मेवाड़ की धरती केवल युद्धों की भूमि नहीं रही, यह धर्म, त्याग, स्वाभिमान और बलिदान की तपःभूमि भी रही है। यही वह भूमि है जिसने अपने ध्येय-वाक्य –
“जो दृढ़ राखे धर्म को, तिहि राखे करतार” – को केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने वीरों और वीरांगनाओं के जीवन से चरितार्थ किया। यह भूमि बलिदान और त्याग की रही है। ऐसा ही अनुपम त्याग जो विश्व में अनूठा उदाहरण हैं सत्यव्रत रावत चूण्डा का।
इसी मेवाड़ ने एक ऐसे महापुरुष को जन्म दिया, जिनका त्याग केवल पारिवारिक या राजनीतिक निर्णय नहीं था, बल्कि राजधर्म, पितृभक्ति और आत्मसंयम का विश्व-विरल उदाहरण था। वे थे – सत्यव्रत रावत चूण्डा, जिन्हें उचित ही “मेवाड़ के भीष्म” कहा जाता है।
कविवर नाथूसिंह महियारिया ने उनके त्याग की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा –
बीसनू तो छोटा हुआ, ले धरती बगसीस।
चूंडो दे मोटो हुवो, अम्बर अड़ीयो सीस।।
अर्थात, भगवान विष्णु ने वामन रूप में तीन पग भूमि माँगी थी, परंतु चूण्डा का त्याग इतना विराट था कि उनका मस्तक आकाश से भी ऊँचा प्रतीत होता है।
रावत चूण्डा कौन थे?
रावत चूण्डा, वे महाराणा लाखा के ज्येष्ठ पुत्र थे और परंपरागत रूप से मेवाड़ के उत्तराधिकारी थे। किंतु उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा निभाते हुए राजसिंहासन का अधिकार छोड़ दिया और हंसाबाई से उत्पन्न पुत्र मोकल को उत्तराधिकारी स्वीकार किया।
उनका जन्म महाराणा लाखा की रानी लखमावती से माना जाता है। वे मेवाड़ राजवंश के उन विरल राजकुमारों में गिने जाते हैं, जिनके लिए सत्ता से अधिक महत्त्व धर्म, वचन और कुल-मर्यादा का था।
जन्म और वंशपरंपरा
रावत चूण्डा का जन्म मेवाड़ के महाराणा लाखा की रानी लखमावती से विक्रम संवत् 1436 में हुआ। रानी लखमावती गागरोंन के खींची शासक विरमदे की पुत्री थी। इस रानी से उत्पन्न चूण्डा के राघवदेव , अज्जा , भीम , दूला और डूंगरसी पांच और भाई थे। रावत चूण्डा , महाराणा लाखा के ज्येष्ठ पुत्र होने से मेवाड़ के भावी उत्तराधिकारी थे।
हंसाबाई का विवाह प्रस्ताव और नियति का मोड़
मेवाड़ के महाराणा लाखा की उम्र ढलने लगी थी। महाराणा लाखा के जयेष्ठ पुत्र चूण्डा तरुणाई छोड़ युवावस्था में प्रवेश कर रहे थे। ऐसे समय में मंडोवर ( मंडोर – मारवाड़ ) के रणमल, चूण्डा के लिए अपनी बहन हंसाबाई का सम्बन्ध लेकर चित्तौड़ पहुंचा। दरबार लगा। दस्तूर का नारियल हुआ।
उस समय महाराणा लाखा के मुंह से हंसी हंसी में निकल गया कि नारियल तो युवाओं के लिए ही आते हैं , हम जैसे वृद्धों को कौन पूछे । अपने पिता के ये बोल सुन युवराज चूण्डा ने रणमल से कहा कि यह दस्तूर आप मेरे पिता से कर दे , मैं इसे स्वीकार नहीं करूंगा।
राठौड़ रणमल ने कहा कि मैं आपके लिए यह दस्तूर लेकर आया हूं कि आप पाटवी (जयेष्ठ) कुंवर है आप मेवाड़ के भावी महाराणा है। मेरी बहन का विवाह आपसे करने से उससे जन्म लेने वाला पुत्र भी मेवाड़ का भावी स्वामी बनेगा लेकिन यदि मेरी बहन का विवाह महाराणा लाखा से होता है तो वह मेवाड़ का भावी स्वामी नहीं बनेगा। अतः मैं यह विवाह का प्रस्ताव आपके लिए ही लाया हूं।
यहीं से चूण्डा का व्यक्तित्व सामान्य राजकुमार से उठकर आदर्श पुरुष के स्तर पर प्रतिष्ठित हो जाता है।
रावत चूण्डा की भीष्म-प्रतिज्ञा
मंडोर के राव रणमल के इस विवाह प्रस्ताव पर मेवाड़ के युवराज चूण्डा ने कहा कि मैं आपकी बहन से विवाह नहीं कर सकता । और मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि उससे उत्पन्न पुत्र ही मेवाड़ का स्वामी बनेगा।
युवराज चूण्डा की प्रतिज्ञा को सुन पूरा दरबार स्तब्ध ! दरबार में सन्नाटा। अपने पुत्र की इस भीष्म प्रतिज्ञा के आगे महाराणा लाखा की एक नहीं चली। और विवश होकर उन्हें वह विवाह का दस्तूर स्वयं के लिए स्वीकार करना पड़ा। इस प्रकार रणमल की बहन का विवाह महाराणा लाखा के साथ हुआ और उससे मोकल का जन्म हुआ ।
जब एक ओर मंडोर में महाराणा लाखा विवाह मण्डप में दुल्हन के साथ फेरे ले रहे थे , तब ही दूसरी ओर परम त्यागी चूण्डा का सुयश सातों समुंद्रो को लाँघकर संपूर्ण विश्व में व्याप्त हो रहा था।
युवराज चूण्डा ने अपने लिए प्रस्तावित विवाह को तो नकारा ही , साथ साथ अपने राजसिंहासन के हक़ को भी छोड़ दिया । इतना ही नहीं , तदनंतर मंडोर के शासक राव रणमल पर विजय प्राप्त कर उससे विजित चित्तौड़ को भी पुनः अपने अनुज मोकल को दे दिया। ऐसे विलक्षण दानी चूण्डा पर तो अनेक दुर्ग निछावर है।
यह त्याग इतना महान क्यों माना जाता है?
भारतीय इतिहास और महाकाव्यों में राज्याधिकार को लेकर हुए संघर्षों की कमी नहीं है। महाभारत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ उत्तराधिकार-विवाद ने पूरे वंश को विनाश की ओर धकेल दिया। इसके विपरीत, रावत चूण्डा ने वही स्थिति आने ही नहीं दी। उन्होंने अपने त्याग से न केवल परिवार में संभावित संघर्ष टाला, बल्कि मेवाड़ की मर्यादा को भी अक्षुण्ण रखा।
यही कारण है कि उनका त्याग केवल पारिवारिक बलिदान नहीं, बल्कि राजनीतिक दूरदर्शिता, कुल-रक्षा, और धर्माधिष्ठित नेतृत्व का उदाहरण माना जाता है।
कुन्ती पुत्र पाण्डवों के राज्याधिकार की मांग के कारण महाभारत हुआ। और संपूर्ण वंश का नाश हो गया, जिससे हस्तिनापुर गौरवविहीन हुआ। वहीं वीर प्रसूता चित्तौड़ अपने लाडले सपूत चूण्डा के अनुपम राज्य त्याग के कारण यशोमंडित हैं।
चूंडा का त्याग उनके जीवन का परिस्थिति जन्य अथवा नाटकीय त्याग नहीं था। अपितु वह उनके व्यक्तित्व में समाया हुआ एक अपूर्व उज्ज्वल चरित्र था। इसी परिप्रेक्ष्य में कहना न होगा कि परम त्यागी चुंडा ने अपने अधिकार में आया हुआ चित्तौड़गढ़ का समस्त राज्य वैभव अपने अनुज मोकल को एक बार नहीं , दो दो बार प्रदान किया – पहली बार तो उन्होंने अपने पिता महाराणा लाखा के वीरगति प्राप्त होने पर और दूसरी बार तब , जब मंडोर के राव रणमल ने षड्यंत्र रचकर उसे हथियाना चाहा था , तब उसे मार कर।
महाराणा लाखा के बाद चूण्डा की भूमिका
महाराणा लाखा की मृत्यु के बाद मोकल अल्पायु थे। इतिहास-स्रोतों के अनुसार, चूण्डा ने राज्य-प्रशासन की जिम्मेदारी संभाली। बाद में राजदरबार की शंकाओं और परिस्थितियों के कारण वे मेवाड़ से दूर चले गए, किंतु मेवाड़ के हित से कभी विमुख नहीं हुए। आगे चलकर वे पुनः लौटे और मोकल तथा बाद में कुम्भा के काल में भी मेवाड़ की रक्षा और स्थिरता में उनकी भूमिका महत्त्वपूर्ण रही।
यह तथ्य विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि चूण्डा ने केवल “त्याग” नहीं किया, बल्कि त्याग के बाद भी अपने राज्य के प्रति दायित्व निभाया। यही उनके चरित्र की सबसे बड़ी ऊँचाई है।
रणमल, सत्ता-संघर्ष और चूण्डा की निष्ठा
हंसाबाई के भाई रणमल राठौड़ का प्रभाव मेवाड़ की राजनीति में बढ़ा। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, इस बढ़ते प्रभाव से असंतोष उत्पन्न हुआ और बाद की घटनाओं में चूण्डा को पुनः मेवाड़ के पक्ष में सक्रिय होना पड़ा। रणमल की मृत्यु के बाद चूण्डा ने मेवाड़ की स्थिरता बहाल करने में योगदान दिया और अपने वंशजों के लिए एक ऐसी परंपरा स्थापित की, जो आगे चलकर चूण्डावत कहलायी।
कवियों की दृष्टि में चूण्डा
रावत चूण्डा के त्याग और यश का वर्णन राजस्थानी कवियों ने अत्यंत भावपूर्ण शब्दों में किया है-
चंवरी चढ़ लाखो फिरे, फिरे बीनणी लार।
चूण्डा री कीरत फिरे, सात समंदा पार।।
इन पंक्तियों का आशय यह है कि जहाँ एक ओर विवाह-मंडप में सांसारिक क्रिया संपन्न हो रही थी, वहीं दूसरी ओर चूण्डा के त्याग का यश सातों समुद्रों के पार तक फैल रहा था। यहाँ कवि ने चूण्डा को केवल एक राजकुमार नहीं, बल्कि मर्यादा और महिमा के जीवंत प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया है।
चूण्डा: केवल त्यागी नहीं, आदर्श नेतृत्वकर्ता भी
रावत चूण्डा के व्यक्तित्व को केवल त्याग तक सीमित कर देना उचित नहीं होगा। वे—
- पितृभक्त थे
- वचन के धनी थे
- राज्यधर्म के ज्ञाता थे
- परिस्थितियों में संयम रखने वाले नीति-पुरुष थे
- और सबसे बढ़कर, सत्ता से ऊपर मर्यादा को रखने वाले राजपुरुष थे
ऐसे व्यक्तित्व दुर्लभ होते हैं, क्योंकि अधिकार त्यागना कठिन है, परंतु त्याग के बाद भी निष्ठा निभाना उससे कहीं अधिक कठिन है।
मेवाड़ के इतिहास में रावत चूण्डा का स्थान
महाराणा प्रताप, राणा कुम्भा, रानी पद्मिनी और पन्ना धाय जैसे महायशस्वी नामों के बीच रावत चूण्डा की महत्ता कुछ अलग प्रकार की है। उनका यश युद्धभूमि में प्राप्त विजय से नहीं, बल्कि अपने ऊपर विजय से निर्मित हुआ।
उन्होंने संसार को यह सिखाया कि
सच्चा वीर वही है, जो तलवार से पहले अपने मन, मोह और महत्वाकांक्षा पर विजय प्राप्त करे।
FAQ: आपके प्रश्न ?
1. रावत चूण्डा को मेवाड़ का भीष्म क्यों कहा जाता है?
क्योंकि उन्होंने भीष्म पितामह की तरह अपने पिता की मर्यादा और वचन की रक्षा के लिए राजसिंहासन का त्याग किया।
2. रावत चूण्डा किसके पुत्र थे?
वे मेवाड़ के महाराणा लाखा के ज्येष्ठ पुत्र थे।
3. हंसाबाई कौन थीं?
हंसाबाई मंडोर की राठौड़ राजकुमारी और महाराणा लाखा की रानी थीं। वे मोकल की माता थीं।
4. चूण्डा ने क्या त्याग किया था?
उन्होंने अपने लिए आए विवाह-प्रस्ताव को अस्वीकार किया और मेवाड़ के सिंहासन पर अपना अधिकार छोड़ दिया।
5. चूण्डावत कौन हैं?
रावत चूण्डा के वंशज आगे चलकर चूण्डावत कहलाए और मेवाड़ के इतिहास में अत्यंत प्रभावशाली बने।
निष्कर्ष
युवराज चूंडा का अपने लिए प्रस्तावित हंसाबाई में , पिता की भावना के अनुरूप , अपनी मां को देखकर उस प्रस्ताव को ठुकरा देना , कोई सामान्य त्याग नहीं है। मेवाड़ राजवंश में पैदा हुए सभी पाटवी राजकुमारों में चूंडा जी के व्यक्तित्व की विशेष गरिमा है। धन्य है ऐसे त्यागी , पितृभक्त , मेवाड़ के भीष्म , सत्यव्रत रावत चूंडा जो इतिहास में अमर हो गए।
रावत चूण्डा का जीवन हमें बताता है कि इतिहास केवल उन लोगों को अमर नहीं करता जिन्होंने राज्य जीते, बल्कि उन लोगों को भी अमर करता है जिन्होंने अपने अधिकार छोड़कर आदर्शों को जिया।
अपने लिए प्रस्तावित विवाह को पिता की भावना के सम्मान में अस्वीकार करना, जन्मसिद्ध उत्तराधिकार का त्याग करना, और फिर भी राज्यहित में समर्पित रहना – यह साधारण घटना नहीं, बल्कि चरित्र की सर्वोच्च गरिमा है।
धन्य है मेवाड़, जिसने ऐसा सत्यव्रती, पितृभक्त, मर्यादा-पुरुष और त्यागी सपूत जन्मा।
धन्य हैं सत्यव्रत रावत चूण्डा, जो भारतीय इतिहास में सदा-सर्वदा अमर रहेंगे।
इसे भी पढ़ें –