्य सी भक्ति, नरसी, द्रौपदी का विश्वास और रसखान सा आत्मबल दृष्टिगोचर होता था।

    बाला सती जी का जन्म

    राजस्थान के जोधपुर जिले की बिलाड़ा तहसील में पीपाड़ शहर से 11 किमी . दूर एक छोटा सा गांव है रावणियाना जो वर्तमान में रूपनगर है। इसी गांव में क्षत्रिय वंश के शेखावत लाडखानी गौत्र के श्री लालसिंह जी की धर्मपत्नी श्री मति जड़ावकुंवर की कोख से पुण्यपर्व की पुण्य वेला में भाद्रपद कृष्ण जन्माष्टमी, सोमवार के दिन संवत् 1960 तदानुसार दिनांक 16 अगस्त, 1903 रात्रि बारह बजकर एक मिनट पर रोहिणी नक्षत्र में परम पूजनीया प्रातः स्मरणीया बाला सती जी का शुभ जन्म हुआ।

    मां बाला सती जी ने इस शुभ घड़ी में अवतार लिया। उच्च ग्रहों के शुभ लग्न में माता जड़ावकुंवर ने देदीप्यमान तेज से परिपूर्ण महाभाग्यशाली पुण्यवती कन्या को जन्म दिया।

    भगवान श्री कृष्ण के पुनीत जन्म की पावनघड़ी में मां का जन्म हुआ। जन्म नक्षत्रों के आधार पर ज्योतिषियों ने इस कन्या की जो जन्म कुण्डली बनाई वह महापुरुषों की कुण्डली के अनुरूप ही थी। राशि वृषभ, नक्षत्र रोहिणी और दशा चन्द्र । यह संयोग जातक के अद्वितीय व्यक्तित्व और महान गुणों का दिग्दर्शन कराती है।

    बाला सती जी का बाल्यकाल्य

    बालिका रूपकुंवर ने डेढ़ – दो वर्ष की उम्र में ही बोलना शुरू कर दिया और पांच से छः वर्ष की आयु में ही बालिका रूपकुंवर घंटों समाधि जैसी अवस्था में लीन रहने की अभ्यस्त हो गई। वय के साथ साथ आध्यात्मिक रंग और गहराता जा रहा था।

    ऐसा प्रतीत होता था कि बालिका रूपकुंवर ने जैसे ही काम , क्रोध , लोभ , मोह , राग , द्वेष , अहंकार और माया से विरक्ति पा ली हो। ईश्वर की प्राप्ति ही जैसे मां बाला सती जी का एक मात्र लक्ष्य रह गया हो। और रोम रोम में राम समा गए हो।

    बालिका रूपकुंवर को बचपन से ही जागरण एक आदत पड़ गई। सेवा – वृति के संस्कार भी बचपन से ही मां में अंकुरित हो गए। मां – बाप की सेवा, गुरू सेवा, गाय सेवा, ब्राह्मण, संत एवं अतिथि की सेवा और इसके अलावा दीन, दुःखी व प्राणी मात्र की सेवा आदि मां बाला सती जी का समस्त जीवन ही सेवामय था।

    मां बाला सती जी विद्याध्ययन करने किसी स्कूल या विद्यालय नहीं गई। भक्ति संस्कार तो मां के जन्म से साथ थे । राम और ओम का महामंत्र एवं ज्ञान संतो से मिला। इस तरह मां बाला सती जी सर्वोच्च शिखर पर पहुंच गई। आत्मा का परमात्मा से मिलन हो गया। मां बाला सती जी का कहना था कि कलियुग में सच्ची सेवा और लगन से भगवान जल्दी प्रसन्न होते हैं।

    एक समय जब हास्य – विनोद में भाभोसा के मुंह से ब्याह सम्बन्धी बोल निकले तो बालिका रूपकुंवर ने अपने मन की बात उनसे कह डाली। बालिका रूपकुंवर ने साफ शब्दों में आंख में आंसू भर कर कहा, चाहें कुछ भी हो, मैं इस प्रपंच में कभी नहीं पडूंगी।

    मैने तो आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत ले रखा है। बाला सती जी को बचपन में ही सन्त गुलाबदास जी महाराज के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। बाला सतीजी ने सदैव सहर्ष उन्हें अपना गुरु स्वीकार किया।

    बाला सती जी की सगाई और विवाह

    बाला गांव में जोधा (राठौड़) राजपूतों का एक रावला है। इस जोधा परिवार में श्री चिमनसिंह जी के तीन पुत्र हुए श्री जालिमसिंह जी, श्री इंद्रसिंह जी और श्री झुंझारसिंह जी। झुंझारसिंह जी की सगाई सायर कुंवर (सुगन) पुत्री श्री लालसिंह जी के साथ हुई थी।

    सायर कुंवर के निधन पर दादीजी के आग्रह पर बाई रूप कुंवर की सगाई श्री झुंझारसिंह जी से कर दी गई। झुंझार सिंह जी प्रथम विश्व युद्ध में भाग में भाग लेकर छुट्टी पर अपने गांव आए ही थे। वे सेना में कार्यरत थे।

    रुपकुंवर को सोलह वा वर्ष चल रहा था। इनकी देह स्वर्णमय थी। सगाई का नाम सुनते ही सती मां उदासीन हो गई और बार बार अपने सांवरिया को याद करती और रो रो कर उनसे विनती करती कि अब तो लाज आपके हाथ है।

    विवाह की तिथि नजदीक आती जा रही थी। रूपकुंवर ने अपने हाथ में कोई मेहंदी नहीं रचाई, रो रो कर आंखे सूज गई। परिवार को तो बाई के हाथ पीले करने थे।

    वैशाख शुक्ला एकादशी संवत् 1976 , तदानुसार दिनांक 10 मई 1919 को बारात आ ही गई। बाला सती जी के जीवन में एकादशी एवं पुर्णिमा तिथि का काफी महत्त्व रहा है। सती मां के जीवन की कई महत्वपूर्ण घटनाएं एकादशी को ही घटी। निश्चित तिथि को रूपकुंवर को दुल्हन रूप में सजाया गया और चंवरी में बैठा दिया गया।

    बाला सती जी का दुल्हन रूप अत्यन्त ही आकर्षण लिए था। लाल चुन्दरी में मां साक्षात् भगवती रूप लग रही थी। पंडित जी ने यथा सम्भव हथलेवा जुडाया कि यकायक श्री झुंझारसिंह जी को आघात सा लगा। हथलेवे की मेहंदी का स्पर्श होते ही वह सांसारिक जीवन सती के अपूर्व तेज को सहन न कर सकें।

    चंवरी में ही अकस्ममात तेज बुखार ने आ जकड़ा व हाथों की मेहंदी छूट गई। इस तरह वो निर्जीव सी देहो का वैवाहिक कार्यक्रम निपटाया गया।

    पति का महाप्रयाण

    बाला सती जी अपने ससुराल आ गई पर दुल्हे राजा का बुखार बढ़ता जा रहा था। दुल्हन का तो अभी शादी का वेश भी देह से उतरा नहीं था कि पति मृत्यु शैय्या पर अंतिम सांसे ले रहे थे। बड़े बूढ़ों के आग्रह पर दुल्हन रूपकुंवर को पानी का गिलास देकर अपने सांसारिक पति के पास उनका मुंह देखने और बात करने को जबरन भेजा गया।

    दुल्हन बाला सती जी ने कमरे में कदम रखा ही था कि झुझार सिंह जी ने हाथ जोड़कर क्षमा याचना की और कहा कि अपने रास्ते पर चलते रहो और बताया कि उन्होंने रूपकुंवर को साक्षात भवानी के रुप में देखा जिनके चारो और अग्नि थी उन्होंने दिव्यज्योति को अपने पास आने से रोका।

    बाला सती जी ने सांसारिक पति को दूर से ही नमस्कार किया और पानी से भरे गिलास सहित वापस चली आई। सती मां का पति से यहीं प्रथम और अंतिम मिलन था।

    जयेष्ठ माह की एकादशी, सूर्यवार, विक्रम संवत् 1978 तदानुसार दिनांक 25 मई 1919 को भरी दुपहरी में रूपकुंवर का सुहाग सूर्य सदा सदा के लिए अस्त हो गया परन्तु विवाह और वैधव्य दोनों ही अवस्थाओं में हर्ष – विषाद से निर्विकार रह सदैव की भांति भगवान के भजन में लीन रही।

    साधना के सोपान पर

    साधक में सांसारिक प्रपंच बाधक होते हैं। मन की एकाग्रता भंग करते हैं। दैव योग से सती मां रूपकुंवर को साधना का सुअवसर सुलभ हो गया। पति की मृत्यु के पश्चात बाला सती जी ने एक समय भोजन करना प्रारंभ कर दिया। इस प्रकार समय के साथ साथ मां की साधना उच्चतम शिखर पर बढ़ती गई।

    सतीत्व का ज्वर

    सतियाँ तो परम्परा से होती आई है, मैं कोई नया काम नहीं कर रहीं हूं। आपकों को तो खुश होना चाहिए कि आपके घर से कोई सती हो रही है। सती मां ने निर्भीकता से कहा।

    बाला सती जी मां रूपकुंवर ने कोठार में स्नान कर हाथों में चंदन का मुठिया लेकर, तुलसी की माला धारण की तथा हाथ में नारियल और गीता लेकर हरिनाम का उच्चारण करते हुए गांव के बंसीवाला मन्दिर की ओर प्रस्थान किया। मंदिर में आकर मां ने प्रभु को साष्टांग दंडवत किया तथा माला, मुठिया, नारियल और गीता को उनके चरणों में रख दिया। फिर परिक्रमा कर श्मशान की ओर जाने लगीं। मगर सभी के आग्रह ने उन्हें रोक दिया।

    बाला सती मां के अनुसार – वे कई जन्मों से सती हो रही है। एक जन्म में उनके श्राप से पूरा परिवार ही काल का ग्रास बन गया। सती मां ने पश्चाताप तो किया पर अब क्या हों ? सती मां के मुंह से श्राप निकल चूका था।

    कहते है उसी का प्रायश्चित करने के लिए सती मां ने अनेक जन्म लिए है और हर जन्म में निरंतर सती हो रही है। इतना ही कहा कि सतियों का सत् खंडित करना कोई अच्छी बात नहीं। मनुष्य कुछ करे या न करें, प्रकृति तो अपना काम करती ही हैं।

    बाला सती मां मन्दिर से घर लोट आई, लेकिन उन्होंने अन्न जल छोड़े छः माह भी न बीते थे कि एक अद्भुत घटना घट गई। मां का आसन था जिस पर घंटो, दिनों ही नहीं महीनों लगातार बैठ कर ध्यान पुजा में मगन रहती, एकादशी का दिन था। प्रातः काल की शुभ वेला में मां स्नान करके अपनी कोठरी में पधारी, ज्योहि मां ने कोठरी में पैर रखा, मां की गद्दी स्वतः ही जल उठी।

    एक बड़ी ज्वाला निकली संपूर्ण कोठरी प्रकाशमय हो गई। मां ने साष्टांग दंडवत कर कहा कि एक ओर घड़ी टल गई। वह भविष्य में कभी भी आसन पर नहीं बैठेगी। उस गद्दी के जल जानें पर भी वहां कोई राख नहीं बची।

    सती मां के दर्शन

    बाला सती मां की साधना दिनोदिन उद्धर्वगमी होकर बढ़ने लगी और इसके साथ साथ उनकी ख्याति भी चारों दिशाओं में फैलने लगी। दूर दूर से लोग सती मां के दर्शनार्थ आने लगे।

    बलि प्रथा की समाप्ति

    सती मां का पीहर और ससुराल भक्तिभाव से सम्पन्न था मांस, मदिरा से दूर था लेकिन ससुराल में दशहरे पर बलि चढ़ाई जाती थी। मां ने सर्वप्रथम अपने रावले में ही इस प्रथा को बंद करवाया व अपने ही हाथो से इस स्थान पर सात्विक देव विराजमान किए। गांव के बंसीवाला मन्दिर का जीर्णोद्वार कराया। कृष्ण और राधा जी की सुंदर मूर्तियां स्थापित की। सती मां ने धीरे धीरे अपने पीहर और ससुराल का त्याग कर दिया।

    ब्रह्मलीन

    मां बाला सती जी सभी भक्तों को छोड़कर सदा के लिए 15, नवंबर 1986 को ब्रह्मलीन हो गई।

    मां की कुटिया

    बाला गांव को सिद्ध अवतारी योगिनी सती मां रूपकुंवर ने समस्त विश्व का अध्यात्मिक आकर्षण बना दिया। इस धाम में नदी के किनारे हरे भरे पेड़ो के झुरमुटो से झांकता हुआ एक साफ सुथरा कमनीय शांत आश्रम है जिसे सती मां की कुटिया के नाम से जाना जाता है।

    इसी धाम में शक्ति की साक्षात अवतार, भक्त शिरोमणी, निराहरी साधिका पूजनीय सती मां के कुछ वर्षो पूर्व ही दर्शन हुआ करते थे। वहां अपने भक्तों का सैलाब सा उमड़ता था। यहां दूर दूर से श्रृद्धालु सती मां की जय जयकार करते आते व मां का आशीर्वाद प्रसाद पाकर स्वयं को भाग्यशाली समझते हुए यहां से विदा होते थे।

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    Bhanwar Singh Thada
    Bhanwar Singh Thadahttp://kshatriyasanskriti.com
    Guardian of Kshatriya heritage and warrior traditions. Promoting Rajput history, dharmic values, and the timeless principles of courage, honor, and duty. Dedicated to cultural preservation and inspiring pride in our glorious past.
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