34.1 C
New Delhi
Monday, March 30, 2026
Home Blog Page 9

गौरा और बादल : दो वीर योद्धा जिनके शौर्य व पराक्रम से अलाउद्दीन ख़िलजी भी काँपता था

शौर्य और बलिदान का प्रतीक मेवाड़ अपने ह्रदय में महान वीरो और क्षत्राणियो की गौरवपूर्ण गाथा को संजोए हुए हैं। यह गवाह है चित्तौडगढ़ के जौहर और शाके के लिए , जो वीरो का अपने धर्म, अपनी स्वतन्त्रता, अपनी आन – बान और शान के लिए केसरिया बाना धारण कर रणचंडी का कलेवा बन गए। इनमे वीर योद्धा गौरा और बादल जिनके नाम और पराक्रम से मुगल आक्रांता भी थर – थर काँपते थे ।

गौरा और बादल का इतिहास

मुहणोत नैणसी के प्रसिद्ध काव्य ‘मारवाड़ रा परगना री विगत’ में इन दो वीरों के बारे में पुख़्ता जानकारी मिलती है. इस काव्य के अनुसार की रिश्ते में चाचा और भतीजा लगने वाले ‘गौरा और बादल’ जालौर के ‘चौहान वंश’ से संबंध रखते थे, गोरा तत्कालीन चित्तौड़ के सेनापति थे एवं बादल उनके भतीजे थे। दोनो अत्यंत ही वीर एवं पराक्रमी योद्धा थे, उनके साहस, बल एवं पुरुषार्थ से सारे शत्रु डरते थे। गोरा एवं बादल इतिहास के उन गिने चुने योद्धाओं में से एक थे जिनके सामने मुगलों ने भी घुटने टेक दिए थे ।

ये ऐसे योद्धा थे जो खिलजी की कैद से रावल रतन सिंह को छुड़ा लाये थे । बात उस समय की है जब अलाउद्दीन ख़िलजी ने धोखे से रावल रतन सिंह को कैद कर लिया था, इस युद्ध में जब गोरा ने खिलजी के सेनापति को मारा था तब तक उनका खुद का शीश पहले ही कट चुका था, केवल धड़ शेष रहा था ।

अलाउद्दीन ख़िलजी का चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण

सन् 13वीं ईस्वी जब चित्तौड़गढ़ लगातार तुर्को के हमले झेल रहा था बाप्पा रावल के वंशजो ने हिंदुस्तान को लगातार तुर्को और मुस्लिम आक्रांताओ को रोके रखा

अल्लाउद्दीन ख़िलजी की सेना ने चितौड़ के किले को कई महीनों घेरे रखा पर चितौड़ की रक्षार्थ तैनात राजपूत सैनिको के अदम्य साहस व वीरता के चलते कई महीनों की घेरा बंदी व युद्ध के बावजूद वह चितौड़ के किले में घुस नहीं पाया |

अंत अल्लाउद्दीन ख़िलजी ने थक हार कर एक योजना बनाई जिसमें अपने दूत को चितौड़ रत्नसिंह के पास भेज सन्देश भेजा कि “हम आपसे संधि करना चाहते है

इतना सुनते ही रत्नसिंह जी गुस्से में आ गए और युद्ध करने की ठानी पर रानी पद्मिनी ने इस अवसर पर दूरदर्शिता का परिचय देते हुए अपने पति रत्नसिंह को समझाया कि ” सिर्फ मेरी वजह से व्यर्थ ही चितौड़ के सैनिको और लोगो का रक्त बहाना ठीक नहीं रहेगा ” रानी ने रतन सिंह जी को समझाया और सायं से काम लेने को कहा रानी नहीं चाहती थी कि उसके चलते पूरा मेवाड़ राज्य तबाह हो जाये और प्रजा को भारी दुःख उठाना पड़े क्योंकि मेवाड़ की सेना अल्लाउद्दीन की लाखो की सेना के आगे बहुत छोटी थी।

रावल रतनसिंह को ख़िलजी की क़ैद से छुड़ाया

अलाउद्दीन ख़िलजी की नज़र हमेशा से ही मेवाड़ राज्य पर थी, लेकिन वो युद्ध में कभी भी राजपूतों को नहीं हरा सका था. इसलिए उसने कुटनीतिक चाल चली और मित्रता के बहाने रावल रतन सिंह को मिलने के लिए बुलाया और धोखे से उन्हें बंदी बना लिया. इसके बाद खिलजी ने मेवाड़ को संदेश भिजवाया कि रावल को तभी आज़ाद किया जाएगा, जब ‘रानी पद्मिनी’ को उसके पास भेजा जायेगा. 

अलाउद्दीन खिलजी के इस धोखे से राजपूत क्रोधित हो उठे. इस दौरान ‘रानी पद्मिनी’ ने धीरज व चतुराई से काम लेने का आग्रह किया. इसके बाद ‘रानी पद्मिनी’ ने ‘गोरा-बादल’ के साथ से मिलकर खिलजी को उसी तरह जबाब देने की रणनीति अपनाई जैसा खिलजी ने रावल रतन सिंह के साथ किया था.

अल्लाउद्दीन अच्छी तरह से जनता था की राजपूतो का हराना इतना आसान भी नही और अगर सेना का पड़ाव उठा दिया और उसके सेनिको का मनोबल टूट जायेगा व बदनामी होगी वो अलग इसने मन ही मन एक योजना बनाई

चित्तोड़ के द्वार खोले गए तुर्क सेना निचिंत थी रानी पद्मनी की डोली जिसमे राजपूत वीर बेठे थे वही आगे पीछे की कमान गोरा बादल संभाले हुए थे तुर्क सेना जश्न मना रही थी बिना लड़े जीत का राजपूत जो भेष बदल कर चल रहे थे अजीब सी शांति थी सबके चेहरे पर, अल्लाउद्दीन दूर बेठा देख रहा था और अति उत्साहित था। लेकिन अचानक मेवाड़ की सेना मुगलों पर टूट पड़ी । मुगल सेना में हाहाकार मैच गया । मेवाड़ की सेना का नेतृत्व गौरा और बादल कर रहे थे । मुगलों सेना को भागना पड़ा , यह मुगलों की हार थी ।

रावल रतन सिंह से मिलते ही वीर योद्धा ‘गोरा’ उन्हें घोड़े पर बिठाकर तुरंत वहां से रवाना हो गया, जबकि अन्य पालकियों में बैठे राजपूत योद्धा खिलजी के सैनिकों पर टूट पड़े. राजपूतों के इस अचानक हमले से खिलजी की सेना हक्की-बक्की रहा गई. इससे पहले खिलजी कुछ समझ पाता राजपूतों ने रतनसिंह को सुरक्षित अपने दुर्ग तक पहुंचा दिया था। इस दौरान ‘गोरा और बादल’ काल बनकर खिलजी की सेना पर टूट पड़े ।

इस अप्रत्याक्षित हार से तुर्क सेना मायूस हुयी अल्लाउद्दीन बहुत ही लज्जित हुआ अल्लाउदीन में चित्तोड़ विजय करने की ठानी और अपने दूत भेज कर गुजरात अभियान में लगी और सेना बुला ली अब राजपूतो की हार निश्चित थी

चित्तौड़गढ़ में तुर्कों को सात महीने घेरे रखा

चित्तौड़गढ़ दुर्ग में राजपूतो ने 7 माह तुर्को को चित्तोड़ में घुसने नही दिया , और मुगल सेना को भी पड़ाव को मजबूर कर दिया । अंत में किल्ले में रसद की कमी हो गयी और राजपूतो ने जौहर और शाका की ठानी

राजपूत सैनिकों ने केसरिया बाना पहन कर जौहर और शाका करने का निश्चय किया । जौहर के लिए वहा मैदान में रानी पद्मिनी के नेतृत्व में 23000 राजपूत वीरांगनाओं ने विवाह के जोडे में अपने देवी देवताओ का स्मरण कर सतीत्व और धर्म की रक्षा के जौहर चिता में प्रवेश किया । थोडी ही देर में देवदुर्लभ सोंदर्य अग्नि की लपटों में स्वाहा होकर कीर्ति कुंदन बन गया ।

जौहर : सतीत्व रक्षार्थ सर्वस्व समर्पण

जौहर की ज्वाला

जौहर की ज्वाला की लपटों को देखकर अलाउद्दीन खिलजी और उसकी सेना भी सोच में पड़ गयी ।

महाराणा रतन सिंह के नेतृत्व में केसरिया बाना धारण कर 30000 राजपूत सैनिक किले के द्वार खोल भूखे शेरो की भांति खिलजी की सेना पर टूट पड़े भयंकर युद्ध हुआ । गौरा और बादल दोनों योद्धा वीरगति को प्राप्त होकर अमर हो गए ।

रानी पद्मनी के काका गौरा और उसके भाई बादल ने अद्भुत पराक्रम दिखाया बादल की आयु उस वक्त सिर्फ़ बारह वर्ष की ही थी उसकी वीरता का एक गीतकार ने इस तरह वर्णन किया –

बादल बारह बरस रो,लड़ियों लाखां साथ ।

सारी दुनिया पेखियो,वो खांडा वै हाथ ।।

इस प्रकार सात माह के भीषण युद्ध के बाद 18 अप्रेल 1303 को विजय के बाद उत्सुकता के साथ खिलजी ने चित्तोड़ दुर्ग में प्रवेश किया लेकिन उसे एक भी पुरूष,स्त्री या बालक जीवित नही मिला जो यह बता सके कि तुर्क तू हार गया

गोरा बादल के शव पर भारत माता रोई थी 

उसने अपनी दो प्यारी ज्वलंत मणियां खोयी थी ।।

धन्य धरा मेवाड़ धन्य गोरा बादल बलिदानी 

जिनके बल से रहा पद्मिनी का सतीत्व अभिमानी ।।

जिसके कारन मिट्टी भी चन्दन है राजस्थानी |

दोहराता हूँ सुनो रक्त से लिखी हुई क़ुरबानी || – पंडित नरेंद्र मिश्र

रत्नसिंह युद्ध के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए और रानी पद्मिनी क्षत्राणियों की कुल परम्परा मर्यादा और अपने कुल गौरव की रक्षार्थ जौहर की ज्वालाओं में जलकर स्वाहा हो गयी जिसकी कीर्ति गाथा आज भी अमर है और सदियों तक आने वाली पीढ़ी को गौरवपूर्ण आत्म बलिदान की प्रेरणा प्रदान करती रहेगी |

मेवाड़ साक्षी है उन महान वीरांगनाओं के अग्नितेज का जिसने एक नहीं तीन तीन बार जौहर की ज्वाला को प्रज्वलित किया और आने वाली पीढ़ियों को शिक्षा दी कि शील और सतीत्व से बढ़कर इस पृथ्वी पर और कुछ भी नहीं है

इसे भी पढ़े –


विश्व के प्राचीनतम राजवंश मेवाड़ के युवराज महाराज कुमार विश्वराज सिंह जी मेवाड़

विश्व के प्राचीनतम राजवंश मेवाड़ के युवराज एवं वीरशिरोमणि ,राष्ट्रनायक महाराणा प्रताप के वंशज महाराज कुमार विश्वराज सिंह जी मेवाड़ का जन्म 18 मई 1967 को हुआ । उनके पिता मेवाड़ के 76 वे महाराणा श्री मंत हुजूर महेंद्रसिंह जी मेवाड़ एवं माता टिहरी गढ़वाल की राजकुमारी निरुपमा कुमारी है । महाराज कुमार विश्वराज सिंह जी ने अपनी शिक्षा मेयो कॉलेज अजमेर से की है । वर्तमान में 16 वी विधानसभा के लिए राजस्थान के नाथद्वारा से विधायक चुने गए है ।

मेवाड़ ने अपने ध्येय वाक्य – ” जो दृढ़ राखे धर्म को तिही राखे करतार “को सदा चरितार्थ किया है ।

[ मेवाड़ – विश्व प्रसिद्ध मेवाड़ के जौहर और शाके में वीर और वीरांगनाओं के उनका गर्म लहू और उनकी गर्म राख एक चुनौती भरी आवाज आक्रांता को ललकारती थी कि हम जीते जी गुलाम नहीं होंगे। मेवाड़ महाराणा प्रताप के राष्ट्र प्रेम का , सांगा के पराक्रम का , कुम्भा के शौर्य का , रानी पद्मिनी के जौहर का , गौरा – बादल के बलिदान का और क्षत्राणी पन्नाधाय का जिसने राष्ट्र के लिए अपने पुत्र का बलिदान दे दिया। कभी काबुल और कंधार तक फैला, मेवाड़ जिसका कण कण भक्ति, शक्ति और शौर्य कि गाथा अपने मे समेटे हुए, अनगिनत युद्ध, अनगिनत योद्धाओं का बलिदान तो मीरा बाई की भक्ति हजारों वीरांगनाओं के जौहर और शाकाओ का साक्षी रहा मेवाड़। ]

पिता – विश्व प्रसिद्ध मेवाड़ के महाराणा महेंद्र सिंह मेवाड़ एक भारतीय राजनीतिज्ञ हैं जो लोकसभा में सांसद थे। वह मेवाड़ के महाराणा भगवत सिंहजी के सबसे ज्येष्ठ पुत्र हैं। मेवाड़ में भगवान एकलिंगनाथ जी को मेवाड़ के अधिष्ठाता एवं महाराणा को उनका दीवाण माना जाता है । उदयपुर के महाराणाओं को शासक नहीं बल्कि श्री एकलिंगजी की ओर से राज्य का संरक्षक माना जाता है।

श्री मंत महाराणा महेंद्रसिंह जी मेवाड़
Born24 February 1941 (age 82)
उदयपुर , किंगडम ऑफ मेवाड़ , 
Spouseमहारानी निरुपमा कुमारी ( प्रिन्सेस ऑफ  टिहरी गढ़वाल )
Issueप्रिंस विश्वराज सिंह ऑफ मेवाड़
प्रिन्सेस त्रिविक्रमा कुमारी ऑफ मेवाड़
Fatherमहाराणा भगवत सिंह जी ( क्राउन प्रिंस ऑफ मेवाड़ )
Mother राजमाता सुशीला कुमारी ( प्रिन्सेस ऑफ बीकानेर )
क्षत्रिय संस्कृति

माता – महाराज कुमार विश्वराज सिंह जी मेवाड़ की माता टिहरी गढ़वाल की राजकुमारी निरुपमा कुमारी है । वे टिहरी गढ़वाल के राजा लेफ्टिनेंट. कर्नल महाराजा मनबेंद्र शाह की पुत्री है ।

लेफ्टिनेंट. कर्नल महाराजा मनबेंद्र शाह भारत की दूसरी, तीसरी, चौथी, 10वीं, 11वीं, 12वीं, 13वीं और 14वीं लोकसभा के सदस्य थे। उन्होंने उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया और भारतीय जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राजनीतिक दल में शामिल होने से पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे। वह भाजपा के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले सदस्यों में थे ।

विवाह

Image Source – Instagram

उनका विवाह पंचकोटे राजपरिवार की राजकुमारी महिमा कुमारी और पंचकोटे के जगदीश्वरी प्रसाद सिंह जी देव की बेटी से हुआ है। उनके दो संतान हैं, एक बेटी का नाम बाईसा जयति कुमारी और एक बेटा है जिसका नाम भंवर देवजादित्य सिंह रखा गया है।

भंवर देवजादित्य सिंह & बाईसा जयति कुमारी

Image Source – Instagram

राजनीति

Image Source – Kshatriya Sanskriti

मेवाड़ राजपरिवार का 3 दशकों के बाद भारतीय जनता पार्टी में पुनः प्रवेश है। पूर्व में महाराणा महेंद्र सिंह जी भारतीय जनता पार्टी से चित्तोडगढ़ सीट से सांसद रहे थे । वर्तमान में महाराज कुमार विश्वराज सिंह जी नाथद्वारा से विधानसभा का चुनाव कांग्रेस के सी. पी . जोशी के सामने भाजपा के प्रत्याशी के रूप में थे । जिसमे मेवाड़ की जीत हुई ।

सी. पी. जोशी एक भारतीय राजनीतिज्ञ और नाथद्वारा, राजस्थान से पांच बार विधायक हैं। उनका जन्म राजस्थान के नाथद्वारा में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था और वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य हैं। वह राजस्थान विधानसभा के निवर्तमान अध्यक्ष हैं। इससे पहले वह 15वीं लोकसभा में भीलवाड़ा से सांसद थे ।   पांच बार के निवर्तमान विधायक और निवर्तमान राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष है ।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ मेवाड़

Image Source – Instagram

प्रधानमंत्री मोदी को प्रतीक चिन्ह भेट करते हुए मेवाड़

Image Source – Instagram

माँ बाला सती माता साक्षात् देवी रूप !

राजस्थान की भूमि सन्त सती और सूरमा की भूमि रहीं हैं। मां बाला सती जी ने साधना की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए परम तत्व से साक्षात्कार कर लिया था। वह अणु से विराट बन गई। ईश्वर के सामिप्य ने बाला सती जी को ब्रह्म से साक्षात्कार करा दिया था।

योगश्चितवृति निरोध कलिकाल में बाला सती जी एक ऐसी योगिनी थी जिनने योगाभ्यास से ब्रह्मा – आभ्यांतर परिणामों को त्याग अपने स्वरूप में स्थित हो गई, वह एक सच्ची त्याग मूर्ती एवं लोक सेविका योगिनी थी।

मां के दर्शन मात्र से ही शंका का समाधान एवं संशय का निवारण स्वत: ही हो जाता। भारत की अध्यात्मिक श्रेष्ठता का अनुपम उदाहरण था मां का महान् व्यक्तित्व।

सती मां विराट व्यक्तित्व की स्वामिनी थी। मां का तेज पुंज शरीर के दर्शन मात्र से भक्तो को एक प्रकार का विचित्र चुंबकीय आकर्षण और असीम शांति का अनुभव होता था।

सती मां के हथेली में शंख, चक्र, पद्म, त्रिशूल, शिवलिंग और स्वास्तिक स्पष्ट दृष्टिगोचर होते थे। पद ताल में सुदीर्घ उर्ध्व रेखा विद्यमान थी। उंगलियों और अंगूठों पर चक्र सुशोभित हो रहें थे। हथेली में भाग्य रेखा उत्तर से दक्षिण तक गहरी छाई हुई थी। और सूर्य रेखा भी अलग से देदीप्यमान हो रही थी।

योग और भक्ति का सामंजस्य था सती मां का व्यक्तित्व। योग साधना ने जहां आपकों अलौकिक शक्ति सामर्थ्य से सुसज्जित किया, वहीं भक्ति भाव के ओदार्य से आपकों अलंकृत किया।

मां में मीरा सी तन्मयता, सूर – तुलसी – कबीर सी आराधना, ज्ञानेश्वर चैतन्य सी भक्ति, नरसी, द्रौपदी का विश्वास और रसखान सा आत्मबल दृष्टिगोचर होता था।

बाला सती जी का जन्म

राजस्थान के जोधपुर जिले की बिलाड़ा तहसील में पीपाड़ शहर से 11 किमी . दूर एक छोटा सा गांव है रावणियाना जो वर्तमान में रूपनगर है। इसी गांव में क्षत्रिय वंश के शेखावत लाडखानी गौत्र के श्री लालसिंह जी की धर्मपत्नी श्री मति जड़ावकुंवर की कोख से पुण्यपर्व की पुण्य वेला में भाद्रपद कृष्ण जन्माष्टमी, सोमवार के दिन संवत् 1960 तदानुसार दिनांक 16 अगस्त, 1903 रात्रि बारह बजकर एक मिनट पर रोहिणी नक्षत्र में परम पूजनीया प्रातः स्मरणीया बाला सती जी का शुभ जन्म हुआ।

मां बाला सती जी ने इस शुभ घड़ी में अवतार लिया। उच्च ग्रहों के शुभ लग्न में माता जड़ावकुंवर ने देदीप्यमान तेज से परिपूर्ण महाभाग्यशाली पुण्यवती कन्या को जन्म दिया।

भगवान श्री कृष्ण के पुनीत जन्म की पावनघड़ी में मां का जन्म हुआ। जन्म नक्षत्रों के आधार पर ज्योतिषियों ने इस कन्या की जो जन्म कुण्डली बनाई वह महापुरुषों की कुण्डली के अनुरूप ही थी। राशि वृषभ, नक्षत्र रोहिणी और दशा चन्द्र । यह संयोग जातक के अद्वितीय व्यक्तित्व और महान गुणों का दिग्दर्शन कराती है।

बाला सती जी का बाल्यकाल्य

बालिका रूपकुंवर ने डेढ़ – दो वर्ष की उम्र में ही बोलना शुरू कर दिया और पांच से छः वर्ष की आयु में ही बालिका रूपकुंवर घंटों समाधि जैसी अवस्था में लीन रहने की अभ्यस्त हो गई। वय के साथ साथ आध्यात्मिक रंग और गहराता जा रहा था।

ऐसा प्रतीत होता था कि बालिका रूपकुंवर ने जैसे ही काम , क्रोध , लोभ , मोह , राग , द्वेष , अहंकार और माया से विरक्ति पा ली हो। ईश्वर की प्राप्ति ही जैसे मां बाला सती जी का एक मात्र लक्ष्य रह गया हो। और रोम रोम में राम समा गए हो।

बालिका रूपकुंवर को बचपन से ही जागरण एक आदत पड़ गई। सेवा – वृति के संस्कार भी बचपन से ही मां में अंकुरित हो गए। मां – बाप की सेवा, गुरू सेवा, गाय सेवा, ब्राह्मण, संत एवं अतिथि की सेवा और इसके अलावा दीन, दुःखी व प्राणी मात्र की सेवा आदि मां बाला सती जी का समस्त जीवन ही सेवामय था।

मां बाला सती जी विद्याध्ययन करने किसी स्कूल या विद्यालय नहीं गई। भक्ति संस्कार तो मां के जन्म से साथ थे । राम और ओम का महामंत्र एवं ज्ञान संतो से मिला। इस तरह मां बाला सती जी सर्वोच्च शिखर पर पहुंच गई। आत्मा का परमात्मा से मिलन हो गया। मां बाला सती जी का कहना था कि कलियुग में सच्ची सेवा और लगन से भगवान जल्दी प्रसन्न होते हैं।

एक समय जब हास्य – विनोद में भाभोसा के मुंह से ब्याह सम्बन्धी बोल निकले तो बालिका रूपकुंवर ने अपने मन की बात उनसे कह डाली। बालिका रूपकुंवर ने साफ शब्दों में आंख में आंसू भर कर कहा, चाहें कुछ भी हो, मैं इस प्रपंच में कभी नहीं पडूंगी।

मैने तो आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत ले रखा है। बाला सती जी को बचपन में ही सन्त गुलाबदास जी महाराज के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। बाला सतीजी ने सदैव सहर्ष उन्हें अपना गुरु स्वीकार किया।

बाला सती जी की सगाई और विवाह

बाला गांव में जोधा (राठौड़) राजपूतों का एक रावला है। इस जोधा परिवार में श्री चिमनसिंह जी के तीन पुत्र हुए श्री जालिमसिंह जी, श्री इंद्रसिंह जी और श्री झुंझारसिंह जी। झुंझारसिंह जी की सगाई सायर कुंवर (सुगन) पुत्री श्री लालसिंह जी के साथ हुई थी।

सायर कुंवर के निधन पर दादीजी के आग्रह पर बाई रूप कुंवर की सगाई श्री झुंझारसिंह जी से कर दी गई। झुंझार सिंह जी प्रथम विश्व युद्ध में भाग में भाग लेकर छुट्टी पर अपने गांव आए ही थे। वे सेना में कार्यरत थे।

रुपकुंवर को सोलह वा वर्ष चल रहा था। इनकी देह स्वर्णमय थी। सगाई का नाम सुनते ही सती मां उदासीन हो गई और बार बार अपने सांवरिया को याद करती और रो रो कर उनसे विनती करती कि अब तो लाज आपके हाथ है।

विवाह की तिथि नजदीक आती जा रही थी। रूपकुंवर ने अपने हाथ में कोई मेहंदी नहीं रचाई, रो रो कर आंखे सूज गई। परिवार को तो बाई के हाथ पीले करने थे।

वैशाख शुक्ला एकादशी संवत् 1976 , तदानुसार दिनांक 10 मई 1919 को बारात आ ही गई। बाला सती जी के जीवन में एकादशी एवं पुर्णिमा तिथि का काफी महत्त्व रहा है। सती मां के जीवन की कई महत्वपूर्ण घटनाएं एकादशी को ही घटी। निश्चित तिथि को रूपकुंवर को दुल्हन रूप में सजाया गया और चंवरी में बैठा दिया गया।

बाला सती जी का दुल्हन रूप अत्यन्त ही आकर्षण लिए था। लाल चुन्दरी में मां साक्षात् भगवती रूप लग रही थी। पंडित जी ने यथा सम्भव हथलेवा जुडाया कि यकायक श्री झुंझारसिंह जी को आघात सा लगा। हथलेवे की मेहंदी का स्पर्श होते ही वह सांसारिक जीवन सती के अपूर्व तेज को सहन न कर सकें।

चंवरी में ही अकस्ममात तेज बुखार ने आ जकड़ा व हाथों की मेहंदी छूट गई। इस तरह वो निर्जीव सी देहो का वैवाहिक कार्यक्रम निपटाया गया।

पति का महाप्रयाण

बाला सती जी अपने ससुराल आ गई पर दुल्हे राजा का बुखार बढ़ता जा रहा था। दुल्हन का तो अभी शादी का वेश भी देह से उतरा नहीं था कि पति मृत्यु शैय्या पर अंतिम सांसे ले रहे थे। बड़े बूढ़ों के आग्रह पर दुल्हन रूपकुंवर को पानी का गिलास देकर अपने सांसारिक पति के पास उनका मुंह देखने और बात करने को जबरन भेजा गया।

दुल्हन बाला सती जी ने कमरे में कदम रखा ही था कि झुझार सिंह जी ने हाथ जोड़कर क्षमा याचना की और कहा कि अपने रास्ते पर चलते रहो और बताया कि उन्होंने रूपकुंवर को साक्षात भवानी के रुप में देखा जिनके चारो और अग्नि थी उन्होंने दिव्यज्योति को अपने पास आने से रोका।

बाला सती जी ने सांसारिक पति को दूर से ही नमस्कार किया और पानी से भरे गिलास सहित वापस चली आई। सती मां का पति से यहीं प्रथम और अंतिम मिलन था।

जयेष्ठ माह की एकादशी, सूर्यवार, विक्रम संवत् 1978 तदानुसार दिनांक 25 मई 1919 को भरी दुपहरी में रूपकुंवर का सुहाग सूर्य सदा सदा के लिए अस्त हो गया परन्तु विवाह और वैधव्य दोनों ही अवस्थाओं में हर्ष – विषाद से निर्विकार रह सदैव की भांति भगवान के भजन में लीन रही।

साधना के सोपान पर

साधक में सांसारिक प्रपंच बाधक होते हैं। मन की एकाग्रता भंग करते हैं। दैव योग से सती मां रूपकुंवर को साधना का सुअवसर सुलभ हो गया। पति की मृत्यु के पश्चात बाला सती जी ने एक समय भोजन करना प्रारंभ कर दिया। इस प्रकार समय के साथ साथ मां की साधना उच्चतम शिखर पर बढ़ती गई।

सतीत्व का ज्वर

सतियाँ तो परम्परा से होती आई है, मैं कोई नया काम नहीं कर रहीं हूं। आपकों को तो खुश होना चाहिए कि आपके घर से कोई सती हो रही है। सती मां ने निर्भीकता से कहा।

बाला सती जी मां रूपकुंवर ने कोठार में स्नान कर हाथों में चंदन का मुठिया लेकर, तुलसी की माला धारण की तथा हाथ में नारियल और गीता लेकर हरिनाम का उच्चारण करते हुए गांव के बंसीवाला मन्दिर की ओर प्रस्थान किया। मंदिर में आकर मां ने प्रभु को साष्टांग दंडवत किया तथा माला, मुठिया, नारियल और गीता को उनके चरणों में रख दिया। फिर परिक्रमा कर श्मशान की ओर जाने लगीं। मगर सभी के आग्रह ने उन्हें रोक दिया।

बाला सती मां के अनुसार – वे कई जन्मों से सती हो रही है। एक जन्म में उनके श्राप से पूरा परिवार ही काल का ग्रास बन गया। सती मां ने पश्चाताप तो किया पर अब क्या हों ? सती मां के मुंह से श्राप निकल चूका था।

कहते है उसी का प्रायश्चित करने के लिए सती मां ने अनेक जन्म लिए है और हर जन्म में निरंतर सती हो रही है। इतना ही कहा कि सतियों का सत् खंडित करना कोई अच्छी बात नहीं। मनुष्य कुछ करे या न करें, प्रकृति तो अपना काम करती ही हैं।

बाला सती मां मन्दिर से घर लोट आई, लेकिन उन्होंने अन्न जल छोड़े छः माह भी न बीते थे कि एक अद्भुत घटना घट गई। मां का आसन था जिस पर घंटो, दिनों ही नहीं महीनों लगातार बैठ कर ध्यान पुजा में मगन रहती, एकादशी का दिन था। प्रातः काल की शुभ वेला में मां स्नान करके अपनी कोठरी में पधारी, ज्योहि मां ने कोठरी में पैर रखा, मां की गद्दी स्वतः ही जल उठी।

एक बड़ी ज्वाला निकली संपूर्ण कोठरी प्रकाशमय हो गई। मां ने साष्टांग दंडवत कर कहा कि एक ओर घड़ी टल गई। वह भविष्य में कभी भी आसन पर नहीं बैठेगी। उस गद्दी के जल जानें पर भी वहां कोई राख नहीं बची।

सती मां के दर्शन

बाला सती मां की साधना दिनोदिन उद्धर्वगमी होकर बढ़ने लगी और इसके साथ साथ उनकी ख्याति भी चारों दिशाओं में फैलने लगी। दूर दूर से लोग सती मां के दर्शनार्थ आने लगे।

बलि प्रथा की समाप्ति

सती मां का पीहर और ससुराल भक्तिभाव से सम्पन्न था मांस, मदिरा से दूर था लेकिन ससुराल में दशहरे पर बलि चढ़ाई जाती थी। मां ने सर्वप्रथम अपने रावले में ही इस प्रथा को बंद करवाया व अपने ही हाथो से इस स्थान पर सात्विक देव विराजमान किए। गांव के बंसीवाला मन्दिर का जीर्णोद्वार कराया। कृष्ण और राधा जी की सुंदर मूर्तियां स्थापित की। सती मां ने धीरे धीरे अपने पीहर और ससुराल का त्याग कर दिया।

ब्रह्मलीन

मां बाला सती जी सभी भक्तों को छोड़कर सदा के लिए 15, नवंबर 1986 को ब्रह्मलीन हो गई।

मां की कुटिया

बाला गांव को सिद्ध अवतारी योगिनी सती मां रूपकुंवर ने समस्त विश्व का अध्यात्मिक आकर्षण बना दिया। इस धाम में नदी के किनारे हरे भरे पेड़ो के झुरमुटो से झांकता हुआ एक साफ सुथरा कमनीय शांत आश्रम है जिसे सती मां की कुटिया के नाम से जाना जाता है।

इसी धाम में शक्ति की साक्षात अवतार, भक्त शिरोमणी, निराहरी साधिका पूजनीय सती मां के कुछ वर्षो पूर्व ही दर्शन हुआ करते थे। वहां अपने भक्तों का सैलाब सा उमड़ता था। यहां दूर दूर से श्रृद्धालु सती मां की जय जयकार करते आते व मां का आशीर्वाद प्रसाद पाकर स्वयं को भाग्यशाली समझते हुए यहां से विदा होते थे।

आपके अमूल्य सुझाव एवं क्रिया – प्रतिक्रिया स्वागतेय है |

सत्यव्रत रावत चूण्डा जी का अनुपम त्याग

मेवाड़ के ध्येय वाक्य ” जो दृढ़ राखे धर्म को , तिहि राखे करतार “, को चरितार्थ करते हुए यहां के वीर और वीरांगनाओं ने धर्म के लिए अनगिनत बलिदान दिए हैं। यह भूमि बलिदान और त्याग की रही है। ऐसा ही अनुपम त्याग जो विश्व में अनूठा उदाहरण हैं सत्यव्रत रावत चूण्डा का।

कविवर नाथूसिंह महियारिया के अनुसार – भारतीय संस्कृति के सरंक्षण में चूण्डा के त्याग की महिमा उन्हें भगवान से भी बड़ा बनाने वाली साबित हुई –

बीसनू तो छोटा हुआ , ले धरती बगसीस ।

चूंडो दे मोटो हुवो , अम्बर अड़ीयो सीस ।।

रावत चूण्डा का जन्म

रावत चूण्डा का जन्म मेवाड़ के महाराणा लाखा की रानी लखमावती से विक्रम संवत् 1436में हुआ। रानी लखमावती गागरोंन के खींची शासक विरमदे की पुत्री थी। इस रानी से उत्पन्न चूण्डा के राघवदेव , अज्जा , भीम , दूला और डूंगरसी पांच और भाई थे। रावत चूण्डा , महाराणा लाखा के ज्येष्ठ पुत्र होने से मेवाड़ के भावी उत्तराधिकारी थे।

रावत चूण्डा का जीवन वृतांत

महाराणा लाखा और रानी हंसाबाई

मेवाड़ के महाराणा लाखा की उम्र ढलने लगी थी। महाराणा लाखा के जयेष्ठ पुत्र चूण्डा तरुणाई छोड़ युवावस्था में प्रवेश कर रहे थे। ऐसे समय में मंडोवर ( मंडोर – मारवाड़ ) के रणमल , चूण्डा के लिए अपनी बहन हंसाबाई का सम्बन्ध लेकर चित्तौड़ पहुंचा। दरबार लगा। दस्तूर का नारियल हुआ।

उस समय महाराणा लाखा के मुंह से हंसी हंसी में निकल गया कि नारियल तो युवाओं के लिए ही आते हैं , हम जैसे वृद्धों को कौन पूछे । अपने पिता के ये बोल सुन युवराज चूण्डा ने रणमल से कहा कि यह दस्तूर आप मेरे पिता से कर दे , मैं इसे स्वीकार नहीं करूंगा।

राठौड़ रणमल ने कहा कि मैं आपके लिए यह दस्तूर लेकर आया हूं कि आप पाटवी (जयेष्ठ) कुंवर है आप मेवाड़ के भावी महाराणा है। मेरी बहन का विवाह आपसे करने से उससे जन्म लेने वाला पुत्र भी मेवाड़ का भावी स्वामी बनेगा लेकिन यदि मेरी बहन का विवाह महाराणा लाखा से होता है तो वह मेवाड़ का भावी स्वामी नहीं बनेगा। अतः मैं यह विवाह का प्रस्ताव आपके लिए ही लाया हूं।

रावत चूण्डा की भीष्म प्रतिज्ञा

मंडोर के राव रणमल के इस विवाह प्रस्ताव पर मेवाड़ के युवराज चूण्डा ने कहा कि मैं आपकी बहन से विवाह नहीं कर सकता । और मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि उससे उत्पन्न पुत्र ही मेवाड़ का स्वामी बनेगा।

युवराज चूण्डा की प्रतिज्ञा को सुन पूरा दरबार स्तब्ध ! दरबार में सन्नाटा। अपने पुत्र की इस भीष्म प्रतिज्ञा के आगे महाराणा लाखा की एक नहीं चली। और विवश होकर उन्हें वह विवाह का दस्तूर स्वयं के लिए स्वीकार करना पड़ा।

इस प्रकार रणमल की बहन का विवाह महाराणा लाखा के साथ हुआ और उससे मोकल का जन्म हुआ ।

युवराज चूण्डा के अनुपम त्याग के बारे में कविवर लिखते है कि

चंवरी चढ़ लाखो फिरे , फिरे बीनणी लार ।

चूण्डा री कीरत फिरे , सात समंदा पार ।।

जब एक ओर मंडोर में महाराणा लाखा विवाह मण्डप में दुल्हन के साथ फेरे ले रहे थे , तब ही दूसरी ओर परम त्यागी चूण्डा का सुयश सातों समुंद्रो को लाँघकर संपूर्ण विश्व में व्याप्त हो रहा था।

युवराज चूण्डा ने अपने लिए प्रस्तावित विवाह को तो नकारा ही , साथ साथ अपने राजसिंहासन के हक़ को भी छोड़ दिया । इतना ही नहीं , तदनंतर मंडोर के शासक राव रणमल पर विजय प्राप्त कर उससे विजित चित्तौड़ को भी पुनः अपने अनुज मोकल को दे दिया। ऐसे विलक्षण दानी चूण्डा पर तो अनेक दुर्ग निछावर है।

कुन्ती पुत्र पाण्डवों के राज्याधिकार की मांग के कारण महाभारत हुआ। और संपूर्ण वंश का नाश हो गया, जिससे हस्तिनापुर गौरवविहीन हुआ। वहीं वीर प्रसूता चित्तौड़ अपने लाडले सपूत चूण्डा के अनुपम राज्य त्याग के कारण यशोमंडित हैं।

चूंडा का त्याग उनके जीवन का परिस्थिति जन्य अथवा नाटकीय त्याग नहीं था। अपितु वह उनके व्यक्तित्व में समाया हुआ एक अपूर्व उज्ज्वल चरित्र था। इसी परिप्रेक्ष्य में कहना न होगा कि परमत्यागी चुंडा ने अपने अधिकार में आया हुआ चित्तौड़गढ़ का समस्त राज्य वैभव अपने अनुज मोकल को एक बार नहीं , दो दो बार प्रदान किया – पहली बार तो उन्होंने अपने पिता महाराणा लाखा के वीरगति प्राप्त होने पर और दूसरी बार तब , जब मंडोर के राव रणमल ने षड्यंत्र रचकर उसे हथियाना चाहा था , तब उसे मार कर।

निष्कर्ष ( Conclusion)

युवराज चूंडा का अपने लिए प्रस्तावित हंसाबाई में , पिता की भावना के अनुरूप , अपनी मां को देखकर उस प्रस्ताव को ठुकरा देना , कोई सामान्य त्याग नहीं है। मेवाड़ राजवंश में पैदा हुए सभी पाटवी राजकुमारों में चूंडा जी के व्यक्तित्व की विशेष गरिमा है। धन्य है ऐसे त्यागी , पितृभक्त , मेवाड़ के भीष्म , सत्यव्रत रावत चूंडा जो इतिहास में अमर हो गए।

परमवीर मेजर शैतानसिंह भाटी जिन्होंने मरते दम तक भारत की रक्षा कर वीरगति पाई

राजस्थान की भूमि सन्त , सती और सूरमा की भूमि रहीं हैं। इस गरिमामय धरा के शुरवीरो ने सदैव देश और धर्म की रक्षा के लिए शौर्यपरक बलिदान से राष्ट्रीय चेतना की मशाल को प्रदिप्त रखा है। ऐसे ही एक महान योद्धा भारतीय सेना के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित परमवीर मेजर शैतानसिंह भाटी ने अपने देश की रक्षार्थ बलिदान दे दिया। इस अतुलनीय बलिदान के लिए भारत सरकार ने सन् 1963 में उन्हें सेना के सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया।

जन्म और प्रारम्भिक जीवन

जन्म

मेजर शैतानसिंह भाटी का जन्म 1 दिसंबर 1924 को राजस्थान के जोधपुर जिले के बानासर गांव में एक क्षत्रिय परिवार में हुआ। बाल्यकाल से ही क्षत्रियोचित संस्कार एवं परिवार की सैनिक पृष्ठभूमि के कारण बचपन से ही सेना में जाकर देश की सेवा का संकल्प लें चुके थे।

इनके पिता सेना में लेफ्टिनेंट कर्नल हेमसिंह थे। उन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर से सम्मानित किया गया था। क्योंकि प्रथम विश्वयुद्ध में फ्रांस में लड़े थे।

शिक्षा

मेजर शैतानसिंह भाटी ने चौपासनी हाई स्कूल से अपनी मेट्रिक तक की शिक्षा के बाद जसवंत कॉलेज जोधपुर से सन् 1947 में स्नातक की शिक्षा पूरी की। स्कूल में फुटबॉल खिलाड़ी के रुप में अपने कोशल के लिए जानें जाते थे।

सैन्य जीवन

आजादी के बाद जोधपुर रियासत का भारत में विलय हो जाने से उन्हें कुमाऊं रेजिमेंट में स्थानांतरित कर दिया गया। कुमाऊं रेजिमेंट ने नागा हिल्स ऑपरेशन की सफलता के बाद 1961 में गोवा का भारत में सफलता पूर्वक विलय कराने के कारण मेजर पद पर 11 जून 1962 को पदोन्नत किया गया था।

भारत – चीन युद्ध

भारत सरकार के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु का चीन के प्रति नरम रुख के कारण उस समय चीनी सेना ने घुसपैठ कर भारतीय क्षैत्र हड़प लिया था। भारतीय सेना द्वारा घुसपैठ रोकने के लिए सरकार को एक प्रस्ताव भेजा जिसे जवाहर लाल नेहरू ने खारिज कर दिया।

देश में चीनी सेना के घुसपैठ के कारण सार्वजनिक आलोचना होने से नेहरू ने सेना की सलाह के खिलाफ फॉरवर्ड पॉलिसी नामक योजना को मंजूरी दी। जिसमें सीमा क्षैत्र में बहुत छोटी छोटी सैनिक पोस्टों की स्थापना के लिए कहा गया। इस पॉलिसी के कारण भारतीय सेना को खूब नुकसान उठाना पड़ा।

फॉरवर्ड पॉलिसी योजना लागू करना सीधे चीन को फायदा पहुंचाने वाला कदम था। इसका कारण एक तो चीन को भौगोलिक स्थिति का फायदा था दुसरा चीन के हमले के समय छोटी छोटी पोस्टों को बनाना असंगत था। चीन की विशाल सैन्य टुकड़ियों के आगे भारतीय सैन्य टुकड़ियां छोटी होने से सीधा फायदा चीन को मिला।

भारतीय सेना के आगाह के बावजूद नेहरू ने मान लिया था कि चीन हमला नहीं करेगा। लेकिन चीन ने हमला कर दिया। इस प्रकार भारत चीन युद्ध की शुरुआत हो गई। फिर भी नेहरू भारत चीनी भाई भाई का नारा ही देते रहें जिसकी कीमत हमारे बहादुर जवानों को बलिदान देकर चुकानी पड़ी।

रेजांग ला का युद्ध

भारत चीन युद्ध के दौरान कुमाऊं रेजिमेंट की 13 वी बटालियन को चुसुल क्षैत्र मे तैनात किया गया था। यह क्षैत्र दुर्गम है । और समुद्र तल से लगभग 16000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। मेजर शैतानसिंह भाटी की सी कमान रेजांग ला के इस दुर्गम क्षैत्र में थी।

18 नवंबर 1962 को सुबह चीनी सेना ने हमला कर दिया पर भारत की जांबाज उस छोटी सी टुकड़ी ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए चीन के कई सैनिक मार गिराए। चीनी सेना ने मशीनगन, मोर्टार और ग्रेनेड से हमला किया था।

चीनी सेना ने पुनः मोर्टार से हमले करने शुरू कर दिए और लगभग 500 सैनिको ने आगे बढ़ना शुरू किया। चीन के द्वारा सामने से किए गए हमले असफल होने के बाद लगभग 400 सैनिकों ने पीछे से हमला कर दिया। इसके साथ ही आठ वी प्लाटून पर भी मशीन गन और मोर्टार से तार की बाड़ के पीछे से हमला कर दिया।

सातवी प्लाटून पर 120 चीनी सैनिकों ने पीछे से हमला किया लेकिन भारतीय सेना ने तीन इंच मोर्टार के गोले से मुकाबला किया और कई चीनी सैनिकों को मार गिराया। जैसे ही अंतिम बीस सैनिको ने अपनी खाइयों बाहर निकल कर सामने से लड़ाई लड़नी शुरू की लेकिन चीनी सेना के अतिरिक्त जवानों ने घेर लिया।

चीनी सेना को अपेक्षा से अधिक नुकसान उठाना पड़ा। मेजर शैतानसिंह भाटी तीन तरफ से घिर चुके थे। फिर भी हौसला बुलंद था।

अचानक मेजर शैतानसिंह के कंधे में गोलियों का एक ब्रस्ट लगा। अपने जख्म की परवाह किए बिना वह युद्ध का संचालन करते रहें। कंपनी हवलदार मेजर ने उनसे पीछे हटने का आग्रह किया तो उन्होंने स्पष्ट इनकार कर दिया। मौके पर उपस्थित इस ग्रुप की गतिविधियों पर दुश्मन घात लगाए बैठा था।

मेजर शैतानसिंह भाटी को दुसरा ब्रस्ट पेट में लगा तो दो जवानों ने उन्हें कंपनी बेस पर ले जानें का प्रयास किया। पूरा ग्रुप क्रोस फायर में फंस गया। मेजर शैतानसिंह भाटी इस खतरे को भांप गए। उन्होंने घटनास्थल पर मौजूद सैनिक को आदेश दिया कि वे अपनी रक्षा करे। मै इनको आगे बढ़ने से रोकता हूं।

मेजर शैतानसिंह भाटी बुरी तरह घायल होने के बाद भी मशीनगन से चीनी सैनिकों से लड़ते रहे। आखिर मरुधर के इस लाल ने भारत माता के चरणों में अपने प्राणों की आहुति दे दी। इसके बाद बर्फ गिरने से उनकी पार्थिव देह तीन माह बाद प्राप्त हो सकी। इनके पार्थिव शरीर को उनके पैतृक गांव लाया गया और सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।

सर्वोच्च सैन्य सम्मान

मेजर शैतानसिंह भाटी को साहस , रणकोशल , कर्त्तव्य परायणता तथा अपूर्व शौर्य के लिए परमवीर चक्र से (मरणोपरांत ) सम्मानित किया गया।

आखिरी जवान , आखिरी गोली के आदेश पर खरी उतरने वाली ” सी कम्पनी ” को आठ वीरचक्र तथा चार सेना मेडलो से नवाजा गया। और 13 कुमाऊं रेजिमेंट को ” बैटल ऑनर ऑफ रेजांगला ” तथा ” थियेटर ऑनर लद्दाख 1962 ” से अलंकृत किया गया ।

इसे भी पढ़े –

हिन्दू सम्राट – छत्रपति शिवाजी महाराज

छत्रपति शिवाजी महाराज – अप्रतिम शौर्य , अद्भुत साहस , अद्वितीय बुद्धिमता , प्रशंसनीय चरित्रबल , श्रेष्ठ राजनीतिक चतुरता आदि गुण छत्रपति शिवाजी महाराज के चरित्र की अनन्य विशेषताएं हैं। उन्होंने अपने बल पर एक स्वतंत्र राज्य की स्थापना की। और साबित कर दिया कि सिंह का न तो कोई अभिषेक करता है और न ही कोई संस्कार, वह तो अपने पराक्रम से वनराज की पदवी प्राप्त करता है।

छत्रपति शिवाजी महाराज को एक साहसी चतुर एवम् नीतिवान हिन्दू शासक के रुप में सदा याद किया जाता रहेगा। यद्यपि उनके साधन बहुत ही सीमित थे तथा उनकी समुचित ढंग से शिक्षा दीक्षा भी नहीं हुई थी, तो भी अपनी बहादुरी, साहस एवम् चतुरता से उन्होंने औरंगजेब जैसे क्रूर मुगल को कई बार धूल चाटने पर मजबूर कर दिया।

छत्रपति शिवाजी महाराज कुशल प्रशासक होने के साथ साथ एक समाज सुधारक भी थे। उन्होंने कई लोगों का धर्म परिवर्तन करा कर उन्हें पुनः हिंदू धर्म में घर वापसी करवाई। शिवाजी ने एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य की स्थापना करके इतिहास में एक सर्वथा नवीन अध्याय की स्थापना की। अपने इस सफल प्रयास के माध्यम से उन्होंने सिद्ध कर दिखाया कि धरती क्षत्रियों से खाली नहीं हुई है।

मेंवाड़ की वंश परम्परा

छत्रपति शिवाजी महाराज ने मेवाड़ के ध्येय वाक्य ” जो दृढ़ राखे धर्म को तीही राखे करतार ” और शास्त्रोक्ति ” धर्मो रक्षती रक्षित: ” को चरितार्थ किया । और हिंदू सम्राट के नाम से इतिहास में अमर हो गए।

मेवाड़ राजपरिवार के सज्जन सिंह जी सन् १३०३ के लगभग चित्तौड़ को छोड़ दक्षिण की ओर चले गए थे उनकी पांचवी पीढ़ी में उग्रसेन का जन्म हुआ जिनके कर्ण सिंह तथा शुभकृष्ण नामक दो पुत्र हुए , इन्ही शुभकृष्ण के वंशजों की उपाधि भोंसले है। इन्ही शुभकृष्ण के पौत्र बाबाजी भोंसले हुए जिनके पौत्र का नाम शाहजी भोंसले था।

छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म , बाल्यकाल एवं संरक्षणता

छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म शिवनेर के किले में वैशाख शुक्ल द्वितीया संवत् १५४९ (1549) तदानुसार गुरुवार 6 अप्रैल , 1627 को माता , के गर्भ से हुआ। इनके पिताजी का नाम शाहजी भोंसले था। शिवाजी का बाल्यकाल कोई सुखद नहीं कहा जा सकता। उन्हें अपने पिताजी का सरंक्षण भी प्रायः नहीं के बराबर मिला।

ऐसी परिस्थितियों में भी उनके द्वारा एक स्वतंत्र साम्राज्य की स्थापना निश्चय ही एक आश्चर्य कहा जा सकता हैं। इस आश्चर्य के पीछे जिन दो महान विभूतियों का हाथ रहा, वह माता जीजा बाई तथा दादाजी कोण्डदेव । इन्ही दो मार्गदर्शकों की छत्रछाया में शिवाजी का बाल्यकाल बीता एवं भावी जीवन की नींव पड़ी।

माता जीजा बाई लुकजी जाधवराव की सुपुत्री थीं उनकी धमनियों में देवगिरी के यादव शासकों का रक्त था। जिस समय शिवाजी गर्भ में थे शाहजी ने सूपा के मोहिते परिवार की कन्या तुकाबाई से दुसरा विवाह कर लिया था। ऐसी विकट परिस्थिति में भी जीजा बाई अपने पिता के साथ न जाकर शिवनेर के किले में जो भौसलो की जागीर था चली गई।

वहा शिवनेर के किले में ही शिवाजी का जन्म हुआ। जीजाबाई के ज्येष्ठ पुत्र सम्भाजी पिताजी की सहायता करने लगे। शाहजी मलिकअम्बर के साथ कई वर्षो से मुगलों के विरुद्ध लड़ रहे थे। दौलताबाद के किले पर मुगलों का अधिकार हो जानें पर मुगल सम्राट ने शाहजी तथा उनके परिवार को पकड़वाने की भरसक प्रयास किया।

माता जीजाबाई शिवाजी के साथ शिवनेर के किले में रह रही थी। लेकिन शिवाजी को पकड़ने का प्रयास विफल रहा। इस कठिन परिस्थिति में भी उन वीर माता ने अपने पुत्र की सैनिक शिक्षा में कमी नहीं आने दी ।

पूना प्रस्थान

शिवाजी के जन्म के समय शाहजी निजामशाह की ओर से मुगलों के विरुद्ध लड़ रहे थे। जनवरी 1636 में शाहजंहा स्वयं दक्षिण भारत आया। ठीक इसी समय निजामशाही राज्य समाप्त हो गया। मई में मुगल सम्राट तथा बीजापुर की सल्तनत में संधि हो गई। इसके पश्चात शाहजी भी बीजापुर की सेवा में चले गए। उनकी इन सेवाओं के बदले में उन्हें गोदावरी नदी के दक्षिण में एक जागीर दे दी गई।

यह घटना अक्टूबर 1636 की है। इन संघर्षों के समय में भी शाहजी ने पूना की जागीर पर अपना अधिकार सुरक्षित रखा था। बीजापुर जाने से पहले शाहजी ने जीजाबाई तथा शिवाजी को पूना भेज दिया। पूना की जागीर का प्रबंध करने के लिए उन्होंने दादाजी कोण्डदेव को नियुक्त कर दिया।

इस समय शिवाजी मात्र 7 – 8 वर्ष के थे। दादाजी कोण्डदेव जनता में एक लोकप्रिय व्यक्ति थे। उनकी कर्त्तव्य निष्ठा , देश भक्ति तथा निर्लिप्तता सर्वथा अनुपम थी। वह शिवाजी को जिस रूप में देखना चाहते थे उसके लिए कोई भी प्रयत्न करने में कुछ भी कमी नहीं की ।

यद्यपि उनकी तुलना मौर्यवंश के संस्थापक आचार्य चाणक्य से तो नहीं की जा सकती , तथापि उनका अवदान भी इतिहास में अपना उदाहरण है।

छत्रपति शिवाजी महाराज का विवाह

माता जीजाबाई ने सन् 1640 में फाल्टन के निंबालकर परिवार की कन्या सईबाई से उनका विवाह कर दिया । विवाह के समय शिवाजी की उम्र लगभग 12 – 13 वर्ष की थी।

बीजापुर दरबार में

जब शाहजी आदेशानुसार बीजापुर दरबार में गए तो वह अपने पुत्र शिवाजी को लेकर गए। वहा जाने पर सभी को माथा भूमि को लगा सजदा करना पड़ता था। शाहजी द्वारा किया गया सजदा शिवाजी को अपमान पूर्ण लगा। शिवाजी ने केवल मराठा ढंग से साधारण नमस्कार किया।

शिवाजी के इस व्यवहार को बादशाह ने अपने लिए अशिष्टता और अपमान जनक समझा। शिवाजी ने मुड़कर शाहजी की ओर देखा और कहा ” बादशाह मेरे राजा नहीं है मैं इनके आगे सिर नहीं झुका सकता , मेरा सिर माता तुलजा भवानी और आपकों छोड़कर अन्य किसी के आगे नहीं झुक सकता । “

दरबार में सनसनी फेल गई। शाहजी ने सहमते हुए प्रार्थना की क्षमा करें। यह अभी नादान है। और शिवाजी को घर जानें की आज्ञा दे दी। शिवाजी निर्भीकतापूर्वक दरबार से घर चले गए।

एक बार जब एक कसाई एक गाय को वध के लिए ले जा रहा था यह देखकर शिवाजी क्रोधित हो गए। उन्होंने म्यान से तलवार निकाल कर कसाई का सिर उड़ा दिया। इस मामले की जांच हुई। अतः भावी विपत्ति से बचने के लिए उन्हें शीघ्र ही बीजापुर छोड़ देना पड़ा।

स्वतंत्र हिन्दवी स्वराज का संकल्प

छत्रपति शिवाजी महाराज धीरे धीरे अपने कार्यों और उत्तरदायित्वों को समझने लगे। उनके विचारों में भी अवस्था के साथ ही परिपक्वता आती गई। धीरे धीरे शिवाजी ने अपने बाल्यकाल के मित्रों का एक संगठन बना लिया। यह संगठन बलिदान करने को भी तैयार रहता। शिवाजी स्वतंत्र राज्य की स्थापना करने के लिए कटिबद्ध हो गए।

अपने लोगों का उत्साह बढ़ाने के लिए मुसलमानों के अत्याचारों का वर्णन करते हुए शिवाजी कहते – ” विदेशी मुसलमान हमारे देश और धर्म पर अत्याचर कर रहे हैं। क्या इन अत्याचारों का बदला लेना हमारा धर्म नहीं। “ इन आक्रांताओ के दिए हुए पुरुस्कारों तथा अपनी पैतृक संपत्ति से ही हम क्यों संतुष्ट रहे। हम हिन्दू हैं , यह सारा देश हमारा है फिर भी इस पर मुगलों का शासन है। वे हमारे मंदिरों को अपवित्र करते हैं। मूर्तियों को तोड़ते हैं। हमारे धन को लूटते हैं। हमारे देशवासियों को बलात मुसलमान बनाते हैं और गाय की हत्या करते हैं। अब हम इस व्यवहार को सहन नहीं करेंगे।

हमारी भुजाओं में बल है। अपने पवित्र धर्म की रक्षा के लिए अब हमें तलवारें खींच लेनी होगी। अपनी जन्मभूमि को स्वतंत्र करेंगे। अपने प्रयासों से नया हिंदवी स्वराज बनाएंगे। हम अपने पूर्वजों के समान ही वीर और योग्य है यदि हम इस पावन कार्य को प्रारंभ करे तो निश्चय ही ईश्वर हमारी सहायता करेगा । “

शिवाजी के इन शब्दों को सुनकर उनके मित्रों मे जोश भर गया एवम् मावल की बारह घाटियों को अपने पूर्ण अधिकार में ले लिया। शीघ्र ही कोढाना दुर्ग पर भी अपना अधिकार करके उसका नाम बदलकर सिंहगढ़ रख दिया । इस समाचार के बीजापुर पहुंचने पर शाहजी को दरबार से हटा दिया गया।

खण्डोजी और बाजी घोरपड़े को शिवाजी और कोण्डदेव के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिए आदेश दिया । लेकिन वह भी शाहजी के परम मित्र एवम् शिवाजी के प्रबल समर्थक थे इसलिए उन्होंने इस विषय में कोई कार्यवाही नहीं की ।

अपनी सफलता से शिवाजी का उत्साह बढ़ा । अतः 30 मार्च 1645 के शुभ दिन उन्होंने स्वतत्र हिंदवी स्वराज की स्थापना करने का व्रत लिया। इसके बाद उन्होंने अपनी शासनीय मुहर चलाई। शासन का संचालन करने के लिए नए पदों का सृजन और उन पर नियुक्तियां की ।

सर्वप्रथम उन्होंने आसपास के किलो को अधिकार में कर लेने का निर्णय किया और कुछ ही समय में तोरण दुर्ग चाकण पर अधिकार कर लिया। शिवाजी ने तोरण दुर्ग की मरम्मत का कार्य भी प्रारंभ कर दिया । इसी मरम्मत कार्य में खुदाई होने पर उन्हें पूर्वोक्त गढ़ा धन मिला। जिससे शिवाजी की सभी समस्याओं का समाधान हो गया।

छत्रपति शिवाजी महाराज ने विशाल मात्रा में अस्त्र शस्त्र आदि खरीदे तथा एक नए किले का निर्माण कार्य प्रारंभ कर दिया । यह किला तोरण दुर्ग से तीन मील दूर दक्षिण पूर्व में मौरबुध नामक पहाड़ी पर बनाया गया।

सन् 1648 में शिवाजी ने पुरंदर के किले पर भी अधिकार कर लिया । 25 जुलाई 1648 को बीजापुर के सुल्तान द्वारा शाहजी बंदी बना लिए गए। इसके तुरन्त बाद बीजापुर की एक सेना सिंहगढ़ पर आक्रमण करने के लिए भेजी गई। भीषण युद्ध हुआ और बीजापुर की सेना परास्त हुई।

इस विजय से बीजापुर के शासक को छत्रपति शिवाजी महाराज की शक्ती का परिचय मिल गया। इधर शाहजी के ज्येष्ठ पुत्र सम्भाजी ने बंगलौर के किले पर अधिकार कर लिया। शिवाजी तथा संभाजी जैसे दो वीर पुत्रों के पिता शाहजी के साथ सुल्तान अधिक कठोरता नहीं कर सका।

माता जीजाबाई ने अपने पति की मुक्ति के लिए शिवाजी को दोनों किलों को बीजापुर सोपने की सलाह दी, माता की परामर्श के अनुसार दोनों दुर्गों को बीजापुर में दे देने पर लगभग दस माह बाद 16 मई 1649 को शाहजी मुक्त कर दिए गए।

इसके बाद छत्रपति शिवाजी महाराज ने सूपा दुर्ग पर (1649 – 1652 के मध्य) अधिकार कर लिया । इस प्रकार चाकन से लेकर नीरा नदी तक के क्षैत्र में शिवाजी का अधिकार हो गया एवम् स्वतंत्र राज्य की घोषणा कर दी। शिवाजी अपने जीवन के लगभग पच्चीसवें वर्ष में ही एक स्वतंत्र शासक बन गए।

शिवाजी की शक्ति का वर्णन करते हुए इतिहासकार डफ लिखता है – ” उन्होंने चीते जैसी सावधानी से इस क्षैत्र को अपने पंजों में जकड़ लिया था। वह तब तक पहाड़ियों में ही अपनी शक्ति एकत्र करते रहें , जब तक उन्होंने यह नहीं समझ लिया कि मैं अब पूर्णरूप से सुरक्षित हूं। “

छत्रपति शिवाजी की बढ़ती शक्ति को देखकर मावल के अधिकांश जागीरदारों ने शिवाजी के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया था। इसके बाद जावली को अपने अधिकार में ले लिया।

सन् 1657 में शिवाजी ने अपनी कार्यवाही तेज कर दी , तो औरंगजेब का ध्यान आकृष्ट होना स्वाभाविक था। अब शिवाजी ने मुगल साम्राज्य को चेतावनी देना उचित समझा। अतः सन् 1657 में जावली पर अधिकार कर लेने के बाद उन्होंने ग्रीष्म ऋतु में मुगलों द्वारा शासित जुन्नार तथा अहमदनगर पर धावा बोलकर उन्हें लूट लिया।

शिवाजी के गुप्तचरों ने सूचना दी कि बीजापुर के शासक द्वारा मूल्ला अहमद को आज्ञा दी गई कि वह कल्याण से एकत्रित समस्त धनराशि को बीजापुर पहुंचाए। इसके लिए सशस्त्र रक्षक दल का प्रबंध किया गया था। लेकिन शिवाजी ने इस कोष को लूटने के लिए योजना बनाकर दो दलों का गठन किया।

योजना सफल रहीं और कोष को लूटकर एक दल राजगढ़ दुर्ग गया तथा कल्याण पर भी अधिकार हो गया। दुसरे दल ने भिवन्डी पर अधिकार कर लिया।

इस विजय के बाद कल्याण उत्तर दक्षिण में स्थित किलो पर भी अधिकार कर लिया। चोल , तले , घासले , रामची , लोहगढ़ , कंगोरी , तुरंगतिकोन आदि सभी थोड़े ही समय में अधिकार मे आ गए। सन् 1657 के अक्टूबर तक पूरे कोंकण में शिवाजी का अधिकार हो गया।

कोंकण अधिकार में लेने के बाद समुद्रतट पर वसई से राजापुर तक एक त्रिभुजाकार क्षैत्र में शिवाजी का राज्य स्थापित हो गया।

मार्च 1659 को कुदाल से यूरोप की बनी हुई एक कृपाण खरीदी जिसे उन्होंने भवानी कृपाण का नाम दिया। उन्होंने नौसैनिक बेड़े का गठन किया इसके लिए उन्होंने विजय दुर्ग नामक एक नाविक किले का निर्माण करवाया। सन् 1660 में एक नौसैनिक किला स्वर्ण दुर्ग बनाया गया।

सन् 1664 में तीसरा नौसैनिक किला सिन्धु दुर्ग पर बनाया गया। सन् 1680 में एक बहुत बड़ा नौसैनिक अड्डा कोलाबा में बनाया।

शिवाजी ने पन्हाला , खेलना , रंगना , वसंतगढ आदि छोटे छोटे दुर्गों पर अधिकार कर लिया। खेलना का नया नाम विशालगढ़ रखा गया ।

उज्ज्वल चरित्र

छत्रपति शिवाजी महाराज के उज्जवल चरित्र के विषय में कल्याण की एक घटना प्रसिद्ध है। जब आबाजी सोनदेव कल्याण के राज्यपाल बनाए गए तो वहां के पूर्व राज्यपाल की अप्रतिम सुन्दर पुत्रवधु को उपहार स्वरूप शिवाजी के पास पूना भेज दिया। उस स्त्री का पूर्ण सम्मान करते हुए शिवाजी ने कहा – ” आह कितना अच्छा होता यदि मेरी मां भी आप के समान सुन्दर होती ।” और उससे क्षमा मागते हुए पूरे सम्मान के साथ उसके घर भेज दिया।

आबाजी एवं समस्त अधिनस्थ कर्मचारियों को चेतावनी दी गई कि वे भविष्य में ऐसी गलती कभी न करें तथा प्रत्येक पर स्त्री को मां के समान आदर दे।

धोखेबाज अफजल खां को बाघनखे से चीर डाला

4नवम्बर , 1656 को बीजापुर के सुल्तान मुहम्मद आदिलशाह की मृत्यु हो जानें से बीजापुर राज्य लगभग छिन्न भिन्न हो गया। सुल्तान की बड़ी बेगम अपने अल्पव्यसक पुत्र के नाम पर शासन का संचालन कर रही थी। मराठा प्रदेश पर शिवाजी ने अधिकार कर लिया था।

शिवाजी ने बीजापुर पर आक्रमण तेज कर दिए। शिवाजी को रोकने के लिए बेगम ने अफजल खां को एक बड़ी सेना लेकर शिवाजी को जीवित या मृत बंदी बना लिए जाने के लिए भेजा। अफजल खां पूर्व सुल्तान का अवैद्य पुत्र था। वह कर्नाटक के कई युद्धों में भाग ले चूका था।

योजनानुसार प्रतापगढ़ किले के नीचे अफजल खां और शिवाजी का मिलना तय हुआ। वह शिवाजी को धोखे से मारना चाहता था। पूर्व निर्धारित शर्तो के अनुसार शिवाजी मिलने के स्थान पर कोई सेवक या स्वयं कोई शस्त्र नहीं रख सकते थे।

शिवाजी ने अफजल खां से मिलने से पूर्ण कुलदेवी भवानी की पुजा की । उन्होंने ऊपर पहने वस्त्र के अंदर कवच, सिर में पगड़ी के नीचे लोहे का टोप, हाथों में बाघनखे पहने जो सामान्यतया दिखाई नहीं पड़ते थे। एक बाह में छोटी सी कटार छिपा ली गई एवम् मां भवानी को साष्टांग प्रणाम किया और उनका आशीर्वाद लेकर चल पड़े।

अफजल खां निर्धारित स्थान पर पहले से पहुंच गया था। अफजल खां अपने स्थान से उठा, उसने शिवाजी को अपने सीने से लगा दिया एवम् बाए हाथ से शिवाजी की गर्दन दबोच ली तथा दाहिने हाथ से जैसे ही तलवार निकालने लगा, लगा शिवाजी ने बड़ी सूझबूझ से काम लिया । अपने बाघनखे से उसका पेट फाड़ डाला और आंते निकाल दी । इसके बाद अफजल खां के अंगरक्षक सामना करने को आए लेकिन उन्हें भी मार दिया।

इसके बाद शिवाजी ओरंगजेब ने शाइस्ता खां के नेतृत्व में सेना भेजी जिसका शिवाजी ने सामना किया एवम् विजय प्राप्त की।

राजा जयसिंह से सामना

छत्रपति शिवाजी महाराज के बढ़ते प्रभाव को देखकर औरंगजेब ने राजा जयसिंह को भेजा । सूरत पर हुई लूट से औरंगजेब और भी क्रोधित हो गया। दिलेर खां और राजा जयसिंह औरंगजेब के योग्यतम और विश्वास पात्र व्यक्ति थे।

जयसिंह को मुगल दरबार में शाहजादो के समान सम्मान प्राप्त था। 30 सितंबर , ,1664 को अपने जन्मदिन के अवसर पर औरंगजेब ने जयसिंह को विशेष पोशाक से सम्मानित कर शिवाजी के विरुद्ध भेजर। जयसिंह ने विशाल सेना के साथ दक्षिण को प्रस्थान किया।

शिवाजी ने भी संकट की स्थिति को देखकर पुरन्दर में संधि की। शिवाजी जयसिंह के साथ हुई संधि का पालन करने के लिए औरंगजेब के पास जानें की तैयारी करने लगे।

छत्रपति शिवाजी महाराज को अभी तक औरंगजेब पर पूरा विश्वास नहीं था। शिवाजी ने मुगल दरबार में स्वयं की जगह अपने पुत्र को भेजा। लेकिन संधि की शर्तो के अनुसार एक बार शिवाजी को भी औरंगजेब से मिलना था। जयसिंह ने उन्हें वचन दिया कि मुगल राजधानी में वह स्वयं (जयसिंह) तथा उनका ज्येष्ठ पुत्र दोनों उनकी सुरक्षा का उत्तरदायित्व लेंगे। इसके लिए उन्होंने शिवाजी को लिखित प्रतिज्ञा भी दी।

जब शिवाजी मुगल दरबार में गए तो उनका उचित सम्मान न हुआ । इससे शिवाजी दरबार से चले आएं लेकिन बाद में शिवाजी को आगरा में बंदी बना लिया गया ।

इसके बाद शिवाजी अपनी नीति के तहत मुक्त हो गए और संन्यासी के वेश में पच्चीस दिन बाद 13 सितंबर , 16660 को अपनी राजधानी राजगढ़ पहुंचे। वे अपनी मां जीजाबाई से मिले। स्वतंत्र प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। उनके आने के उपलक्ष्य में उनके सभी किलो से तोप ध्वनियों से इसकी सूचना दी गई। समस्त राज्य में उत्सव जैसा माहौल था।

प्रबल शक्तिशाली मुगल साम्राज्य के सारे साधन भी शिवाजी को बंदी बनाने में सफल नहीं हो सके। सन् 1670 के प्रारंभ में शिवाजी ने मुगलों के विरुद्ध पुनः खुले रूप में युद्धों का शंखनाद कर दिया।

औरंगजेब का फरमान

औरंगजेब ने 9 अप्रैल , 1669 को एक आदेश निकाला – ” हिन्दुओं के समस्त विद्यालय तथा मन्दिर गिरा दिए जाए और उनकी धार्मिक शिक्षा तथा प्रथाओं का दमन किया जाए।” इसके लिए औरंगजेब ने एक विभाग भी बनाया जो कि हिन्दुओं के मंदिरों , विद्यालयों को भूमिसात करने , उन पर जजिया कर लगाना , उन्हें राजकीय सेवाओं से पृथक करना और उनके त्यौहार आदि पर रोक लगाना आदि घृणित कार्य करे।

सर्वप्रथम 4 दिसम्बर , 1669 को उसकी आज्ञा से इतिहास प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर तोड़ डाला। मथुरा के केशवराज मन्दिर के साथ भी यही हुआ। मथुरा का नाम बदलकर इस्लामाबाद कर दिया। उज्जैन तथा अहमदाबाद में भी ऐसा ही किया। आमेर के मन्दिर 1680 में नष्ट कर दिए।

जब वह प्रथम बार दक्षिण भारत का राज्यपाल था तो 1644 में उसने अहमदाबाद के प्रसिद्ध चिन्तामणि मन्दिर में गाय मारकर उसे मस्जिद में परिवर्तित कर दीया था।

अतः हिंदू धर्म के रक्षक छत्रपति शिवाजी महाराज इस अन्याय के विरोध में मुगलों टक्कर लेने के लिए तैयार थे। इसी कड़ी में शिवाजी ने औरंगजेब के अधीन बरार को लूटकर इसकी शुरुआत कर दी। 1200 राजपूत सैनिकों के बलिदान से महत्वपूर्ण सिंहगढ़ पर पुनः अधिकार कर लिया।

इसके बाद पुरुन्दर , माहुली , जुन्नार , परेंडा , अहमदनगर आदि पर भी शिवाजी का अधिकार हो गया।

सन् 1670 में औरंगजेब की सेना को सूरत में दूसरी बार लुटा। 5 जनवरी , 1671 को शिवाजी ने सल्हेर दुर्ग पर अधिकार कर लिया। पूना और नासिक के जिले बिना किसी अन्य संघर्ष के ही शिवाजी के अधिकार में आ गए।

सालहेर पराजय का समाचार सुनकर तीन दिन तक औरंगजेब दरबार में भी नहीं आया। और कहा – ” लगता है अल्लाह मुसलमानों से उनका राज्य छीनकर एक काफिर को देना चाहता है यह सब देखने से पहले मैं मर क्यों न गया।

सूरत से मुंबई की ओर धरमपुर और जोहार नाम के दो छोटे छोटे राज्य भी जून 1672 में शिवाजी के अधिकार में आ गए।

छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक महोत्सव

ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी (6 जून , 1674 ) को विधि विधान से एक स्वतंत्र राजा के रुप में अभिषेक संस्कार सम्पन्न हुआ । सभी प्रशासकीय पदो का संस्कृत में नामकरण किया। शिवाजी ने अपने राज्याभिषेक से एक नवीन संवत् राजशक का प्रचलन आरम्भ किया।

इस भव्य राज्याभिषेक महोत्सव के बाद 17 जून 1674 को माता जीजाबाई का देहान्त हो गया। इसके बाद पुनः शुभ मुहूर्त में 24 सितम्बर 1674 को पुनः एक लघु अभिषेक सम्पन्न कराया गया। छत्रपति शिवाजी महाराज की नीतियों से जागीरदार , सामंत तथा जनता सभी ने उनके शासन को हृदय से स्वीकार किया।

छत्रपति शिवाजी महाराज का महाप्रयाण

छत्रपति शिवाजी महाराज,

इन दिनों शिवाजी महाराज अस्वस्थ्य चल रहे थे। उन्हें 23 मार्च को ज्वर आया और 3 अप्रैल 1680 को एक हिंदू सम्राट छत्रपति शिवाजी महाराज का महाप्रयाण हुआ । मराठा राज्य ही नहीं अपितु सम्पूर्ण हिन्दू शोक में डूब गया ।

आपके अमूल्य सुझाव , क्रिया – प्रतिक्रिया स्वागतेय है |

विजयादशमी ( दशहरा ) – शौर्य पर्व

विजयादशमी (दशहरा)- शौर्य पर्व का प्रारम्भ त्रैलोक्य विजेता रावण पर भगवान श्री राम की विजय स्मृति अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए हुई। किन्तु कालान्तर में यह शौर्य और विजय प्राप्ति का आधार बनने वाले शस्त्रों की पुजा में परिवर्तित होता चला गया।

नवरात्रि के नौ दिनों तक देवी भगवती के नौ स्वरूपों की आराधना के बाद दशमी तिथि को विजयादशमी या दशहरा पर समस्त सिद्धियां प्राप्त करने के लिए पवित्र माने जाने वाले शमी के वृक्ष और देवी अपराजिता के अलावा अस्त्र – शस्त्रों का पूजन भी किया जाता है। विजयादशमी को नीलकंठ पक्षी के दर्शन करना भी अति शुभ माना गया है।

विजयादशमी या दशहरा पर भगवान शिव से शुभफल की कामना एवम् नीलकंठ के दर्शन करने से जीवन में भाग्योदय, सुख समृद्धि एवं धन धान्य की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथा के अनुसार पवनसुत हनुमान जी ने भी श्री रामजी की पत्नी सीता माता को शमी के समान पवित्र कहा था।

विजयादशमी या दशहरा के दिन घर के पूर्व दिशा में में या घर के मुख्य स्थान पर शमी की डाली प्रतिष्ठित करके उसका विधि पूर्वक पूजन करने से घर परिवार में खुशहाली आती है। शनि ग्रह के अशुभ प्रभावों से मुक्ति मिलती है और मानव के सभी पापों और दुखों का अंत होता है। विवाहित महिलाऐं अखंड सौभाग्यवती होती है।

धर्म की अधर्म पर विजय –

सैकड़ों वर्षों से सामान्य जन जहां रावण , कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतलो को रामवेशी व्यक्ति से संहार करवा कर उस काल की स्मृति को अक्षुण्ण रखते है, वहीं क्षत्रिय शौर्योल्लास में इस पर्व की अभ्यर्थना करता है। लंकाधिपति रावण को काम , क्रोध , लोभ और मोह का प्रतीक माना जाता है। विजयादशमी (दशहरा) बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जानें वाला पर्व है।

मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने रावण का वध करके इस जगत को यह संदेश दिया कि धर्म की अधर्म पर सदैव विजय होती है। जिस प्रकार रावण शक्तिशाली एवम् विद्वान होते हुए भी अनाचार के कारण उसका पतन हुआ उसी प्रकार मानव के भीतर बुराइयां होने से उसका पतन निश्चित है। मानव के बुरे कर्म एक न एक दिन उसके अंत का कारण अवश्य ही बनते है। इसलिए हमें कभी भी सच्चाई और अच्छाई के मार्ग से हटना नहीं चाहिए। विजयादशमी या दशहरा धर्म की अधर्म पर विजय का पर्व है।

आयुध पूजन –

सदियों से राजमहल से लेकर प्रत्येक क्षत्रिय के पूजाघर तक समान रूप से श्रृद्धा से मनाया जानें वाला शौर्य पर्व आज भी उसी निष्ठा व समर्पण भाव से मनाया जाता है।

आज भी घर घर में मनाए जाने वाला क्षत्रिय के इस सबसे बड़े त्यौहार पर शस्त्र पूजन पारंपरिक विधि से सम्पन्न होता है। शस्त्र पूजन में उपलब्ध शस्त्रोंनुसार – तलवार , खांडा , कटार , धनुष , तरकश , गुर्ज , ढाल , बल्लम , भाला , फरसा , त्रिशूल , बड़ी नाल की बंदूक , चंवर , निशान और नगाड़ा आदि पूजन में सम्मिलित किए जाते है।

इसके बाद अश्वपूजन होता है जिसमें अश्व का भी पारंपरिक विधि से पूजन होता है। यह पर्व प्रत्येक क्षत्रिय के घर श्रृद्धा से मनाकर हमारी परम्परा को जीवंत रखने का श्रेष्ठ द्योतक है।

अबूझ मुहूर्त –

विजयादशमी (दशहरा) – शौर्य पर्व समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति और बुराई पर अच्छाई की विजय का पावन पर्व है। इस दिन भगवान श्री राम ने रावण का वध करके पृथ्वी को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई। सनातन धर्म या हिन्दू धर्म में प्रत्येक शुभ कार्य , धार्मिक अनुष्ठान , पूजा पाठ , विवाह , गृह प्रवेश आदि के लिए शुभ मुहूर्त देखा जाता है।

शुभ मुहूर्त किसी भी नए कार्य के शुभारंभ या मांगलिक कार्य को प्रारंभ करने का वह समय होता है जब सभी गृह और नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हुए कर्ता को शुभ फल प्रदान करते हैं। विजयादशमी या दशहरा को शुभ कार्य करने के लिए श्रेष्ठ माना गया है। विजयादशमी के दिन को शास्त्रों में अबूझ मुहूर्त माना गया है। इस दिन बिना मुहूर्त निकाले कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता हैं।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन नए व्यापार या दुकान का प्रारंभ, गृह प्रवेश, नए वाहन या सामान खरीदना, बच्चों के संस्कार जैसे – नामकरण, अन्नप्राशन, यज्ञोपवित, वेदारंभ आदि शुभ कार्य किए जा सकते है।

विजय काल –

विजयादशमी के दिन सायं काल को जब सूर्यास्त होने का समय और आकाश में तारे उदय होने के समय को सिद्धिदायक विजयकाल कहा जाता हैं। उस समय हमें भगवान श्री राम और हनुमानजी की आराधना करनी चाहिए। इससे हमें पूरे वर्ष कार्यों में विजय या सफलता मिलती है।

आपके अमूल्य सुझाव , क्रिया प्रतिक्रिया स्वागतेय है।

राव जयमल मेड़तिया – एक अद्वितीय योद्धा

राव जयमल मेड़तिया – एक अद्वितीय योद्धा थे। राव जयमल मेड़तिया का जन्म आश्विन शुक्ल एकादशी विक्रम संवत् १५६४ तदानुसार 17 सितम्बर 1507 को हुआ। मारवाड़ के शासक जोधा के चौथे पुत्र दुदा से राठौड़ वंश की सुप्रतिष्ठित मेड़तिया शाखा का प्रादुर्भाव हुआ। राव दूदा मेड़तिया राठोड़ों के मूल पुरूष थे लेकिन उनके पुत्र कुंवर विरमदेव उनसे कहीं अधिक वीर और पराक्रमी थे। विरमदेव के युवराज जयमल तो अपने अद्वितीय पराक्रम से पिता और पितामह के पराक्रम से आगे निकल गए।

इनके वंशज मूल पुरूष दूदा की संतति नहीं बतलाकर अथवा दुदावत न कहलाकर विरमदेव, जयमलोत कहलाते है। ये मेड़ता के अधिपति की संताने होने के कारण और इनकी मातृभूमि मेड़ता होने से मेड़तिया राठौड़ कहलाए।

अपने पिता राव विरमदेव की मृत्यु के पश्चात 36 वर्ष की आयु में मेड़ता की गद्दी पर आसीन हुए। अपने पिता के साथ अनेक युद्धों में बड़ी से बड़ी सेना के सामने अपना रणकोशल दिखाया।

राव जयमल मेड़तिया ने चित्तौड़गढ़ के रक्षार्थ अपने प्राणों का बलिदान करके न केवल राजस्थान अपितु भारत के इतिहास में मेड़तिया राठोडो का नाम अजर अमर बना दिया।

मेड़तिया राठौड़ –

मेड़तिया राठोड़ो के बारे में कहा गया है कि – ” मरण ने मेड़तिया अर राज करण ने जोधा ”

उक्त कहावत में मेड़तिया राठोड़ो को आत्मोत्सर्ग में अग्र तथा युद्ध कौशल में परांगत मानते हुए मृत्यु को वरण करने के लिए आतुर कहा गया है। मेड़तिया राठोड़ो ने शौर्य और बलिदान के एक से एक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। और इनमें राव जयमल मेड़तिया का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है।

मेड़तिया राठौड़ प्रारम्भ में एक स्वतंत्र शासक रहें और जोधपुर राजाओं की तरह ही इनका राव की पदवी थी। राठोड़ो की इस मेड़तिया शाखा का सबसे अधिक विस्तार हुआ, जिनका न केवल मेड़ता पर अधिकार था अपितु परबतसर , नावा मारोठ , जैतारण , कोलिया , दौलतपुरा तथा नागौर परगने की करीब 600 छोटी मोटी जागीर प्राप्त थी।

इस प्रकार मारवाड़ के एक बड़े भू भाग पर मेड़तिया राठौड़ देदीप्यमान थे। मेड़तिया राठोड़ो की गणना उच्च राठौड़ कुल होने के फलस्वरूप मेवाड़ के सुप्रसिद्ध सिसोदिया राजघराने में उनके वैवाहिक सम्बंध हुए थे। जिससे प्रेरित होकर मेड़तिया वीरों ने मेवाड़ महाराणाओ के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए ।

जिसके परिणाम स्वरूप मेवाड़ के महाराणाओं ने इनकी सेवाओं से प्रसन्न होकर बदनौर , चाणोद एवम् घाणेराव की महत्त्वपूर्ण जागीरे प्रदान की । इस प्रकार धर्म और स्वतन्त्रता के लिए प्राण उत्सर्ग करने वाले इस सुविख्यात राठौडो का मेंवाड़ और मारवाड़ में एक विशिष्ट स्थान रहा है।

राव मालदेव और राव जयमल मेड़तिया –

मेड़ता की स्वतंत्र राज्य के रुप में पहचान बनाए रखने के लिए राव जयमल ने मारवाड़ के शासक राव मालदेव से 22 महत्वपूर्ण युद्धों में अपने पराक्रम से कई बार विजय हासिल की । राव मालदेव को न राव जयमल से हार खानी पड़ी , बल्कि राव जयमल की असाधारण वीरता से इतने भयभीत हुए कि अपने प्राणों की रक्षा हेतु उन्हें चांदा मेड़तिया से सहयोग लेना पड़ा ।

राव जयमल मेड़तिया को अपनी मातृभूमि से अनन्य लगाव था लेकिन जयमल मेड़ता छोड़ कर मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह के पास आ गए। मेवाड़ के महाराणा उदय सिंह ने राव जयमल मेड़तिया को उचित सम्मान के साथ जागीर एवम् चित्तौड़गढ़ के दुर्गाध्यक्ष के रुप में महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी।

राव जयमल और चित्तौड़गढ़ –

अकबर की चित्तौड़ पर चढ़ाई के समय जयमल ने अपने स्वामी महाराणा उदय सिंह को विकट पहाड़ों में सुरक्षित भेज दिया और चित्तौड़ दुर्ग की रक्षा का सम्पूर्ण भार अपने हाथों में ले लिया। चित्तौड़गढ़ के अतुलनीय जौहर और शाके के अनुसार लम्बे समय तक अकबर का चित्तौड़गढ़ दुर्ग का घेराव रहने पर भी राजपूतों ने धैर्य और साहस नहीं खोया।

विकट युद्धों के अनुभवी जयमल ने खाद्य पदार्थों व शस्त्रों का संग्रह कर युद्ध की तैयारी प्रारम्भ कर दी। शत्रु आक्रांता अकबर ने भी चितौड़ की सामरिक महत्व की जानकारियां एकत्रित कर अपनी रणनीति तैयार कर चित्तौड़ दुर्ग को विशाल सेना के साथ घेरा दिया। ओर दुर्ग के नीचे सुरंग खोदी जाने लगी ताकि उनमें बारूद भरकर विस्फोट कर दुर्ग के परकोटे उड़ाए जा सके। तोप दागने एवम् सुरंग फटने से दुर्ग में पड़ती दरारों को राव जयमल मेड़तिया रात्रि के समय फिर मरम्मत करा ठीक करा देते। कई महीनों के भयंकर युद्ध के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकला। चित्तौड़ के वीरो ने मुगल सेना के इतने तुर्कों को मारा कि लाशों के ढेर लग गए।

अकबर ने किले के नीचे सुरंग खोद कर मिट्टी निकालने वाले मजदूरों को एक एक मिट्टी की टोकरी के बदलें एक एक सोने की मोहरे दी। अबुल फजल ने लिखा कि इस युद्ध में मिट्टी की कीमत भी स्वर्ण के समान हो गई।

अकबर राव जयमल के पराक्रम से भयभीत व आशंकित भी थे। उसने राजा टोडरमल के द्वारा जयमल को संदेश भेजा कि आप राणा और चित्तौड़ के लिए क्यों अपने प्राण व्यर्थ गवां रहे हो। , चित्तौड़ दुर्ग पर मेरा कब्जा करा दो। मैं तुम्हें तुम्हारा राज्य मेड़ता और अन्य जागीर दूंगा।

जयमल ने अकबर का प्रस्ताव ठुकरा दिया कि मैं राणा और चित्तौड़ के साथ विश्वासघात नहीं कर सकता और मेरे जीवित रहते तुम किले में प्रवेश नहीं कर सकते। जयमल ने टोडरमल के साथ जो संदेश भेजा जो इस प्रकार है – l

राव जयमल मेड़तिया एक दिन रात्रि में दुर्ग की मरम्मत करवा रहें थे उसी समय अकबर ने संग्राम नामक बंदूक से गोली दाग दी ओर से गोली मारने से वह घायल हो गए। चित्तौड़गढ़ के अतुलनीय जौहर और शाके , चित्तौड़गढ़ दूसरा जौहर और शाका हुआ। क्षत्राणियो ने जौहर किया और राजपूतों ने शाका। दुर्ग के द्वार खोल दिए गए और जयमल के नेतृत्व में राजपूत अकबर की सेना पर टूट पड़े।

राव जयमल मेड़तिया भैरव पोल के निकट युद्ध करते हुए काम आएं। अकबर स्वयं ने जयमल की वीरता से प्रभावित होकर उनकी हाथी पर सवार मूर्ति को अपने दुर्ग के सामने बनवाई। वीरवर जयमल ने अकबर की कूटनीतिक चालों को विफल करते हुए अपने पूर्वजों के निर्मल यश को सुरक्षित रखा और प्राणोत्सर्ग कर स्वामीभक्त का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया।

रावत कृष्णदास चूंडावत – जिन्होंने जगमाल को हटा प्रताप को गद्दी पर बैठाया

महाराणा उदयसिंह की मृत्यु के बाद जगमाल का हाथ पकड़ कर उसे गद्दी से उठाया और प्रताप को मेंवाड़ के सिंहासन पर आसीन किया। इस प्रकार प्रताप का हक दिलाने में रावत कृष्णदास चुंडावत की मुख्य भूमिका रही।

मेंवाड़ के भीष्म चूंडा के त्याग, कर्त्तव्यपरायणता, निष्ठा और असाधारण वीरता जैसे पहलुओं ने मेंवाड़ के इतिहास को गौरवमय बनाने में अनूठा योगदान दिया। जिस प्रकार वीरवर चुंडा ने अपनी सतत साधना से एक पृथक पहचान बनाई और अपने वंशजों को चुंडावत कहलाने का गौरव प्रदान किया उसी प्रकार आगे चल कर उन्हीं के वंशज रावत किशनदास चुंडावत ने अपने यश और शौर्य से सर्वथा नवीन ख्याति अर्जित की। रावत कृष्णदास चुंडावत के वंशज कृष्णावत हुए। चुंडा जी की सातवीं पीढ़ी में रावत कृष्णदास चूंडावत हुए।

मेंवाड़ के भीष्म चुंडा के पुत्र कांधल हुए। जो चुंडावतो में ही नहीं अपितु मेवाड़ के सभी सरदारों में पाटवी माने गए। कांधल ने अपनी तलवार से शत्रुओं को परास्त कर महाराणा कुम्भा के राज्य का विस्तार किया एवम् शासन प्रबन्ध मे अपनी अहम भूमिका निभाई।

कांधल के पुत्र रतनसिंह ने खानवा के युद्ध में अपनी वीरता का परिचय दिया और प्राणोत्सर्ग कर एक उज्जवल इतिहास का निर्माण किया। रतनसिंह के उत्तराधिकारी दूदा चितौड़ के दुसरे शाके में वीरगति को प्राप्त हुए। दूदा के निःसंतान प्राणोत्सर्ग करने पर उनके भाई साईदास , जयमल और पत्ता की तरह चित्तौड़ के तीसरे शाके में अपना बलिदान दिया।

साईदास के उत्तराधिकारी खेंगार हुए। वह जब मानसिंह कच्छवाहा से मिला तो उसकी मनोदशा देखकर यह जान लिया कि यह आदमी मुगलों का पक्षधर है और इससे समझौता करना ठीक नहीं है। इसकी जानकारी महाराणा प्रताप को देकर सचेत किया।

खेंगार के बाद रावत कृष्णदास चुंडावत सलुंबर की गद्दी पर विराजमान हुए। उन्होंने मेंवाड़ के इतिहास में अपनी अलग पहचान बनाई। परिणामत: उनके वंशज कृष्णावत नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने मेव जाति के लोगों का दमन कर 1636 ई . में अपना प्रभुत्व जमाया। यहां के भील, गमेती बड़े उपद्रवी थे, परन्तु कृष्णदास ने अपने बाहुबल से उन्हें अधीन किया। इस संदर्भ में कृष्णावत वंश प्रकाश में कवित्त उल्लेखनीय है –

पोह राण परताप, बीजड रावनू बदाई । पटो सलूंबर सेत, पटेके ठाहर पाई।।

ऊपज सहज असीह, रेख़ सावत करवाई। सिंग सलुंबर्यो मोर, आप पाछ अपणई ।।

मज छपन भांग मेवास मुख, सरब उधप दानेस । रवतेज राज थाप्यो रघु, संवत् सोल छत्तीस रे ।।

महाराणा प्रताप का राजतिलक –

हिंदुआ सूरज महाराणा प्रताप के संघर्षमय जीवन को सफल बनाने और गुहिल वंश की मर्यादा की रक्षा करने वाले कृष्णदास अपना एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। महाराणा उदयसिंह की मृत्यु के बाद जगमाल का हाथ पकड़ कर उसे गद्दी से उठाया और प्रताप को गद्दी पर आसीन कर मेंवाड़ के सिंहासन पर आसीन किया। इस प्रकार प्रताप का हक दिलाने में रावत कृष्णदास चुंडावत की मुख्य भूमिका रही।

यहां यह विशेष ध्यान देने योग्य है कि रावत कृष्णदास चुंडावत ने यदि प्रताप जैसे व्यक्ति को उस समय गद्दी पर नहीं बैठाते तो आज भारत का इतिहास बदल गया होता। और पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और अरब देशों के समान भारत हो जाता।

हल्दीघाटी (हल्दीघाटी : रक्तरंजित पावन माटी ) के युद्ध में (18 जून 1576 ई .) रावत कृष्णदास चुंडावत हरावल में रहें और मेंवाड़ के दुसरे सरदारों के साथ मिलकर इतने वेग से मुगल सेना पर आक्रमण किया कि शत्रुओं को कई बार पीछे भागना पड़ा।

छापामार युद्ध करने के साथ मेंवाड़ राज्य का प्रबन्ध सुचारू रूप से सम्पादित करने में रावत कृष्णदास चुंडावत की प्रमुख भूमिका रही। एक सच्चे स्वामीभक्त के रुप में प्रताप के साथ रहकर, उन्होंने न केवल विकट घड़ी में मेंवाड़ के सरदारों को एक सूत्र में बांधे रखा बल्कि पग पग पर शत्रुओं से लोहा लेकर अपनी रणकुशलता और निर्भीकता का परिचय दिया।

रावत कृष्णदास चुंडावत हरावल में लड़ते रहे तो दूसरी ओर उन्होंने सलुंबर में लक्ष्मीनारायण जी तथा बाण माता जी के देवालय निर्मित करवा कर अपनी आध्यात्मिकता का परिचय दिया। अनवरत युद्धों में लड़ने के कारण कृष्णदास जी का शरीर इतना जर्जरित हो गया था कि उन्हें संवत् 1652 में इस अस्थाई संसार से सदा के लिए विदा होना पड़ा।

रावत कृष्णदास चुंडावत के दस पुत्र हुए। जिनमें से ज्येष्ठ पुत्र जैतसिंह जी ने सलूंबर की बागड़ोर संभाली। महाराणा प्रताप जब अपनी मृत्यु को निकट देख वंश गौरव के बारे में चिंतित रहने लगें तब जेतसिंह और मेंवाड़ के अन्य उमरावों ने बाप्पा रावल की सौगंध खाकर प्रतिज्ञा की मेंवाड़ का गौरव हमेशा की तरह बना रहेगा। इसके बाद महाराणा प्रताप ने अपने प्राण त्यागे।

रावत कृष्णदास चुंडावत एवम् उनके वंशजों की मेंवाड़ में अहम और निर्णायक भूमिका रही। उन्होंने कर्त्तव्य परायणता, त्याग, धर्म और देश के लिए स्वाभिमान के साथ प्राण न्यौछावर करने का मार्ग अंगीकार कर मेवाड़ के इतिहास में अमिट छाप छोड़ी है।

चांपा मुरधर मोड़ , धर ढूढा नाथा धणी

चुंडा घर चित्रकोट , कीरत हंदा किसनसी ।।

जिस प्रकार मारवाड़ का शासन- प्रबंध चंपावतो के हाथ में है, जयपुर का नाथावतो के पास और मेवाड़ का चुंडावतों के पास है। पर उनमें भी कीर्ति लिए हुए शिरोमणी किशनावत हैं।

आपके अमूल्य सुझाव, क्रिया प्रतिक्रिया स्वागतेय है।

अमझेरा की वीरांगना महारानी किसनावती

मालवांचल में विंध्याचल की उपत्यका में जोधपुर (मारवाड़) से आए राठोड़ो का एक छोटा सा साम्राज्य था जिसकी राजधानी अमझेरा नगर थी। इस राज्य की स्थापना सन् 1604 ई . में राव जगन्नाथ ने की थी। प्रकृति की गोद में बसा मां अम्बिका का स्थान अमझेरा अभूतपूर्व था।

यह भक्ति और शक्ति का अद्भुत मिलाप रहा है। इस साम्राज्य के संस्थापक राव जगन्नाथ से लेकर उनकी नौवी पीढी के अंतिम राजा बख्तावर सिंह जिन्होंने सन् 1857 ई. के भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध सैनिक विद्रोह कर अपने प्राण फांसी के फंदे पर न्यौछावर कर दिए थे।

राव जगन्नाथ जी की महारानी किसनावती कछवाहजी ने तो रणक्षैत्र में लड़ते हुए अपने पुत्रों एवम् बहुओं सहित जीवन की आहुति दी थीं।

मारवाड़ के राज्य सिंहासन से वंचित युवराज राम (राम सिंह) के तृतीय पुत्र केशवदास राठौड़ जो महाराणा उदयसिंह की पुत्री से उत्पन्न थे, ने नर्मदा के तट पर चोली महेश्वर को अपनी राजधानी बनाकर बावन परगनों का राज्य स्थापित किया था।

राव राम के द्वितीय पुत्र कल्याण सिंह के पुत्र जसवंत सिंह भी मालवा में आकर रहते थे। उन्हे बादशाह ने मोरीगढ़ (उत्तर दुर्ग – दक्षिण प्रांत) का दुर्गपाल नियुक्त किया था। मांडू के सुल्तान ने उन्हें ग्यारह गांवो की मंसब की जागीर भी दे रखी थी।

जसवंत सिंह की एक युद्ध में सुनेल राजपूतों के साथ लड़ते हुए सन् 1661 में मृत्यु हो गई थी। जसवंत सिंह के ज्येष्ठ पुत्र युवराज जगन्नाथ जिन्हें चोली महेश्वर के अधिपति केशवदास ने दत्तक लिया था। उन्हें अकबर ने उसकी पटना, उड़ीसा और बंगाल के युद्धों में वीरता से प्रसन्न होकर अमझेरा राज्य की जागीर सन् 1604 में प्रदान की थी।

राव जगन्नाथ का विवाह मिर्जा राजा जयसिंह आमेर की राजकुमारी किसनावती के साथ हुआ था। वीर प्रसूता मां किसनावती ने दो वीर पुत्र केसरीसिंह और सुजान सिंह को जन्म दिया था। राव जगन्नाथ खानजन्हा लोदी के विद्रोह को कुचलने की मुहिम में लड़ते हुए अत्यधिक घायल हो जानें से मई 19, सन् 1630 को वीरगति को प्राप्त हुए।

राव जगन्नाथ के वीरगति के बाद केसरी सिंह अमझेरा के राजसिंहासन पर बैठे। राव केसरीसिंह वीर और विद्वानों का आदर करते थे। उन दिनों उत्तरी भारत पर यदा कदा मरहठठो ने दक्षिण से आकर हमले प्रारम्भ कर दिए थे।

दक्षिण से हमले के लिए आने वाली सेनाओं के मार्ग में अमझेरा राज्य की सीमाएं सबसे पहले पड़ती थी और इस रियासत के स्वामी को अपने सीमित साधनों से उनका मुकाबला करना होता था। सन् 1678 में मराठों की सेना आगे बढ़कर मोरीगढ पहुंची। उससे अपने दुर्ग की रक्षा करना अनिवार्य था।

मां किसनावती ने अपने दोनो पुत्र केसरी सिंह और सुजान सिंह को मां का दूध की लाज रखने को कहा। महारानी किसनावती खड़ग उठाई और दोनो पुत्रों सहित युद्ध में कूद पड़ीं। तत्कालीन कवि जैसा संधु ने इस घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि –

अर्थात् राजपूत जिसका नमक खा लेता था उस पर विपत्ति आने पर उसकी सहायतार्थ अपने प्राणों की बाजी लगा देता था। मां किसनावती कछवाही जी कहती है कि ” हे मेरे पुत्रों (केसरीसिंह और सुजनसिंह) अपने सिर रहते मोरीगढ़ पर शत्रुओं को कब्जा मत दे देना। तुम मोरीगढ़ तब ही देना जब अपने प्राण शरीर में ना रहें। मां के ऐसे वचनों को सुनकर दोनों पुत्रों ने भयंकर युद्ध किया। जिसमें शत्रु सेना के दलों और हाथियों को ढहा दिया।

राठौड़ वीर सपूतों ने वैसा ही किया जैसा मां ने कहा कि मरने तक दुर्ग की रक्षा करते रहें और आखिर में दोनों पुत्रों सहित मां किसनावती भी तलवारों से प्रचंड वार करती हुई जूझ कर खेत रही ।

मां किसनावती अपने दोनों पुत्रों सहित युद्ध में अपने दोनों पुत्रों सहित वीरगति को प्राप्त हुई । राव केसरीसिंह की चारों रानियां हाड़ीजी , सुनेलजी बड़वास , झालीजी देलवाड़ा और शेखावत जी सन् 1678 में मोरीगढ़ में उनके पार्थिव शरीर के साथ सती होकर स्वर्गारोहण हुई।

दुर्ग की रक्षार्थ मां किसनावती कछवाही जी, उनके दोनों वीर पुत्रों सहित युद्ध में लड़ते हुए इतिहास में अमर हो गए। धन्य है ऐसी वीर माताएं और उनके पुत्र , जिनको सत सत नमन।