आश्विन शुक्ल दशमी अर्थात विजयादशमी केवल एक पर्व नहीं, अपितु क्षत्रिय संस्कृति की चिरंतन चेतना का उत्सव है। जब त्रैलोक्य विजेता रावण का अहंकार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के बाणों से चूर-चूर हुआ, तब धर्म ने अधर्म पर जो ऐतिहासिक विजय प्राप्त की, उसकी अक्षुण्ण स्मृति ही यह पर्व है। कालांतर में यह शौर्य का प्रतीक पर्व शस्त्र-पूजन, शमी वंदन और वीरता के आयुधों के सम्मान में परिवर्तित हो गया, जो क्षत्रियों के रक्त में बसे कर्तव्य, त्याग और रक्षा के भाव को जीवंत रखता है। नवरात्रि की नौ रात्रियों में दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के पश्चात विजयादशमी के दिन ही ‘अबूझ मुहूर्त’ में हर शुभ कार्य, अस्त्र-शस्त्र पूजन, और नीलकंठ के दर्शन से जीवन में अक्षय कीर्ति, ऐश्वर्य एवं शौर्य की प्राप्ति होती है। यह पर्व हर क्षत्रिय को स्मरण दिलाता है कि सत्य, मर्यादा और शस्त्र का धर्म ही युगों-युगों तक विजय का मार्ग प्रशस्त करता है।
विजयादशमी
विजयादशमी (दशहरा)- शौर्य पर्व का प्रारम्भ त्रैलोक्य विजेता रावण पर भगवान श्री राम की विजय स्मृति अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए हुई। किन्तु कालान्तर में यह शौर्य और विजय प्राप्ति का आधार बनने वाले शस्त्रों की पुजा में परिवर्तित होता चला गया।
नवरात्रि के नौ दिनों तक देवी भगवती के नौ स्वरूपों की आराधना के बाद दशमी तिथि को विजयादशमी या दशहरा पर समस्त सिद्धियां प्राप्त करने के लिए पवित्र माने जाने वाले शमी के वृक्ष और देवी अपराजिता के अलावा अस्त्र – शस्त्रों का पूजन भी किया जाता है। विजयादशमी को नीलकंठ पक्षी के दर्शन करना भी अति शुभ माना गया है।
विजयादशमी या दशहरा पर भगवान शिव से शुभफल की कामना एवम् नीलकंठ के दर्शन करने से जीवन में भाग्योदय, सुख समृद्धि एवं धन धान्य की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथा के अनुसार पवनसुत हनुमान जी ने भी श्री रामजी की पत्नी सीता माता को शमी के समान पवित्र कहा था।
विजयादशमी या दशहरा के दिन घर के पूर्व दिशा में में या घर के मुख्य स्थान पर शमी की डाली प्रतिष्ठित करके उसका विधि पूर्वक पूजन करने से घर परिवार में खुशहाली आती है। शनि ग्रह के अशुभ प्रभावों से मुक्ति मिलती है और मानव के सभी पापों और दुखों का अंत होता है। विवाहित महिलाऐं अखंड सौभाग्यवती होती है।
धर्म की अधर्म पर विजय
सैकड़ों वर्षों से सामान्य जन जहां रावण , कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतलो को रामवेशी व्यक्ति से संहार करवा कर उस काल की स्मृति को अक्षुण्ण रखते है, वहीं क्षत्रिय शौर्योल्लास में इस पर्व की अभ्यर्थना करता है। लंकाधिपति रावण को काम , क्रोध , लोभ और मोह का प्रतीक माना जाता है। विजयादशमी (दशहरा) बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जानें वाला पर्व है।
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने रावण का वध करके इस जगत को यह संदेश दिया कि धर्म की अधर्म पर सदैव विजय होती है। जिस प्रकार रावण शक्तिशाली एवम् विद्वान होते हुए भी अनाचार के कारण उसका पतन हुआ उसी प्रकार मानव के भीतर बुराइयां होने से उसका पतन निश्चित है। मानव के बुरे कर्म एक न एक दिन उसके अंत का कारण अवश्य ही बनते है। इसलिए हमें कभी भी सच्चाई और अच्छाई के मार्ग से हटना नहीं चाहिए। विजयादशमी या दशहरा धर्म की अधर्म पर विजय का पर्व है।
आयुध पूजन

सदियों से राजमहल से लेकर प्रत्येक क्षत्रिय के पूजाघर तक समान रूप से श्रृद्धा से मनाया जानें वाला शौर्य पर्व आज भी उसी निष्ठा व समर्पण भाव से मनाया जाता है।
आज भी घर घर में मनाए जाने वाला क्षत्रिय के इस सबसे बड़े त्यौहार पर शस्त्र पूजन पारंपरिक विधि से सम्पन्न होता है। शस्त्र पूजन में उपलब्ध शस्त्रोंनुसार – तलवार , खांडा , कटार , धनुष , तरकश , गुर्ज , ढाल , बल्लम , भाला , फरसा , त्रिशूल , बड़ी नाल की बंदूक , चंवर , निशान और नगाड़ा आदि पूजन में सम्मिलित किए जाते है।
इसके बाद अश्वपूजन होता है जिसमें अश्व का भी पारंपरिक विधि से पूजन होता है। यह पर्व प्रत्येक क्षत्रिय के घर श्रृद्धा से मनाकर हमारी परम्परा को जीवंत रखने का श्रेष्ठ द्योतक है।
अबूझ मुहूर्त
विजयादशमी (दशहरा) – शौर्य पर्व समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति और बुराई पर अच्छाई की विजय का पावन पर्व है। इस दिन भगवान श्री राम ने रावण का वध करके पृथ्वी को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई। सनातन धर्म या हिन्दू धर्म में प्रत्येक शुभ कार्य , धार्मिक अनुष्ठान , पूजा पाठ , विवाह , गृह प्रवेश आदि के लिए शुभ मुहूर्त देखा जाता है।
शुभ मुहूर्त किसी भी नए कार्य के शुभारंभ या मांगलिक कार्य को प्रारंभ करने का वह समय होता है जब सभी गृह और नक्षत्र शुभ स्थिति में होते हुए कर्ता को शुभ फल प्रदान करते हैं। विजयादशमी या दशहरा को शुभ कार्य करने के लिए श्रेष्ठ माना गया है। विजयादशमी के दिन को शास्त्रों में अबूझ मुहूर्त माना गया है। इस दिन बिना मुहूर्त निकाले कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस दिन नए व्यापार या दुकान का प्रारंभ, गृह प्रवेश, नए वाहन या सामान खरीदना, बच्चों के संस्कार जैसे – नामकरण, अन्नप्राशन, यज्ञोपवित, वेदारंभ आदि शुभ कार्य किए जा सकते है।
विजय काल
विजयादशमी के दिन सायं काल को जब सूर्यास्त होने का समय और आकाश में तारे उदय होने के समय को सिद्धिदायक विजयकाल कहा जाता हैं। उस समय हमें भगवान श्री राम और हनुमानजी की आराधना करनी चाहिए। इससे हमें पूरे वर्ष कार्यों में विजय या सफलता मिलती है।
FAQ: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: विजयादशमी का ‘अबूझ मुहूर्त’ क्या है और इसमें कौन से शुभ कार्य किए जा सकते हैं?
उत्तर: अबूझ मुहूर्त का अर्थ है ‘बिना मुहूर्त निकाले किया जाने वाला शुभ समय’, जो विजयादशमी के दिन संपूर्ण दिवस रहता है। ज्योतिष शास्त्रानुसार इस दिन नया व्यापार, गृह प्रवेश, वाहन क्रय, नामकरण, यज्ञोपवीत, अन्नप्राशन तथा विवाह जैसे सभी मांगलिक कार्य बिना विचार किए किए जा सकते हैं। यह वही शुभ घड़ी है जब भगवान श्रीराम ने रावण पर विजय प्राप्त की थी।
प्रश्न 2: विजयादशमी पर शमी वृक्ष पूजन और नीलकंठ दर्शन का क्या महत्व है?
उत्तर: शमी वृक्ष को सिद्धिदायक एवं पवित्र माना गया है। इस दिन शमी की डाली घर की पूर्व दिशा में स्थापित कर पूजन करने से घर में खुशहाली आती है और शनि के अशुभ प्रभाव समाप्त होते हैं। पौराणिक कथा में हनुमान जी ने माता सीता को शमी समान पवित्र कहा था। वहीं नीलकंठ (नीले गले वाला पक्षी) के दर्शन अत्यंत शुभ माने गए हैं, जिससे भाग्योदय, सुख-समृद्धि और धन-धान्य की प्राप्ति होती है।
प्रश्न 3: क्षत्रिय संस्कृति में ‘आयुध पूजन’ क्यों और कैसे किया जाता है?
उत्तर: क्षत्रियों का धर्म शस्त्र धारण कर प्रजा की रक्षा करना है। विजयादशमी को शस्त्र-पूजन का प्रमुख पर्व माना गया है। इस दिन पारंपरिक विधि से तलवार, खांडा, ढाल, बल्लम, त्रिशूल, धनुष-बाण, गुर्ज, नगाड़ा, चंवर, निशान आदि का पूजन किया जाता है, तत्पश्चात अश्व (घोड़े) का भी विधिवत सम्मान किया जाता है। यह पर्व हमारी वीर परम्परा को जीवंत रखता है।
प्रश्न 4: विजयादशमी को ‘विजयकाल’ क्यों कहा जाता है? इसका सही समय क्या है?
उत्तर: विजयकाल वह सिद्धिदायक समय है जो दशहरे के दिन सूर्यास्त के ठीक बाद, जब तारे आकाश में उदय होने लगते हैं, माना जाता है। शास्त्रों में इस काल में भगवान श्रीराम और हनुमान जी की आराधना करने का विधान है। ऐसा करने से वर्षभर किए गए सभी कार्यों में विजय, सफलता एवं शत्रुओं पर संयम प्राप्त होता है।
प्रश्न 5: क्या विजयादशमी पर रावण दहन मात्र पर्याप्त है या इसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ भी है?
उत्तर: रावण दहन मात्र प्रतीकात्मक नहीं है। रावण को काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार के दस सिरों का प्रतीक माना गया है। भगवान श्रीराम ने यह संदेश दिया कि शक्तिशाली एवं विद्वान होते हुए भी अनाचार के कारण रावण का पतन हुआ। अतः सच्ची विजय बाहरी रावण को जलाने से नहीं, अपने भीतर की बुराइयों पर नियंत्रण करने से मिलती है। यही धर्म की अधर्म पर विजय का मूल भाव है।
निष्कर्ष
इस प्रकार विजयादशमी (दशहरा) केवल रावण-दहन या परम्पराओं का निर्वाह मात्र नहीं, वरन् क्षत्रिय संस्कृति के मूल मंत्र ‘शौर्य, त्याग, और धर्मरक्षा’ का पुनर्स्मरण है। शमी वृक्ष, देवी अपराजिता और आयुधों का विधिवत पूजन हमें हथियार उठाने का अहंकार नहीं, अपितु निःशस्त्र की रक्षा का संकल्प देता है। विजयकाल में श्रीराम और हनुमान की आराधना से समस्त कार्यों में सिद्धि मिलती है। यह अबूझ मुहूर्त हर शुभ प्रारम्भ का द्वार है। अतः इस पावन अवसर पर प्रत्येक सनातनी, विशेषकर क्षत्रिय समाज, शस्त्रों का पूजन कर, शौर्य को अन्तरात्मा में स्थापित कर, जीवन को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के पथ पर अग्रसर करे। जय श्री राम। जय दुर्गे अपराजिते।
आपके अमूल्य सुझाव , क्रिया प्रतिक्रिया स्वागतेय है।
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