जब भक्त प्रह्लाद को अग्नि की लपटों में भस्म करने का षड्यंत्र रचा गया, तब उसी अग्नि ने अधर्म को जलाकर धर्म की विजय घोषित की – यही है होली का वह अमर सन्देश, जो आज भी हर फाल्गुन पूर्णिमा को प्रज्वलित होता है। होली 2026 कब है – यह प्रश्न आज लाखों श्रद्धालुओं के मन में है, और इस वर्ष यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि इस बार होलिका दहन के दिन पूर्ण चंद्र ग्रहण का संयोग बन रहा है।
क्या आपने कभी सोचा कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, यह सनातन धर्म की उस अदम्य शक्ति का उत्सव है, जो हर अत्याचारी के दंभ को मिट्टी में मिला देती है? क्षत्रिय संस्कृति में यह पर्व विशेष महत्व रखता है – क्योंकि भक्त प्रह्लाद वैसे ही सत्य के लिए अडिग रहे, जैसे एक सच्चा क्षत्रिय अधर्म के सामने कभी नहीं झुकता।
इस लेख में आप जानेंगे – Holi 2026 की सही तारीख, होलिका दहन का शुभ मुहूर्त, पूजा की सनातनी विधि, चंद्र ग्रहण का प्रभाव, और इस गौरवशाली पर्व की हज़ारों वर्ष पुरानी विरासत।
1: ऐतिहासिक संदर्भ और पृष्ठभूमि
होली का ऐतिहासिक सत्य: जो वेद और शास्त्रों में दर्ज है
होली केवल हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद की कथा नहीं है। यह पर्व उससे भी कहीं पुराना है – इसकी जड़ें वैदिक काल की उस सभ्यता में हैं, जब सनातन धर्म अपने पूर्ण वैभव में था।
वैदिक प्रमाण – “होलाक पर्व”:
वेद की कठशाखा से संबंधित काठक गृह्यसूत्र में इसे “होलाक पर्व” कहा गया है। सूत्र है – “राकाहोलाके (73.1)” – जिसकी व्याख्या में टीकाकार देवपाल ने लिखा है कि स्त्रियाँ अपने सौभाग्य की वृद्धि के लिए प्रातःकाल अपने घर के सामने अग्नि जलाती थीं। इस पर्व के देवता चन्द्रमा माने गए, इसीलिए यह पूर्णिमा को मनाया जाता था।
जैमिनि मीमांसा सूत्र का प्रमाण:
जैमिनि के मीमांसा सूत्र के प्रथम अध्याय के तृतीय पाद में “होलाकाधिकरण” नामक एक स्वतंत्र खंड (सूत्र 15 से 23 तक) है। यहाँ होलाक पर्व को गृहस्थों द्वारा मनाए जाने वाले एक विशेष अनुष्ठान के रूप में मान्यता दी गई है।
वात्स्यायन कामसूत्र का उल्लेख:
ईसा की तीसरी शती में रचित वात्स्यायन कामसूत्र (1.4.42) में इस होलाक पर्व का लौकिक स्वरूप मिलता है। व्याख्याकार यशोधर लिखते हैं:
“होलाका फाल्गुनपूर्णिमायां शृंगादिमुक्तेन किंशुकादिकुसुमरागाम्भसा परस्परोक्षणम्।”
अर्थात् – फाल्गुन पूर्णिमा के दिन पिचकारी जैसे यंत्र से पलाश (टेसू) के रंगीन फूलों से बने रंगीन जल को एक-दूसरे पर फेंकने की क्रीडा होलाक पर्व में होती है। यानी आज से लगभग 1700 वर्ष पहले भी होली में ठीक वैसे ही रंग खेला जाता था जैसे आज खेला जाता है!
भागवत पुराण की कथा – धर्म की विजय:
भागवत पुराण और विष्णु पुराण में वर्णित कथा के अनुसार असुर राजा हिरण्यकशिपु ने ब्रह्मा से वरदान पाकर स्वयं को अजेय मान लिया था। उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। जब हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका – जिसे अग्नि से न जलने का वरदान था – को प्रह्लाद के साथ अग्नि में बैठने का आदेश दिया, तो धर्म ने अधर्म को उसी अग्नि में भस्म कर दिया। होलिका जल गई, भक्त प्रह्लाद बच गए।

2: होली 2026 के महत्वपूर्ण पहलू
होली 2026 कब है? जानें 6 महत्वपूर्ण पहलू
1. होली 2026 की सही तारीख – भ्रम दूर करें
इस वर्ष होली की तारीख को लेकर व्यापक भ्रम की स्थिति है। ज्योतिर्विद और वास्तु विशेषज्ञ राकेश चतुर्वेदी के अनुसार (NDTV, फरवरी 2026):
“वर्ष 2026 में रंगों की होली 4 मार्च, बुधवार को मनाई जाएगी। होलिका दहन 3 मार्च, मंगलवार को किया जाएगा।”
पंचांग के अनुसार सटीक तिथि-क्रम:
| तिथि | आयोजन | विवरण |
|---|---|---|
| 2 मार्च 2026, सोमवार | फाल्गुन पूर्णिमा प्रारंभ | शाम 05:55 बजे से |
| 3 मार्च 2026, मंगलवार | होलिका दहन | शाम 06:22 – 08:50 बजे (शुभ मुहूर्त) |
| 3 मार्च 2026, मंगलवार | फाल्गुन पूर्णिमा समाप्ति | शाम 05:07 बजे |
| 4 मार्च 2026, बुधवार | रंगवाली होली / धुलंडी | प्रातःकाल से |
2. होलिका दहन : 2 या 3 मार्च – विद्वानों के दो मत
3 मार्च – अधिकांश विद्वानों का मत (सर्वमान्य)
- भद्राकाल नहीं है – होलिका दहन भद्रा-रहित होगा
- उदयकालीन पूर्णिमा उपलब्ध है
- शाम 6:22 से 8:50 – प्रदोष काल में पर्याप्त समय
- चंद्रग्रहण पूरे भारत में नहीं दिखेगा, अतः सूतक सर्वत्र मान्य नहीं
- DrikPanchang, Aaj Tak, NDTV, Times of India – सभी यही मानते हैं
2 मार्च – कुछ विद्वानों का मत (मथुरा)
- चंद्रग्रहण के सूतक से बचने हेतु 2 मार्च शाम 7:30 बजे
- समस्या: प्रदोष काल में भद्राकाल रहेगा जो शास्त्र विरुद्ध है
पंडित मनोज त्रिपाठी (हरिद्वार) के अनुसार: “जब चंद्रमा का उदय ही ग्रहण से मुक्त अवस्था में हो रहा है, तो ग्रहण का प्रभाव मान्य ही नहीं होगा। इसलिए 3 मार्च की शाम होलिका दहन के लिए सबसे उपयुक्त समय है।”
3. होलिका दहन शुभ मुहूर्त 2026 – सटीक समय जानें
हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार होलिका दहन सूर्यास्त के पश्चात प्रदोष काल में करना चाहिए, जब पूर्णिमा तिथि व्याप्त हो और भद्रा न हो।
नई दिल्ली के लिए होलिका दहन मुहूर्त:
- शुभ मुहूर्त: शाम 06:22 बजे से 08:50 बजे तक
- कुल अवधि: 2 घंटे 28 मिनट
- भद्रा पूंछ: रात 01:25 – 02:35 (4 मार्च)
- भद्रा मुख: रात 02:35 – 04:30 (4 मार्च) – इस समय दहन वर्जित
धर्मसिंधु ग्रंथ में स्पष्ट लिखा है कि “भद्रा मुख में किया गया होलिका दहन न केवल दहन करने वाले के लिए, बल्कि नगर और देश के लिए भी अनिष्टकारी होता है।” इसलिए मुहूर्त का पालन करना अत्यंत आवश्यक है।

4. चंद्र ग्रहण 2026 – होलिका दहन पर इस बार विशेष सावधानी
इस वर्ष की होली विशेष है – क्योंकि 3 मार्च 2026 को फाल्गुन पूर्णिमा पर पूर्ण चंद्र ग्रहण लग रहा है। यह एक दुर्लभ खगोलीय संयोग है।
चंद्र ग्रहण 2026 – मुख्य तथ्य (भारत के लिए):
| विवरण | समय |
|---|---|
| सूतक काल प्रारंभ | सुबह 09:39 बजे (3 मार्च) |
| ग्रहण प्रारंभ | दोपहर 02:16 बजे |
| चंद्रोदय (भारत में) | शाम 06:21 बजे |
| ग्रहण समाप्ति | शाम 06:46-06:47 बजे |
| सूतक काल समाप्ति | शाम 06:46 बजे |
इसका होलिका दहन पर प्रभाव:
- सूतक काल में पूजा-पाठ वर्जित है
- होलिका दहन ग्रहण समाप्ति के बाद यानी शाम 06:47 बजे के बाद करें
- सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त: शाम 06:47 से 08:50 बजे के बीच
- ग्रहण के बाद स्नान करके घर को गंगाजल से शुद्ध करें, फिर पूजन आरंभ करें
जगन्नाथ पंडित मनोज त्रिपाठी (हरिद्वार) के अनुसार – “ग्रहण समाप्ति के तुरंत बाद किया गया होलिका दहन विशेष रूप से शुभ माना जाता है, क्योंकि यह नकारात्मक ऊर्जा को समूल नष्ट करने का काल है।”
5. होलिका दहन पूजा विधि – सनातन पद्धति
पूजा सामग्री:
गंगाजल, शुद्ध जल, रोली, चंदन, अक्षत (चावल), पुष्प, माला, गुड़, साबुत हल्दी, बताशे, नारियल, गुलाल, गेहूं/जौ की बाली, कपूर, गाय के गोबर के उपले, पान का पत्ता, लौंग, इलायची, हवन सामग्री।
पूजा की सनातनी विधि (क्रमबद्ध):
- होलिका दहन स्थल को साफ करके गंगाजल से पवित्र करें
- तन-मन से शुद्ध होकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठें
- गाय के गोबर से होलिका और प्रह्लाद की प्रतिमा बनाएं
- गोबर के उपले और लकड़ी बीच में रखें, कच्चे सूत से सात बार परिक्रमा करते हुए लपेटें
- धूप-दीप, पुष्प, चंदन, अक्षत, गुड़, कपूर, हल्दी, नारियल, पान, लौंग, अबीर-गुलाल, कुमकुम अर्पित करें
- होलिका को गोबर से बनी उपलों वाली माला अर्पित करें। पितरों, हनुमान जी, शीतलामाता और परिवार के नाम से चार और मालाएं अर्पित करें
- भगवान नृसिंह का ध्यान करते हुए होलिका में अग्नि प्रज्वलित करें
- अग्नि प्रज्वलन के बाद परिवार के लिए मंगलकामना करते हुए गेहूं, जौ, गुलाल, उपले और शुद्ध जल अर्पित कर तीन बार परिक्रमा करें
- होलिका दहन की राख ठंडी होने पर माथे पर लगाएं और घर लेकर जाएं
महत्वपूर्ण नियम:
- गर्भवती महिला, नवजात शिशु, नई दुल्हन को होलिका दहन नहीं देखना चाहिए
- फाल्गुन पूर्णिमा के चंद्र का दर्शन और पूजन अवश्य करें
- शुभ मुहूर्त में दहन के बाद ही भोजन करें
6. होलाष्टक – जब शुरू हो जाता है पर्व का पवित्र काल
होलाष्टक फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक – 8 दिन का वह विशेष काल है जिसमें शुभ कार्य वर्जित माने जाते हैं। 2026 में होलाष्टक 24 फरवरी से 3 मार्च तक रहेगा। इस काल में विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश आदि कार्य टाल देने चाहिए।
3: तुलनात्मक विश्लेषण
विश्व परंपराओं में होली की तुलना: भारतीय सनातन विरासत की विशिष्टता
होली केवल एक “रंगों का त्योहार” नहीं है – यह उस गहरे दार्शनिक सत्य का उत्सव है जिसे विश्व की कोई अन्य सभ्यता इतनी गहराई से नहीं समझ सकी।
| विशेषता | भारतीय होली (सनातन) | पश्चिमी Carnival | जापानी Hanami |
|---|---|---|---|
| मूल स्वरूप | अग्नि यज्ञ + अधर्म नाश | मदिरा उत्सव | प्रकृति पूजन |
| दार्शनिक आधार | सत्य-धर्म की अपराजेयता | मनोरंजन | क्षणभंगुरता का बोध |
| परंपरा का काल | 3000+ वर्ष (वैदिक काल) | मध्ययुगीन (500 वर्ष) | 1000+ वर्ष |
| रंग का अर्थ | प्रेम, समरसता, ऊर्जा | सजावट | सौंदर्य |
| धार्मिक कर्मकाण्ड | विधिवत पूजन, अग्नि अनुष्ठान | चर्च परंपरा से अलग | बौद्ध प्रभाव |
| सामाजिक संदेश | ऊँच-नीच भेद मिटाना | वर्ग विभाजन बना रहता | सामूहिक आनंद |
| प्राकृतिक रंग | पलाश, टेसू के फूल (प्राचीन) | कृत्रिम | प्राकृतिक |
क्षत्रिय परंपरा की विशिष्टता:
राजपूत परंपरा में होली विशेष उत्साह से मनाई जाती थी। राजस्थान के राजदरबारों में “फाग खेलना” एक राजसी परंपरा थी। वीर योद्धा भी फाल्गुन में उत्सव मनाते थे – क्योंकि क्षत्रिय धर्म में जीवन के हर रंग को जीने की परंपरा है। जयपुर, उदयपुर और जोधपुर के राजमहलों में होली पर विशेष “दरबारी होली” का आयोजन होता था, जिसमें राजा-प्रजा एक साथ रंग खेलते थे – यही क्षत्रिय समरसता का प्रतीक था।
“क्षत्रिय धर्म केवल युद्धभूमि में नहीं, जीवन के हर उत्सव में भी उतना ही प्रासंगिक है।”
4: आधुनिक प्रासंगिकता
आज के युग में होली से क्षत्रिय जीवन की सीख
रंगों का यह त्योहार आधुनिक जीवन में भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना हज़ारों वर्ष पहले था।
1. अधर्म के विरुद्ध अडिग रहना:
भक्त प्रह्लाद का जीवन क्षत्रिय जीवन-दर्शन का प्रतीक है। जब संपूर्ण दरबार राजा के भय से झुक गया, प्रह्लाद अकेले सत्य पर खड़े रहे। आज जब क्षत्रिय समाज की विरासत को विकृत किया जा रहा है, इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है – तब प्रह्लाद की यही अडिगता हमारा मार्गदर्शन करती है।
2. समरसता का संदेश:
होली वह पर्व है जो सभी भेद मिटाता है। क्षत्रिय परंपरा में भी प्रजा की रक्षा और समानता का भाव सर्वोपरि था। राजस्थानी लोकसाहित्य में होली के गीत इसी भाव को व्यक्त करते हैं।
3. पुराने रंगों की वापसी:
प्राचीन भारत में पलाश (टेसू) के फूलों से बने प्राकृतिक रंग प्रयोग किए जाते थे। वात्स्यायन के काल से यह परंपरा चली आ रही है। आज रासायनिक रंगों के दुष्प्रभावों से बचने के लिए प्राकृतिक रंगों की ओर लौटना हमारी विरासत को जीवित रखना है।
4. क्षत्रिय गौरव का उत्सव:
राजस्थान की भूमि – जहाँ प्रतिवर्ष मेवाड़ में “मेवाड़ होली उत्सव” मनाया जाता है – आज भी उस गौरवशाली परंपरा का निर्वहन कर रही है। महाराणा उदयपुर के समय से चली आ रही यह परंपरा क्षत्रिय धर्म के उत्सव-प्रेम का जीवंत प्रमाण है।
FAQ – लोग यह भी पूछते हैं
Q1. होली 2026 में कब है – 2 मार्च या 3 मार्च?
A: होलिका दहन 3 मार्च 2026 (मंगलवार) को है। रंगवाली होली (धुलंडी) 4 मार्च 2026 (बुधवार) को मनाई जाएगी।
Q2. होलिका दहन 2026 का शुभ मुहूर्त क्या है?
A: नई दिल्ली के लिए शुभ मुहूर्त शाम 06:22 से 08:50 बजे तक है। लेकिन 3 मार्च को चंद्र ग्रहण के कारण सूतक काल शाम 06:46 बजे समाप्त होगा, इसलिए 06:47 बजे के बाद दहन करना सर्वश्रेष्ठ रहेगा।
Q3. क्या 3 मार्च 2026 को चंद्र ग्रहण होलिका दहन को प्रभावित करेगा?
A: हाँ। सूतक काल सुबह 09:39 से शाम 06:46 तक रहेगा। इस दौरान पूजा-पाठ वर्जित है। ग्रहण समाप्ति के बाद स्नान कर, घर को गंगाजल से शुद्ध करके, शुभ मुहूर्त में होलिका पूजन करें।
Q4. होली का वैदिक इतिहास क्या है – यह पर्व कितना पुराना है?
A: होली का उल्लेख काठक गृह्यसूत्र, जैमिनि मीमांसा सूत्र और वात्स्यायन कामसूत्र (ई. तीसरी शती) में मिलता है। इस प्रकार यह पर्व 3000+ वर्ष पुराना है। वैदिक काल में इसे “होलाक पर्व” कहा जाता था।
Q5. होलिका दहन की परिक्रमा कितनी बार करनी चाहिए?
A: शास्त्रों के अनुसार तीन परिक्रमा करना उचित है। कुछ मान्यताओं में 5 या 7 परिक्रमा का भी उल्लेख है, परंतु पारंपरिक और शास्त्रीय विधि के अनुसार 3 परिक्रमा मान्य है।
निष्कर्ष (Conclusion)
होली 2026 कब है – इसका सटीक उत्तर है: होलिका दहन 3 मार्च (मंगलवार) और रंगवाली होली 4 मार्च (बुधवार) 2026। इस वर्ष चंद्र ग्रहण के कारण होलिका दहन का सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त शाम 06:47 बजे से 08:50 बजे के बीच है।
निष्कर्ष: शास्त्रों में भद्राकाल में होलिका दहन सख्त वर्जित है। चूँकि 3 मार्च को भद्रा नहीं है और प्रदोष काल में 2 घंटे 28 मिनट का पर्याप्त मुहूर्त उपलब्ध है, इसलिए 3 मार्च 2026 को शाम 6:22 बजे से होलिका दहन करना सर्वाधिक शुभ एवं शास्त्र-सम्मत है।
परंतु होली केवल एक तारीख नहीं है – यह उस सनातन सत्य की पुनर्घोषणा है कि अधर्म कितना भी शक्तिशाली हो, धर्म की अग्नि उसे अंततः भस्म कर देती है। वैदिक काल के “होलाक पर्व” से लेकर आज तक, यह पर्व हमारी अखंड सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।
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