कालिका माता मंदिर, चित्तौड़गढ़ दुर्ग की शिखर-रेखाओं पर प्रतिष्ठित, वह दिव्य आस्था है जहाँ शक्ति और शौर्य एक ही आलोक में दीप्त होते हैं। पत्थरों से उठती हवाएँ मानो बीते रणों की स्मृति सुनाती हैं, और जौहर की ज्वालाएँ आज भी आत्मसम्मान का ताप संजोए हैं। माँ कालिका यहाँ केवल आराध्य नहीं, क्षत्रिय चेतना की अनवरत धारा हैं, जिन्होंने धर्म की रक्षा हेतु अडिग रहने का संकल्प जगाया। इस देवालय में झुकता मस्तक भक्ति के साथ-साथ साहस का भी वरण करता है, और मन में स्वाभिमान की लौ दीर्घकाल तक प्रज्वलित रहती है।
कालिका माता मंदिर चित्तौड़गढ़
सन् 1303 की वह काली रात।
चित्तौड़गढ़ के किले पर अलाउद्दीन खिलजी की फौज ने घेरा डाल रखा था। नीचे, घाटी में मशालों की लपटें थीं। ऊपर, किले के भीतर – एक मंदिर में अखंड दीपक जल रहा था। वह मंदिर था – कालिका माता मंदिर।
किले के राजपूत वीर जानते थे कि युद्ध का परिणाम क्या होगा। लेकिन जाने से पहले वे माँ के सामने झुके – उसी भद्रकाली के सामने जिसे मेवाड़ के शासक हर युद्ध में अपने साथ रणभूमि में ले जाते थे। यह देवी केवल पूजनीय नहीं थी। यह शक्ति का स्रोत थी, विजय का संकल्प थी।
और जब खिलजी ने किले में प्रवेश किया, तो उसने इस मंदिर को तोड़ने की कोशिश की। क्योंकि वह जानता था – जब तक यह माँ है, चित्तौड़ का आत्मबल नहीं मरेगा। लेकिन माँ को कोई नहीं तोड़ सका।
आज भी चित्तौड़गढ़ का कालिका माता मंदिर उसी चट्टानी पहाड़ी पर खड़ा है – खंडित पर अडिग। टूटे शिखर पर भी शक्ति का अखंड दीप जल रहा है। और हर नवरात्रि में लाखों भक्त यहाँ माथा टेकने आते हैं। यह केवल एक मंदिर की कहानी नहीं है। यह उस विश्वास की कहानी है जिसने सदियों तक क्षत्रिय वीरों को रणभूमि में बाहुबली बनाया।
1: ऐतिहासिक पृष्ठभूमि – सूर्य से शक्ति तक का सफर
चित्तौड़गढ़ कालिका माता मंदिर का इतिहास

चित्तौड़गढ़ का कालिका माता मंदिर मूलतः 8वीं शताब्दी में राजा मानभंग (मोरी राजपूत वंश के अंतिम शासक) द्वारा सूर्य देव के लिए निर्मित कराया गया था। 1303 में अलाउद्दीन खिलजी ने इसे नष्ट किया। 14वीं शताब्दी में महाराणा हम्मीर सिंह ने इसका पुनर्निर्माण करवाया और भद्रकाली (कालिका माता) की मूर्ति स्थापित की। यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में संरक्षित है।
जब मैं पहली बार चित्तौड़गढ़ दुर्ग के भीतर इस मंदिर की ओर चला, तो मुझे नहीं पता था कि यह यात्रा सिर्फ एक मंदिर देखने की नहीं, बल्कि हजार साल के इतिहास से आमने-सामने होने की होगी।
विजय स्तम्भ और पद्मिनी महल के ठीक बीच में – किले की ऊँची पहाड़ी के पूर्वी किनारे पर – यह मंदिर ऐसे खड़ा है जैसे समय भी इसके सामने रुक गया हो।
इस मंदिर की कहानी उस युग से शुरू होती है जब चित्तौड़गढ़ मोरी राजपूतों का गढ़ था। किले का निर्माण ही चित्रांगद मोरी ने करवाया था – और इसीलिए इसका नाम “चित्रकूट” या “चित्रकोट” से बिगड़कर “चित्तौड़” पड़ा। उसी मोरी वंश के अंतिम राजा मानभंग ने 8वीं शताब्दी में यह मंदिर बनवाया था।
दिलचस्प बात तो यह है कि तब यह मंदिर सूर्य भगवान का मंदिर था। सूर्योपासना उस युग की प्रमुख परंपरा थी, और गुप्त-प्रतिहारकालीन स्थापत्य का प्रभाव इस मंदिर की हर शिला पर अंकित है।
कालिका माता मंदिर की ऐतिहासिक टाइम लाइन
| काल | घटना | शासक/कारण |
|---|---|---|
| 8वीं सदी ई. | सूर्य मंदिर का निर्माण | राजा मानभंग (मोरी राजपूत) |
| 734 ई. | बप्पा रावल का चित्तौड़ पर अधिकार | मेवाड़ की स्थापना |
| 1303 ई. | मंदिर का विध्वंस | अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण |
| 14वीं सदी | पुनर्निर्माण, भद्रकाली की प्राण-प्रतिष्ठा | महाराणा हम्मीर सिंह |
| 16वीं सदी | अखंड ज्योति की स्थापना | महाराणा लक्ष्मण सिंह |
| 2013 ई. | UNESCO World Heritage Site घोषित | Hill Forts of Rajasthan के साथ |
734 ईसवी में बप्पा रावल ने जब मेवाड़ राज्य की नींव रखी, तब यह मंदिर पहले से उस पहाड़ी पर विराजमान था। सूर्य की आराधना और शक्ति की उपासना – दोनों यहाँ एक साथ होती थीं। राजपूत योद्धाओं का यह विश्वास था कि सूर्यवंशी होने के नाते उनकी शक्ति का स्रोत यही है।
और फिर आया 1303 का वह काला साल। अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर पहला भीषण आक्रमण किया। रानी पद्मिनी का प्रसिद्ध जौहर इसी साके में हुआ। खिलजी ने किले को लूटा, और इस मंदिर को भी नहीं बख्शा। पत्थर टूटे, शिखर गिरे। लेकिन आस्था नहीं टूटी।
14वीं सदी में जब महाराणा हम्मीर सिंह ने मेवाड़ को फिर से खड़ा किया – और वे उन महाराणाओं में से थे जिन्होंने चित्तौड़ को वापस जीता – तब उन्होंने इस ध्वस्त सूर्य मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया। और इस बार यहाँ भद्रकाली की मूर्ति प्रतिष्ठित हुई। सूर्य मंदिर अब शक्ति का धाम बन गया था। यही तो है क्षत्रिय संस्कृति की जिजीविषा – टूटते हैं, लेकिन झुकते नहीं। गिरते हैं, लेकिन उठ खड़े होते हैं।
राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार यह मंदिर 8वीं सदी ई. में निर्मित हुआ और 14वीं सदी में राणा कुंभा के काल में पुनर्निर्मित हुआ।
2: वास्तुकला – नायाब और बेजोड़
कालिका माता मंदिर की वास्तुकला की विशेषताएं क्या हैं?
क्या आपने कभी किसी मंदिर की दीवारों को ध्यान से पढ़ा है? नहीं, मेरा मतलब शिलालेख से नहीं। मेरा मतलब उन नक्काशियों से है जो कारीगरों ने पत्थर पर इस तरह उकेरी हैं जैसे वे भावनाएं लिख रहे हों।
जब मैंने पहली बार इस मंदिर के द्वार की चौखट को छुआ, तो उस पर सूर्यदेव की आकृति इतनी जीवंत लगी मानो अभी आंखें खोलेंगे। हजार साल पुराना पत्थर। और उस पर इतनी बारीक कारीगरी। यही है इस मंदिर का चमत्कार।
संरचना और स्थापत्य योजना
यह मंदिर एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है। मंदिर तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं – और जैसे-जैसे ऊपर चढ़ते हैं, किले का विहंगम दृश्य सामने आता है। रोंगटे खड़े हो जाते हैं। मंदिर पूर्व दिशा की ओर मुँह किए हुए है – यानी सूर्योदय की दिशा में। मूल सूर्य मंदिर की यह परंपरा आज भी बरकरार है।
मंदिर की संरचना में चार प्रमुख भाग हैं:
- गर्भगृह (Sanctum) – माँ कालिका की मूर्ति यहाँ विराजमान है
- अंतराल (Antarala) – गर्भगृह और सभा मंडप के बीच का कक्ष
- सभा मंडप (Sabha Mandapa) – श्रद्धालुओं के बैठने का स्थान
- प्रवेश द्वार-मंडप (Entrance Porch) – मंदिर का मुख्य द्वार
यह एक संधार मंदिर है – यानी गर्भगृह के चारों ओर एक प्रदक्षिणा-पथ (ambulatory passage) है। यह गुप्त-प्रतिहार काल की उन्नत वास्तुकला की निशानी है।
स्तंभ, नक्काशी और द्वार की अलौकिक कला
मंदिर की छत समतल है, जो चतुर्भुजीय स्तंभों (quadrangular pillars) पर टिकी है। इन स्तंभों पर घटपल्लव (ghatapallava) डिजाइन उकेरी गई है – जो समृद्धि और जीवन का प्रतीक है।
गर्भगृह का द्वार-चौखट अद्वितीय है। इसमें चार नक्काशीदार पट्टियाँ हैं जिनका मुख्य विषय सूर्यदेव हैं। द्वार के दोनों ओर विस्तृत पैनलों में देवताओं की आकृतियाँ हैं – और सबके केंद्र में सूर्यनारायण। मानो यह मंदिर घोषणा कर रहा हो: “मैं सूर्य का हूँ, मैं शक्ति का हूँ।”
गर्भगृह की भीतरी दीवारों पर सूर्यदेव की आकृतियाँ हैं – अप्सराओं और सहचरी देवियों से घिरे हुए। चंद्रदेव की आकृतियाँ भी यहाँ अंकित हैं। सूर्य और चंद्र – दोनों एक ही मंदिर में। यह समन्वय ही भारतीय दर्शन की विशेषता है।
छज्जों (cornices) पर कमल पुष्पों की जटिल नक्काशी आज भी देखी जा सकती है। कमल – जो कीचड़ में भी खिलता है। क्षत्रिय परंपरा का इससे बड़ा प्रतीक और क्या हो सकता है?
मंदिर परिसर में और क्या है?
मंदिर परिसर में एक और प्राचीन मंदिर स्थित है – जोगेश्वर महादेव मंदिर – जो शिवजी को समर्पित है। शक्ति और शिव – एक ही परिसर में। यही तो अर्धनारीश्वर का भाव है। परिसर में एक विशाल खुला मैदान भी है जहाँ रात्रि जागरण आयोजित होते हैं – जब भक्तों की मनोकामना पूरी होती है। मंदिर के पास ही एक सूर्य कुंड (Surya Kund) है – बप्पा रावल द्वारा बनवाया गया जलकुंड। यह कुंड आज भी उस युग की जल-प्रबंधन परंपरा का साक्ष्य है।
मंदिर में एक शिलालेख भी है जो स्पष्ट रूप से बताता है कि इसे राजा मानभंग ने बनवाया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इसे राष्ट्रीय महत्व के स्मारक के रूप में संरक्षित किया है।
वास्तुकला का सारांश:
शैली: प्रतिहारकालीन – गुप्त प्रभाव | दिशा: पूर्वमुखी | विशेषता: संधार योजना | मुख्य आकर्षण: घटपल्लव स्तंभ, सूर्य-चंद्र नक्काशी, चार-पट्टी द्वार-चौखट
3: शक्ति और शौर्य – जब देवी युद्धभूमि में साथ देती
मेवाड़ की युद्धपरंपरा और कालिका माता
यह सुनकर मन में गर्व की लहर दौड़ जाती है। मेवाड़ के महाराणाओं की एक परंपरा थी। जब भी वे युद्धभूमि पर जाते, माँ भद्रकाली (कालिका माता) की मूर्ति को अपने साथ ले जाते थे। देवी रणभूमि में चलती थी। योद्धाओं के आगे। सोचिए उस भावना को – जब एक राजपूत सैनिक जानता हो कि उसकी माँ उसके साथ है। हर तीर। हर तलवार। हर पल। यही क्षत्रिय धर्म का सार है। शक्ति की आराधना केवल पूजा नहीं, जीवनशैली है।
वह परंपरा जो आज भी जीवित है
जानते हैं सबसे अनूठी बात क्या है?
माँ कालिका की मूर्ति “चल मूर्ति” के रूप में प्रतिष्ठित है। यानी इसे युद्ध या उत्सव में बाहर ले जाया जा सकता है। यह परंपरा आज भी जीवित है।
अष्टमी के दिन – नवरात्रि में – मेवाड़ महाराणा की ओर से यहाँ हवन होता है। सोचिए – सदियों बाद भी मेवाड़ का राज परिवार इस परंपरा को निभाता है। यह जुड़ाव। यह श्रद्धा। यह हमारी पहचान है।
16वीं शताब्दी में महाराणा लक्ष्मण सिंह ने यहाँ अखंड ज्योति प्रज्वलित की। वह ज्योति आज भी जल रही है। सदियाँ बीत गईं। आक्रमण हुए। किला उजड़ा। लेकिन वह दीपक – नहीं बुझा। यह दीपक अब सिर्फ तेल से नहीं, आस्था से जलता है।
नवरात्रि में –
जब नवरात्रि आती है, तो चित्तौड़गढ़ का रंग ही बदल जाता है। नौ दिन। लाखों भक्त। एक माँ।
विशेष आरती और पूजन होते हैं। अष्टमी को उदयपुर के महाराणा दरबार की ओर से हवन आयोजित होता है। नवमी को विशेष हवन-पूजन। पूरे नवरात्रि काल में माँ को सोने के आभूषणों से विशेष श्रृंगार किया जाता है। इतने मूल्यवान आभूषण कि पुलिस के पाँच सशस्त्र जवान सुरक्षा में तैनात रहते हैं।
और रात्रि जागरण – जब भक्त अपनी पूरी मनोकामना पूरी होने की खुशी में रात भर जागते हैं। यह कोई धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं – यह एक मनुष्य और उसकी देवी के बीच का सबसे गहरा संवाद है।
4: सांस्कृतिक और क्षत्रिय धरोहर – जब इतिहास और आस्था एक हो जाती है
“चित्तोडेश्वरी” – चित्तौड़ की अपनी देवी
माँ कालिका को यहाँ “चित्तोडेश्वरी” और “सूर्यभरणी” के नाम से भी जाना जाता है।
चित्तोडेश्वरी – यानी चित्तौड़ की स्वामिनी। यह केवल नाम नहीं, एक घोषणा है। इस भूमि की, इस किले की, इस संस्कृति की स्वामिनी माँ कालिका हैं।
और सूर्यभरणी – यानी सूर्य की आभा को धारण करने वाली। सूर्य मंदिर से शक्ति मंदिर बना यह स्थान इसीलिए सूर्यभरणी नाम धारण किए है। सूर्य की ऊर्जा और शक्ति की तेजस्विता – दोनों यहाँ एकाकार हो गए।
क्षत्रिय परंपरा में शक्ति उपासना का महत्व
क्षत्रिय धर्म और शक्ति उपासना – ये दोनों अलग नहीं हैं। राजपूत समाज में कुलदेवी की पूजा जन्म से मृत्यु तक, हर संस्कार में होती है। जन्म हो तो माँ के दर्शन, विवाह हो तो माँ का आशीर्वाद, युद्ध पर जाना हो तो माँ का आशीर्वाद।
कालिका माता का यह मंदिर इसी परंपरा का जीवंत केंद्र है।
मंदिर की पूजा-व्यवस्था अखाड़ा श्री निरंजनी के संतों के अधीन है – यह दायित्व स्वयं महाराणा ने दिया था। और वर्तमान में देवस्थान विभाग मंदिर का प्रबंधन करता है। परंपरा और व्यवस्था – दोनों साथ चलती हैं।
5: वर्तमान स्थिति और यात्रा मार्गदर्शिका
चित्तौड़गढ़ कालिका माता मंदिर कैसे पहुँचें?
चित्तौड़गढ़ राजस्थान के दक्षिणी भाग में स्थित है और तीनों प्रमुख मार्गों – सड़क, रेल और वायु – से भलीभांति जुड़ा है।
हवाई मार्ग से
निकटतम हवाई अड्डा महाराणा प्रताप हवाई अड्डा, उदयपुर है – मंदिर से लगभग 98 किलोमीटर की दूरी पर। उदयपुर से मुंबई, दिल्ली, जयपुर के लिए नियमित उड़ानें हैं। वहाँ से टैक्सी या बस द्वारा चित्तौड़गढ़ पहुँचा जा सकता है।
रेल मार्ग से
चित्तौड़गढ़ जंक्शन एक प्रमुख रेलवे स्टेशन है, जहाँ दिल्ली, मुंबई, जयपुर, उदयपुर से सीधी ट्रेनें आती हैं। रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी लगभग 7 किलोमीटर है।
सड़क मार्ग से
- चित्तौड़गढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग 76 और 79 के संगम पर स्थित है
- उदयपुर से: लगभग 115 किमी (2.5 घंटे)
- जयपुर से: लगभग 312 किमी (5 घंटे)
- अजमेर से: लगभग 195 किमी (3.5 घंटे)
- चित्तौड़गढ़ बस स्टैंड से मंदिर लगभग 5 किलोमीटर
किले के भीतर जाने के लिए – मुख्य द्वार से प्रवेश करें, फिर विजय स्तम्भ की दिशा में बढ़ें। मंदिर विजय स्तम्भ और पद्मिनी महल के बीच में है।
दर्शन का समय और प्रवेश शुल्क
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| प्रातःकाल दर्शन | 6:00 AM – 12:00 PM |
| सायंकाल दर्शन | 4:00 PM – 8:00 PM |
| मंदिर प्रवेश शुल्क | निःशुल्क |
| किला प्रवेश शुल्क | भारतीय: ₹40 |
| Sound & Light Show | सायंकाल (बुकिंग अलग) |
घूमने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
अक्टूबर से मार्च – यही चित्तौड़गढ़ यात्रा का सुनहरा मौसम है। सर्दियों में मौसम सुहावना रहता है, किले की दीवारों पर सुबह की धूप सोने-सी चमकती है।
नवरात्रि (अक्टूबर) में विशेष महत्व है – माँ का विशेष श्रृंगार, भव्य आयोजन और भक्तों का उत्साह देखते ही बनता है। लेकिन इस समय भीड़ भी अधिक होती है, इसलिए पहले से व्यवस्था करें।
ग्रीष्मकाल (मई-जून) में राजस्थान की गर्मी कठिन होती है – यात्रा इस मौसम में टालें।
आसपास के प्रमुख दर्शनीय स्थल
- विजय स्तम्भ – महाराणा कुंभा का 9 मंजिला विजय-स्तंभ (मंदिर से पैदल दूरी पर)
- पद्मिनी महल – रानी पद्मिनी की यादों का स्थान
- राणा कुंभा महल – मेवाड़ का पहला निवास-स्थान
- गौमुख कुंड – किले का प्राकृतिक जलस्रोत
- कीर्ति स्तम्भ – स्थापत्य का उत्कृष्ट नमूना
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: कालिका माता मंदिर चित्तौड़गढ़ किसने बनवाया?
उत्तर: यह मंदिर मूलतः 8वीं शताब्दी ईस्वी में मोरी राजपूत वंश के अंतिम शासक राजा मानभंग ने सूर्य देव के लिए बनवाया था। 1303 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण में यह नष्ट हुआ। इसके बाद 14वीं शताब्दी में महाराणा हम्मीर सिंह ने इसका पुनर्निर्माण करवाया और माँ भद्रकाली (कालिका माता) की प्रतिमा स्थापित की।
प्रश्न 2: कालिका माता किस वंश की कुलदेवी हैं?
उत्तर: माँ कालिका (भद्रकाली) मोरी राजपूत वंश की कुलदेवी हैं। मोरी वंश के लोग चित्तौड़ के संस्थापक चित्रांगद मोरी के वंशज हैं। इसके साथ ही वे सिसोदिया वंश की इष्टदेवी और पुरोहित समाज की कुलदेवी भी हैं।
प्रश्न 3: कालिका माता मंदिर चित्तौड़गढ़ घूमने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
उत्तर: अक्टूबर से मार्च का समय सबसे उत्तम है। इस दौरान मौसम सुहावना रहता है। नवरात्रि (अक्टूबर) में विशेष उत्सव होते हैं – माँ का सोने के आभूषणों से श्रृंगार, हवन और रात्रि जागरण। हालाँकि इस समय भीड़ अधिक होती है।
प्रश्न 4: कालिका माता मंदिर चित्तौड़गढ़ के दर्शन का समय और प्रवेश शुल्क क्या है?
उत्तर: मंदिर प्रातःकाल 6:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक और सायंकाल 4:00 बजे से रात 8:00 बजे तक खुला रहता है। मंदिर में प्रवेश निःशुल्क है। चित्तौड़गढ़ किले का प्रवेश शुल्क अलग से देय है।
प्रश्न 5: कालिका माता मंदिर की वास्तुकला शैली क्या है?
उत्तर: यह मंदिर प्रतिहारकालीन वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें गुप्त काल के स्थापत्य प्रभाव स्पष्ट दिखते हैं। यह एक संधार मंदिर है (गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा-पथ सहित)। मंदिर की विशेषता है – घटपल्लव स्तंभ, सूर्य-चंद्र नक्काशी, और चार-पट्टी सज्जित द्वार-चौखट।
प्रश्न 6: क्या चित्तौड़गढ़ किला UNESCO World Heritage Site है?
उत्तर: हाँ। 2013 में कंबोडिया के नोम पेन्ह में हुई UNESCO की 37वीं World Heritage Committee बैठक में चित्तौड़गढ़ दुर्ग को राजस्थान के पाँच अन्य किलों के साथ “Hill Forts of Rajasthan” के नाम से विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।
प्रश्न 7: चित्तौड़गढ़ कैसे पहुँचें?
उत्तर: तीन मार्ग हैं – वायु: निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर (98 किमी); रेल: चित्तौड़गढ़ जंक्शन – दिल्ली, मुंबई, जयपुर से सीधी ट्रेनें; सड़क: NH 76 व 79 पर स्थित, उदयपुर (115 किमी), जयपुर (312 किमी), अजमेर (195 किमी) से सड़क मार्ग।
प्रश्न 8: कालिका माता मंदिर के आसपास कहाँ रुकें?
उत्तर: चित्तौड़गढ़ शहर में सभी श्रेणियों के होटल और धर्मशालाएं उपलब्ध हैं। Hotel Pratap Palace, Hotel Padmini, Castle Bijaipur प्रमुख विकल्प हैं। बजट यात्रियों के लिए राजस्थान पर्यटन के गेस्टहाउस भी सुविधाजनक हैं।
समापन – अखंड ज्योत
चित्तौड़गढ़ का कालिका माता मंदिर सिर्फ पत्थरों की इमारत नहीं है। यह उस माँ का घर है जिसने हजार साल तक अपने भक्त-योद्धाओं को शक्ति दी। यह उस परंपरा का केंद्र है जिसमें देवी रणभूमि पर जाती थी। यह उस आस्था का प्रतीक है जो अलाउद्दीन खिलजी की तलवार से नहीं टूटी, अकबर की तोपों से नहीं डरी।
महाराणा लक्ष्मण सिंह ने जो अखंड ज्योति 16वीं सदी में जलाई, वह आज भी जल रही है। वह ज्योति बताती है कि कुछ चीजें समय से परे होती हैं। कुछ विश्वास अमर होते हैं। जब आप इस मंदिर में माथा टेकते हैं, तो आप सिर्फ देवी के सामने नहीं झुकते – आप उन सभी पूर्वजों को नमन करते हैं जिन्होंने इस कालिका माता मंदिर को बनाया, जिन्होंने इसे बचाया, जिन्होंने इसे जीवित रखा।
अगर आप अभी तक यहाँ नहीं गए – तो अगली यात्रा में चित्तौड़गढ़ का कालिका माता मंदिर सूची में सबसे ऊपर रखिए।
स्रोत: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), राजस्थान पर्यटन विभाग, UNESCO World Heritage List, शोभालाल शास्त्री कृत ‘चित्तौड़गढ़’ (1928), Hindutemples-India Blog, TemplePurohit।
आपके लिए खास –
